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समाज का ढहता अस्तित्व : अजय कुमार झा

 

अजय कुमार झा, हिमालिनी अंक मार्च । हमारी समाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत जिसे हम नेपाली, हिंदू, आर्य या सनातन के नाम से पुकारते हैं; वह अब भीषण संकटों से घिरने लगा है । वर्तमान समय में हमारी समाजिक व्यवस्था पर तीन तरफ से आक्रमण हो रहे हैं । एक है पश्चिमी संस्कृति का आक्रमण । दूसरा है विदेशी के इशारों पर अपनी ही संस्कृति को नष्ट करने पर आमादा तथाकथित साम्यवादी व्यवस्था का आक्रमण, तीसरा है इस्लामिक विस्तारवाद का आक्रमण । यह तीनों अलग–अलग दिशाओं से हमारी समाजिक प्रणाली और सनातन संस्कृति पर लगातार आक्रमण कर रहे हैं । तीनों का तरीका बिल्कुल अलग–अलग है । साम्यवादी विचाराधारा के पोषक योजनाबद्ध रूप में हमारे समाजिक व्यवस्था की जड़ को ही तहस–नहस कर रही है ।

हमारे पूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि तथा उपयोगिता पर आधारित परिवार व्यवस्था को अवैज्ञानिक और पिछड़ा बताते हुए अपनी अमानवीय, एकल परिवार रूपी कलंक को आधुनिकता का लेप लगाकर उसे अपनाने को बाध्य कर रही है । वे लोग यह सिद्ध कर रहे हैं कि परिवार का कोई अस्तित्व नहीं होता । समाज से ऊपर सरकार होने के कारण किसी संस्कृति, धर्म और वंश–परंपरा का कोई मायने नहीं है । समाज नाम की कोई चीज नहीं होती उनके संस्कार में । आम नागरिक के जीवनशैली, स्वाभिमान तथा गरिमा को कुचलते हुए सरकार के पूर्ण मातहत में गुलामों की तरह जीने के लिए मजबूर करने हेतु दीर्घकालीन योजनाओं का षडयंत्रपूर्ण संजाल बिछाया जा रहा है । जिसमे व्यक्ति के व्यक्तित्व को नष्ट कर उसे यंत्र मानव की तरह सरकार का एक आदेश पालक प्राणी के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा ।

आज स्थिति ऐसी आ गई है कि नेपाल, भारत के अधिकांश लोग समाज को कुछ समझते ही नहीं है । सामाजिक व्यवस्था को नेस्तनावुद कर दिया गया है । सरकार को ही समाज तथा समाज के संरक्षक तथा नियंत्रक के रूप में मानते हैं । और यही कारण है कि आज सामाजिकता सिर्फ शब्दों में सीमित रह गया है । लोग भौतिक सुख सयल और भोग विलास के साम्यवादी प्रभाव में इस कदर डूब गए हैं कि उन्हें अब अपनी ढहती हुई विरासत के गुंबद को देखने की भी फुर्सत नहीं है । पश्चिम की संस्कृति हमारी सामाजिक व्यवस्था को विकृत करने हेतु मनुष्य के स्वभाव में स्वार्थ और उच्छृंखलता रूपी दुखदाई कंटीला बीजारोपण विस्तार कर रही है । ध्यातव्य हो ! जब मनुष्य के स्वभाव में स्वार्थ बढ़ेगा तो हमारी पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय व्यवस्था में दरारें उत्पन्न होना शुरू हो जाएगा । इन स्वार्थियो और दरारों के जरिए हमारी सभ्यता को विकलांग बनने का काम विदेशी षडयंत्रकारियों के लिए आसान हो जाएगा ।

इसी तरह जो इस्लामिक संस्कृति है, वह हमारे स्वाभिमान को और हमारी पहचान को समाप्त कर रही है । वह हमारी संख्या बल को कमजोर करके अपनी संख्या बल को हमारे ऊपर थोप रही है । इन तीनों संस्कृतियों का कार्य करने का तरीका अलग है लेकिन यह तीनों ही हम पर लगातार आक्रमण कर रहे हैं ।

अब हमें इन तीनों संस्कृतियों से एक साथ मुकाबला करना है इस मुकाबले के लिए हमें शक्ति की आवश्यकता नहीं है । धन की भी आवश्यकता नहीं है । हमें, हमारे पूर्वजों के अनमोल धरोहर रूपी वैचारिक शक्ति को अपने हृदय में फिर से प्रतिष्ठित करना होगा । हम वैचारिक धरातल पर तीनों संस्कृतियों को एक साथ पीछे धकेल सकते हैं । और उन्हें हम अपने सामने नतमस्तक कर सकते हैं । इसके लिए हमें एकसाथ बैठ कर के चिंतन करने की हमारी पुरानी संस्कार को फिर से जाग्रत करना होगा । हमें समाधान खोजने के लिए ज्ञान के भंडार रूपी गीता, भागवत, रामायण, उपनिषद लगायत के अपनी पूर्वजों के खजाना को फिर से जीवन व्यवहार में सक्रिय करने के लिए प्रयास करना होगा । ऋषि महर्षियों के संतानों के लिए इस दो कौड़ी के समस्याओं के लिए समाधान निकलना कठिन नहीं है । लेकिन, हमें समाज को राज्य से उपर मानकर परिवार व्यवस्था में आई विकृतियों को दूर करने का मनोवैज्ञानिक तथा व्यवहारिक दवाब की सृजना करना ही होगा ।

वर्तमान समय में विश्व मानवता के लिए सबसे बड़ी समस्या, उद्योगपतियों, राजनेताओं और सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से समाज को गुलाम बनाकर रखने की पाशविक रणनीति है । ये तीनों मिलकर सारी दुनियां का शोषण कर रहे हैं । कही मनमाना टैक्स लगाकर लूट रहे हैं तो कहीं अपने अनुकूल मूल्य वृद्धि कर आम नागरिकों को लूट रहे हैं । चोर–चोर मौसेरे भाई की तरह नेपाल इस कार्य में सबसे आगे है । इस पृथ्वी पर नेपाल ही ऐसा देश है, जहां पक्ष–विपक्ष दोनों मिलकर देश को बेच रहे हैं और जनता को लूटकर आपस में बांट रहे हैं । इन लोगों ने मिलकर संविधान और संवैधानिक निकाय तक को गुलाम बना लिया है । एक ओर कर देनेवाले हम जैसे आम नागरिक दिन प्रतिदिन गरीब होते जा रहे हैं, तो दूसरी ओर बजट में अप्रत्याशित रूप में वृद्धि कर तलब भत्ता और ठेका पट्टा में मन माफिक रकम नियोजन कर अपनी झोली भर रहे हैं । अगर यही लोकतंत्र का आदर्श और परिभाषा है तो हमे इसका घोर विरोध करना चाहिए; अन्यथा हम बुरी तरह लुट जाएंगे । विदेशियों के हाथो बेच दिए जाएंगे ।

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लोकतंत्र की आड़ में छुपे लुटतंत्र के खिलाफ अब हमें आगे आकर कड़ा विरोध करना चाहिए । हमें इस प्रकार का लोकतंत्र नहीं चाहिए जिसमे छोटे–छोटे व्यापार करने वाले, खेती करने वाला सब टैक्स देते–देते परेशान हो जाएं और हमारे ही टैक्स पर जीनेवाला कर्मचारी और नेता हमें ही तुच्छ समझते रहे । शिक्षा और स्वास्थ के नाम पर जो बजट का विनियोजन किया जाता है; उसका कितना प्रतिशत आम नागरिक को लाभ प्राप्त होता है ? क्या इस विषय पर गहन विश्लेषण की आवश्यकता नहीं है ? क्या आम नागरिक को सरकारी विद्यालयों और चिकित्सालयों पर हृदय से भरोसा है ? इन संस्थानों में आर्थिक विपन्नता के शिकार वाहेक के लोग जाते हैं ? अगर नही; तो फिर इसमें खरबों का बजेट क्यों ? क्या हम अन्य तरीका नहीं अपना सकते ? क्या निजी शैक्षिक तथा स्वास्थ संस्थानों को अनुदान देकर कड़ाई के साथ निगरानी में लेकर अनंत गुना अधिक उपलब्धि नहीं ले सकते ? पैसा जनता के टैक्स से आता है । देश जनता के टैक्स से चलता है । मंत्री और सचिव जनता के टैक्स पर पलते हैं । अतः थोड़ी भी ईमानदारी और मानवता बची है तो इस विषय को गंभीरता से लिया जाय । जो सर्वोत्तम उपलब्धि मूलक उपाय हो; उसे तत्परता के साथ लागू किया जाय । तब जाकर लोक के पैसा और भोट से चलने वाला लोकतंत्र को लोक सम्मान के दृष्टि से देखेंगे । लोगों को स्वराज्य का आभास होता हुआ महसूस होगा ।

आज रोजगार के लिए सरकार पर निर्भरता बढ़ती जा रही है । रोजगारी देने और दिलाने के नाम पर सरकारें बनाई जा रही है । राजनीतिक संगठन चलाए जा रहे हैं । पार्टियां बनाई जा रही है । ऐसे में सत्ता हथियाने के लिए विदेशियों के इशारों पर काम करने वाले राष्ट्रद्रोहियों को सत्ताधीश बनने का सुवर्ण अवसर प्राप्त हो जाता है । नेपाल जैसे छोटे राष्ट्रों सभी नागरिक के लिए रोजगारी का अवसर उपलब्ध कराना अमेरिका जैसे विकसित देश को एक पल भी सोचने की जरूरत नहीं है । जितना नेपाल के प्रधानमंत्री को वेतन मिलता है; हो सकता है उससे अधिक अमेरिकी सरकार कार्यालय सहयोगियों के लिए उपलब्ध करा दे । तो क्या हमें अमेरिका, युरोप, चाइना, अष्ट्रेलिया जैसे देशों के हाथों में नेपाल को सौप देना चाहिए ? क्या हमें पूर्ण रूप से विदेश पलायन कर गौरवान्वित महसूस करना चाहिए ? क्या धन और पद के आगे धर्म और संस्कृति का कोई मूल्य नहीं ? क्या भौतिक सुख सुविधा के लिए पैतृक विरासत को लात मार देने में ही बहादुरी है ? क्या एक जीवंत व्यक्तित्व के लिए यह विचार शोभनीय है ? क्या एक पुरुष चरित्र को इस तरह सोचना चाहिए ? ऐसा चरित्र हमें अपनी ही संतानों के आगे कलंकित नहीं करेगा ? नौकरी करने और पाने के लिए त्राहिमाम होना नौकर चरित्र अर्थात नपुंसक चरित्र का प्रमाण है । और नपुंसक को मानवीय श्रेणी में नहीं रखा जा सकता । नपुंसक को राष्ट्रीय व्यवस्था का अंग नहीं माना जा सकता है । नपुंसक चरित्रों से न वंश की रक्षा संभव है न राष्ट्र की । अतः मेरे प्रिय जनों ! भीख के धन से मौज मस्ती करना किस चरित्र और संस्कार का द्योतक है ? क्या भिखारियों को आज के मानव समाज में कहीं कोई सम्मान दिया जा रहा है ? क्या भिखारियों के हाथों में सत्ता का बागडोर शोभायमान हो सकता है ? क्या भिखारी चरित्र से समाज और राष्ट्र के सामरिक, आर्थिक और भौतिक समृद्धि तथा संरक्षण संभव है ? नहीं न ! फिर दान और नौकरी पाने के लिए इतनी दौड़ धूप क्यों ?

वास्तव में रोजगार देना सरकार का काम नहीं है । रोजगार तो प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार खुद ही सृजना करना होता है । समाज में विद्यमान वर्तमान समस्याएं, भौतिक आवश्यकताएं तथा अर्थ के परीपूर्ति हेतु चिंतन मनन करना बौद्धिक वर्गो का परम दायित्व है । समस्याओं का पहचान करना और उसके मूल कारणों का विश्लेषण कर समाधान के उपायों को पूर्ण तत्परता के साथ खोजना भी बौद्धिक वर्ग का ही दायित्व है । व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय आवश्यकताओं का सूक्ष्म वर्गीकरण कर प्राथमिकता के श्रेणी निर्धारण करना भी दूरदृष्टि वाले शिक्षित और क्षमतावान व्यक्ति का ही कर्तव्य होता है । इस प्रकार राष्ट्रीय श्रोत साधन तथा मानवीय संसाधनों को सांगठनिक रूप से सक्रिय कर राष्ट्रीय स्वाभिमान तथा समृद्धि हेतु सदुपयोग करना किसी भी समाज के लिए गौरव की बात है । किसी की स्वतंत्रता में कोई बाधा ना पड़े और प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार रोजगार कर सके इस तरह का वातावरण बनाना सरकार का काम है । देश में शान्ति, सुरक्षा तथा एक दूसरे पर भरोसे का माहौल तयार करना भी सरकार का दायित्व है ।

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व्यापारी, उद्योगपति और किसानों के जीवन, धन और लगानी का पूर्ण संरक्षण तथा संवर्धन के लिए वातावरण का निर्माण कराने का दायित्व भी सरकार का ही होता है । शिक्षा, स्वास्थ, कृषि, उद्योग, व्यापार तथा सभी सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के अनुसंधानों को भी स्वतंत्रता प्रदान कर राष्ट्र के हित में अग्रसरता दिलाने के लिए दीर्घकालीन योजनाओं के साथ संरक्षण और नियंत्रण हेतु निरंतर परीक्षण और निरीक्षण करते रहना चाहिए जिससे की लोग निर्धकता के साथ उत्पादन तथा विकास कार्य को सक्रिय रख सके और किसी को कोई बाधा न पहुंचा सके ।

देश में शान्ति सुव्यवस्था कायम होते ही राष्ट्र मे विकास का दौड़ अपने आप गतिशील हो जाता है । यह मानवीय प्रवृत्ति है । मानव, पशु की तरह चुप नहीं बैठ सकता । वह कुछ न कुछ जरूर करना चाहेगा । हां, शैक्षिक योग्यता, प्राविधिक दक्षता, मानसिक क्षमता और अनुभव जरूर विशेष महत्व रखता है । इसमें सरकार के ईमानदार अफसरों का सहयोग भी जीवनदायी प्राणवायु की तरह काम करेगा । परंतु सरकारी कर्मचारी में ईमानदारी खोजना भगवान खोजने से भी अधिक कठिन काम हो गया है । यही वह मौलिक कारण है, जिससे आम नागरिक अपने जीवन से हतोत्साहित होने लगे हैं; उधर सरकार से निराश । अतः हतोत्साहित और निराश जनशक्ति से राष्ट्रीयता सुरक्षित नहीं रह सकता है ।

समाज में विकास की आंधी नहीं लाया जा सकता है । औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है । निराश और उदासीन समाज को विनासोन्मुख माना जाता है । जो समग्र मानव जाति के लिए दुर्घटना का कारक है । अतः जनता के कर से पलने वाले कर्मचारियों और नेताओं के विनाशकारी चक्रव्यूह से आम नागरिक को मुक्ति दिलाने के लिए सोचना चाहिए । यदि इस राजनीतिक प्रणाली से संभव नहीं होता दिखता है; तो इस प्रणाली का विकल्प खोजना शुरू किया जाना चाहिए । क्योंकि हर प्रणाली और कार्य का प्रमुख उद्देश्य जन, धन तथा राष्ट्रीय सुरक्षा ही होता है । व्यक्ति के सबल और संपन्न होते ही राष्ट्र सबल और संपन्न हो जाता है । व्यक्ति व्यक्ति मिलकर राष्ट्र बने होने के कारण व्यक्ति व्यक्ति के संरक्षण और संवर्धन पर विशेष ध्यान रखना सरकार का कर्तव्य होता है ।

दुर्भाग्य से हमारे देश में कुछ बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के उद्देश्य से रोजगार को बुद्धि के साथ जोड़कर मानवता और राष्ट्रीयता को तहस–नहस कर दिया है । टैक्स देंगे गांव के श्रमजीवी लोग, हल जोतने वाला और हराम का खाएगा बुद्धिजीवी । रोजगार के नाम पर श्रमजीवी ४०० में भले ही काम करता रहे लेकिन टी ए, डी ए के नाम पर हराम का खाने वालों को होटल खर्च ही रोज का दस हजार रुपया रोज चाहिए । और साथ ही उन कर दाताओं पर धाक भी जमाएंगे ! क्या इसे आप लोकतंत्र कहेंगे ? जहां के शिक्षित लोग भ्रष्ट और बेईमान हो, देश और संस्कृतिको बेचने के लिए तैयार हो; उसे भी विद्वान अथवा सभ्य कहेंगे ? अगर इसे सभ्य कहा जाएगा तो असभ्य की परिभाषा क्या होगी ? यह आप लोगों पर छोड़ता हूं ।

व्यक्ति और समाज एक दूसरे से साथ पूरी तरह जुड़े हुए होते हैं । व्यक्ति ही समाज और राष्ट्र है । व्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तित्व विकास और सुरक्षा की जिम्मेदारी समाज की होती है । समाज इस कार्य को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए जिस इकाई को बनाता है, उसे राज्य कहते हैं । राज्य को समाज शक्ति भी देता है और राज्य ही व्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन ना करने लगे तथा राज्य कहीं मनमानी न करें इसलिए समाज राज्य के अधिकारों के सीमाएं निश्चित कर देता है । राज्य के अधिकतम अधिकारों की तथा समाज के न्यूनतम अधिकारों की सीमाएं जिस कागज में लिखी जाती है उस कागज को संविधान कहते हैं । संविधान सिर्फ समाज के द्वारा लिखा जाता है तथा पूरा तंत्र संविधान के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य होता है । संविधान निर्माण अथवा संविधान संशोधन में तंत्र की किसी प्रकार की कोई भूमिका हो ही नहीं सकती क्योंकि तंत्र तो संविधान के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य होता है । लेकिन दुनिया में राज्य अर्थात तंत्र ने स्वयं को ही समाज मान लिया, सर्वशक्तिशाली मान लिया है । इसलिए तंत्र ही संविधान में भी संशोधन करने लग गया है । तंत्र ने स्वयं को शासक और समाज को शासित मान लिया जब कि तंत्र मैनेजर और समाज मालिक होता है । हमने भी दुनिया की नकल की । दुनिया ने तो अपने को शासक और समाज को शासित माना था लेकिन हमने तो और आगे जाकर स्वयं को मालिक तथा समाज को गुलाम मान लिया । यही मूल कारण है कि हमारा संविधान तंत्र के जेल खाने में कैद है । और तंत्र अर्थात राज्य संविधान को आधार बनाकर समाज को गुलाम बनाता जा रहा है । समय आ गया है कि अब दुनिया को संविधान की वास्तविक परिभाषा बताई जाए । हमारी शिक्षा प्रणाली में भी संविधान की आधारभूत बात तथा मौलिक परिभाषा पढ़ाई जाए तभी संविधान को तंत्र की मुट्ठी से मुक्त करा कर स्वतंत्र किया जा सकता है । इन देश वेचुवा भ्रष्ट नेताओं को नियंत्रण में रखा जा सकता है । जन आकांक्षा तथा भावना अनुसार राष्ट्रीय गरिमा और मर्यादा को बढ़ाया जा सकता है । अपनी मौलिक सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध और संरक्षित किया जा सकता है ।

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समाज को व्यवस्थित रूप से संचालित कराने के लिए समाज की अनेक इकाइयां अलग–अलग परन्तु, मिलकर कार्य करती है । इन इकाइयों को ही धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, परिवारिक आदि विभिन्न नामों से पुकारते हैं । वर्तमान दुनिया में जो अव्यवस्था दिख रही है उसका कारण सिर्फ राजनैतिक व्यवस्था में विकृति ही नहीं है । सच्चाई यह है कि आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, परिवारिक सहित सब प्रकार की व्यवस्थाओं में विकृति आ गई है । अतः सुधार हेतु योजनाऐं भी वृहद ही बनाना होगा । आधुनिकता के साथ संतुलित समायोजन करते हुए परिणाम मुखी कार्य को प्रोत्साहित करना होगा । सिर्फ एक व्यवस्था को सुधारकर जो परिणाम प्राप्त होगा वह अल्पकाल के लिए आंशिक सुधार ही हो सकता है; किंतु स्थाई समाधान नहीं । क्योंकि मनुष्य के स्वभाव से लेकर सब प्रकार की व्यवस्था में विकृतियां बढ़ती ही जा रही हैं ।

अब दुनिया में लोक स्वराज अभियान को आगे बढ़ाने की जरूरत है इसकी शुरुआत हमें ही करनी होगी । वैसे भारत में लोक स्वराज्य के लिए आंदोलन होता आया है । परंतु महा विनाश के अंतिम पायदान पर हम नेपाली पहुंच चुके हैं । एम सी सी, चीन और भारत के बीच का सम्यक कर्तव्य को हमने विदेशी पैसों के आगे नतमस्तक होकर खो दिया है । आज हम बिकाऊ देश के बिकाऊ नागरिक जैसे अपमान जनक विशेषणों से संबोधित किए जा रहे हैं । जीना जनता को है । गांव जनता का है । समाज नागरिक का है । संस्कृति हम नागरिकों ने निर्माण किया है । स्वेच्छा से धर्म हमने अपनाया है । सरकार और प्रशासन हमारी उपज है फिरभी हमारे ऊपर ही गुलामी थोपने का जुर्रत किया जा रहा है । हमारी समाजिक प्रणाली को मटियामेट करने के लिए मनोवैज्ञानिक माहौल तयार किया जा रहा है । क्या इस विषय पर हमें विमर्श नहीं करना चाहिए ? क्या अपनी पूर्वजों के अनमोल धरोहर और सभ्यता को लूटते देखकर भी चुप्पी साधे रहना पुरुषत्व है ? क्या ऐसी नपुंसकता के पाग पहनकर हम अपने भावी पीढि़यों के सामने खड़े होने का हिम्मत दिखा पाएंगे ? क्या हमारे पूर्वजों ने अपनी संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान को बचाने के लिए झुकने के बदले विदेशियों से लड़कर वीरगति को प्राप्त होने का फैसला अज्ञानता में लिया था ? इन सारी बातों को मैं आप लोगों पर छोड़ता हूं ।

अजयकुमार झा, जलेश्वर ।

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