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भिखारियों का सरकार और नपुंसकों की शासन : कैलाश महतो

 
 कैलाश महतो, पराशी। काठमाण्डौ से शुरु होकर देश के सारे जिलों में पसरे सरकारी सरकार और शासन में एक खास नश्ल का हुकुमत और बोलबाला है । जहाँ गैर खस सरकार और शासन भी है, वहाँ का भी सरकार और शासन खस मनोविज्ञान पर ही आधारित और संचालित है । यहाँतक प्रादेशिक सरकारें भी उसके दम्भ और नियन्त्रण से बाहर नहीं है ।
नागरिकताविहीन युवाओं का काठमाण्डौ में एक प्रकार का आन्दोलन तकरीबन सवा साल से संचालित है, वहीं संसद के दोनों सदन से पारित नागरिकता विधेयक को राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकृत किये जाने के बाद मधेश में हाउगुजी के रुप में प्रसारित राष्ट्रपति विरुद्ध का एक हौवा आन्दोलन देखा जा रहा है ।‌
बिना कारण कोई आन्दोलन नहीं होता । आन्दोलन किसी न किसी रुप में समाज, राज्य, सरकार, शासन और प्रशासन में रहे दुर्गंध, अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध ही होने का मानव का द्वन्दात्मक इतिहास है । विभिन्न रुपों में आन्दोलन समस्या का उजागर करता है । राज्य, सरकार, समाज और शासन व्यवस्था उसका समाधान खोजता है ।‌ आन्दोलन जब राज्य या सम्बन्धित सरोकार पर हावी होता है, तो कभी परिवर्तन तो कभी बदलाव होता है । जब पूरा बदलाव हो, तो वह क्रान्ति बन जाता है ।
मधेश ने दर्जनों आन्दोलन और विद्रोह किया है । सौभाग्य यह है कि मधेश के सहभागिता बिना देश का एक भी न तो बदलाव हुए, न कोई परिवर्तन । राज्य और शासन व्यवस्था में अपसाइड डाउन परिवर्तन भी हुआ तो उसका प्रभाव समान्य समाज बालों के समाज में परिवर्तन कम, और विशेषकर मधेश में समस्याएं नये नये रुप में दाखिल हुए । राज्य व्यवस्था परिवर्तन के साथ ही मधेश में जातीयता, साम्प्रदायिक तनाव, धार्मिक गुण्डागर्दी, नव-धनाढ्य और गरीबों के बीच असमानता और राजनीतिक आतंकों ने अपना अकल्पनीय फन फैलाया है । अत्त्यन्त निकृष्ट अवस्थाओं में एक समस्या नागरिकता समस्या कायम तो कम, उसमें इजाफा हद से ज्यादा हुआ है ।
मधेश के सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषकों को माने तो नागरिकता समस्या, मल खाद का समस्या, पहचान का समस्या और सहभागिता का समस्या किसी के लिए माथे का दर्द बन बैठा है, वहीं कुछ राजनीतिक पार्टियों के लिए भोट वसूल करने का खेल, साधन और माध्यम बन बैठा है ।
वास्तविकता यह है कि राज्य के लिए नागरिकता कोई समस्या नहीं है । यह है भी तो मधेश के लिए एक मानव निर्मित पीडा, जिसका प्रयोग भी राज्य अपने सुविधा के अनुसार करता है, किया है । बडी सोच समझ के साथ चुनाव के समय में कुछ राजनीतिक पार्टियां नागरिकता प्राप्ति को एक समस्या का नाम देकर समाधान का एक नाटक मंचन किए हैं । वास्तव में यह समस्या पार्टियों का नहीं, राज्य का है । राज्य जबतक इसे अपना समस्या और अपने नागरिकों का पीडा नहीं समझता, पार्टियों के द्वारा इसे समाधान नहीं किया जा सकता । क्योंकि पार्टी इसे समस्या बनाकर रखना चाहता है ता कि अपने आवश्यकता के अनुसार इसे भजा सके और बैंकों से रकम निकालने जैसे एटीएम के तरह इसका प्रयोग किया जा सके । यह चरित्र आम है नेपाली राजनीतिक दलों में ।

नागरिकता पीडि़त आन्दोलन के अगुवा नेता तथा आन्दोलन संयोजक ई. इन्द्रजीत साफी विगत पन्द्रह महीनों से काठमाण्डौ के गली गली, चौक चौक, सिंह दरबार, अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीतिक

नियोग लगायत के दर्जनों राष्‍ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय सरकारी एवं गैर सरकारी निकायों से विनती कर चुके हैं । देश के सारे राजनीतिक पार्टियों से हार गुहार लगा चुके हैं । उसके बावजूद भी उनके आग्रहों को नजर अन्दाज तबतक किया जाता रहा, जबतक संसद विघटन कर नागरिकता समस्या समाधान के लिए संसद में नागरिकता विधेयक पेश किया जाता रहा । उसी का पुनरावृत्ति देउवा का सरकार तब करता है, जब आम निर्वाचन घोषणा करने का समय निर्धारण किया जाता है ।
यह तो राज्य, नेपाली मानसिकता और शासकों का रणनीति है कि वह अपने लाभ को देखकर ऐसे निर्णय लेते रहे हैं । आश्चर्य की बात तो यह है कि जिन मधेशियों के हकहित, सुरक्षा और अधिकार की बात मधेशी नेताओं को करना चाहिए था, वह काम वे अपने चुनावी लाभ प्रयोजन के लिए करते नजर आ रहे हैं ।
चुनाव पार्टी अपने सिद्धान्त, मुद्दा, घोषणा पत्र और विधान के अनुसार लडता है । उसका राजनीतिक धर्म ही अपने सिद्धान्त को समाज में पेश करने के लिए होता है । मगर निहित पारिवारिक और गुटीय स्वार्थों को कायम रखने हेतु नेपाली काङ्ग्रेस ने १६५ प्रत्यक्ष निर्वाचन क्षेत्रों में से ९५, नेकपा माओवादी केन्द्र ने ५५, माधव कुमार नेपाल नेतृत्व के एकिकृत समाजवादी और उपेन्द्र यादव नेतृत्व के जनता समाजवादी पार्टियों ने ३०/३० तथा जनमोर्चा ने ५ सिट का दावा पेश किया है ।
राष्ट्रपति द्वारा फिर्ता नागरिकता विधेयक काण्ड को कुछ राजनीतिक दल अपना किस्मत का पेटारा मानकर आन्दोलन का जग ही खडा कर रखा है । सबका अपना अपना दावा है । कोई कहता है कि उसके आन्दोलन और वर्षों के संघर्ष के कारण ही नागरिकता विधेयक पास हुआ, तो कोई यह कहता है कि उसके आन्दोलन के जग पर किसानों को मल, खाद और बिजली मिले हैं । बेचारी जनता न जाने किस पर भरोसा करें ।
मामला जो और जैसा भी हो, भिखारियों का सरकार और नपुंसकों की शासन में मधेश पराधीन और लाचार होकर अपने नेताओं के भडवेपन शिकार होने पर विवश है । मधेश का यह विवशता मधेशियों को अकल्पनीय सीमितता के दायरे में फंसाता जा रहा है । उससे उसका जमीन छीना जा रहा है, उसके नागरिकता और पहचान पर सवाल किया जा रहा है, उसके अस्तित्व को मिटाने का दुष्चक्र रचा जा रहा है और मधेशी नेता राज्य के नश्लीय, विभेदीय और षड्यन्त्रात्मक चुनावी साजिशों का शिकार होते जा रहे हैं ।
इन्जियरिङ्ग कर चुके नागरिकताविहीन, सीमकार्डविहीन, बैंक खाताविहीन और अवसरविहीन लाखों इन्द्रजीत साफी एक तरफ पल पल अस्तित्व और जिन्दगी के लिए तरस रहे हैं, वहीं उनके नागरिकताविहीनता पर राजनीतिक रोटी सेकने को बेताब नेता और उनके कार्यकर्ता भोट के लिए मार्केटिंग और विज्ञापन करने का हिमाकत कर रहे हैं । अगर वे इन्जिनियर साफी को साफ इंसाफ दिलाना चाहते हैं तो फिर्ता किये गये नागरिकता विधेयक कार्य के विरुद्ध यह घोषणा नहीं करते कि जबतक नागरिकता समस्या समूल समाधान नहीं होगा, पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली लागू नहीं किया जायेगा, वे आसन्न निर्वाचन में न भाग लेंगे, न चुनाव होने देंगे ।

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