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नेपाल में हिन्दी भाषा के “प्रगतिवादी” प्रारम्भिक साहित्यकार

 

सच्चिदानन्द चौवे:प्रगतिवादी साहित्य अंगे्रजी साहित्य के “प्रोग्रेसिव लिटरेचर” शब्द का हिन्दी अनुवाद है। सन् १९३र्५र् इ. में पेरिस में श्रर्ीर् इ. एम. फोस्टर के सभापतित्व में “प्रोग्रेरसिव रार्इर्टस एसोसिएशन” नामक एक अन्तर्रर्ााट्रय संस्था का अधिवेशन हुआ, और उसके दूसरे ही साल भारत में मुल्कराज आनन्द, सज्जाद जहीर के प्रयत्नों से इसकी एक शाखा खोली गई। लखनऊ में हर्ुइ इसके प्रथम अधिवेशन का सभापतित्व पे्रमचन्द ने किया था। तभी से भारत में प्रगतिवादी अथवा प्रगतिशील साहित्य का प्रचार हुआ, और इसी साहित्य को “प्रगतिवादी साहित्य” का नाम मिला। प्रगतिवादी साहित्य एक स्वस्थ्ा आधार लेकर हिन्दी साहित्य के सभी क्षेत्रों में प्रकट हुआ। कविता के क्षेत्रों में इसने र्सवथा नवीन अध्याय की सृष्टि की

। युगों से प्रताडिÞत, शोषित और पीडिÞत जनसाधार ण की भावनाओं को व्यक्त कर एक स्वस्थ समाज की स्थापना के लिए इसने संर्घष्ा किया। इसका ध्येय मानवतावादी है। नेपाल में प्रगतिवादी ढंग की जो कविताएँ प्रारम्भ में हिन्दी भाषा में लिखी गईं वे विशेष रूप से मार्क्सवादी साहित्य से प्रभावित थी। प्रगतिवादी काव्य की प्रारम्भिक रचनाएँ हिन्दी भाषा में नेपाली साहित्यकार ‘वासुदेव प्रसाद त्रिपाठी’ यदुवंश लाल चन्द्र, र्सर्ूय नार ायणदास, र्सर्ूयदेव प्रभाकर, मणिराज उपाध्याय, मंगल कुमार उपाध्याय “नेपाल”, रामहरि जोशी, वव्रुवाहन ‘नेपाली’, सुन्दर झा तथा गोविन्द भट्ट आदि ने की थी। इनमें र्सर्ूयदेव ‘प्रभाकर’, राम हरि जोशी, सुन्दर झा, और वासुदेव त्रिपाठी में प्रगतिवादी काव्य रचना की अधिक प्रवृत्ति दिखाई देती है।

नेपाल के शोषित मजदूरों और किसानों के चित्रण में जो प्रगतिवादी काव्य की विशेषता है, इन कवियों ने विशेष रुचि दिखलाई है। वासुदेव प्रसाद त्रिपाठी की “ओ दुखिया किसान” शर्ीष्ाक की कुछ पक्तिंयाँ इस विषय में उल्लेखनीय हैं – “सदियों के भूखे, वस्त्रहीन, अत्यधिक अशिक्षित और दीन र ाणाशाही से उत्पीडिÞत, साधन विहीन, शोषित महान” ओ नेपाली दुखिया किसान दिन रात परिश्रम करते हो, र्सर्दी, गर्मी, में मरते हो राणा जी माल उडÞाते हैं, तुमको मिलता मकै पिसान ओ नेपाली देखिया किसान -नेपाली जन क्रान्ति- पृ. २०) कृषकों के शिशुओं की दयनीय दशा का चित्रण करते हुए वे कहते है – नहीं दीख पडÞती उनके शिशुओं के मुँह पर लाली दूध कहाँ से हो माँ का, जब पेट रहेगा खाली औषधि के ही बिना, कृषक बच्चे बीमार बेचारे असमय में ही निठुर देव के द्वारा जाते मारे। ने. ज. प्रा. पृ. ३३ नेपाली की आर्थिक विषमता का एक मार्मिक वर्ण्र्ाादेखिए – भव्य महलों पर सजी ए महफिलें आमोद पूरित झोपडÞी में क्षुधा पीडित, दीन की आहें विद्युणिर्त घूमते दुखी निकम्मा और रोते श्रमिक निर्धनर् उर्वरा हमने वना दी, ए जमीने मरु- वंजर और बदले माँस सूखा, सूखता अब अस्थिपंजर शोषकों के जाल में फँस, हो रहा मानव विकम्पन।।

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“परवसता” पृं २० सुन्दर झा पूँजीवाद और साम्राज्यवाद आदि शोषक प्रवृतियों का विरोध प्रगतिवादी काव्य की दूसरी प्रमुख विशेषता है। उपर्युक्त नेपाली कवियों में से अनेक ने इन शोषक प्रवृत्तियों का विरोधकर इनके विरुद्ध क्रान्ति का आवाहन किया हे। राजविराज के यदुवंश लाल चन्द्र पूँजीपतियों को सावधान करते हुए कहते हैं – सावधान ओ पूँजीपतियों, घटा घिर रही कारी- कारी उर का दग्धोच्छ्वास निकलकर कहीं न रौंदे तेरी क्यारी ढह जाये फिर कहीं न तेरी, गगन चूमती खडÞी अटारी। जर्ीण्ा-शर्ीण्ा, पुरातन व मानवता विरोधी समाज, घातक रुढिÞयों का विरोध भी यहाँ किया है – तोडÞ पुरानी घृणित श्रंृखला, निकली पतन की खाई से आलिंगन कर उत्थानों को, भागो दूर वुर्राई से।

नूतन युग से, नए समय से, री तुम नाता जोडÞ चलो “सुन्दर झा” परवसता पृं ४२ रामहरि जोशी ने भी पूँजीवादी प्रथा के अन्त के लिए क्रान्ति की कामना की है – आह गरीवों की आज महल को हिला रही, झोपडÞी की आग आज विश्व को जला रही माँगता है विश्व आज नौजवान रक्त दो, कह रही है यह जमीन, देशभक्ति दो नया सवेरा- र्-नई आग) पृ. २४ पग्र तिवादी कवि छायावादी कविया ंे की भाँ ित स्वप्नदष््र टा हाके र निर ाशावादी नही ं हाते ,े जीवन सघं षर् स े ऊबकर उनम ंे पलायन की पव्र ृ ित नहीं मिलती। निराशा और पराजय की भावना का सदैव तिरस्कार कर य े आत्मविश्वास, परुु षाथर् आरै कमर्य ागे का सदं शे दते े ह।ंै य े पव्र ृ ितया ँ रामहरि जाशे ी एव ं सन्ु दर झा क े काव्य म ंे परिलक्षित हाते ी ह ंै – मिट्टी की सौगन्ध अरे ओ सोने वालो। मिट्टी की सौगन्ध अरे ओ रोने वालो जिस देश में हर व्यक्ति स्वयं को अपने पडÞोसी से श्रेष्ठ समझता हो, तो क्या ऐसे देश में एकता हो सकती है –

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नेपाल में हिन्दी भाषा के “प्रगतिवादी” प्रारम्भिक साहित्यकार सच्चिदानन्द चौवे @ द्दट हिमालिनी l जनवरी/२०१४ मोती को यूँ नही लुटाओ, अश्रु वोंछलो हिम्मत औ विश्वास जगाओ अपने में तुम उठो अपनी ताकत भी तो यही आजमालो कुछ। कदम उठाओ देखोगे तुम डगमग धरती डोल उठेगी सागर का दिल काँप उठेगा और हिमाल हिल जायेगा- नयाँ सवेरा पृ. ९ प्रगतिवादी काव्य का ध्येय मानवतावादी होने के कारण जनवादी और लोककल्याण के भावों का इसमें विशेष रूप से समावेश रहता है। कवि गोविन्द भट्ट और रामहरि जोशी, मंगल कुमार ‘नेपाली’ की र चनाएँ अधिकतर जनवादी हैं। लोक मंगल की भावना इनमें व्यापकता से व्यक्त हर्ुइ हैं – देखकर दीन मनुज की दशा, उबल आते आँखों से प्राण। मनुज कवि रोते तक तुम नही, तुम्हे धिक् नर प्रति तुम पाषाण।। गगन से कह क्या कम है, धरा का चहल पहल आँगन। जहाँ है नीले – पीले खेत, और ये सरिता गिरि कानन।। आज निर्जीवों पर रोना , छोडदो ओ कवि यह निस्सार तुम्हारे धूल का मानव तप्त, बहाओ शीत अश्रु की धार -गोविन्दक भट्ट) रामहरि जोशी ने दीन दुखियों की सेवा को आज के युग का सब बडÞा धर्म बताया है – आज के युग धर्म की आवाज है दीन दुखियों की सभी सेवा करें है यही सबसे बडÞा अब यज्ञ भी तर्ीथ, पूजा, पाठ सब कुछ है यही नयाँ सवेरा पृ. २ आर्थिक विषमता के विरोधी होने के प्रगतिवादी कवियों की र चनाओं में, साम्यवादी विचारों की बहुलता रहती है। साम्यवादी सिद्धान्तों को इनके काव्य में सदैंव र्समर्थन मिलता है। इस प्रसंग में प्रायः स्टालिन, लेनिन और रूस की लाल सेना की भी यदा-कदा प्रशंसा हर्ुइ है। नेपाल के कवि भी इसके अपवाद नही है – पहन चूडिÞयाँ, बाँध जूडिÞयाँ मत बैठो री, आँगन में जनसेवी बन, साम्यवाद का भाव भरो- री जन-जन में।। सुन्दर झा परवसता पृ. ४२ रामहरि जोशी की “मिट्टी के गीत” शर्ीष्ाक कविता में भी साम्यवाद का र्समर्थन मिलता है – सोने के तो गीत वहुत तुमने गाए है, मिट्टी के भी गीत जरा तुम गाओ। मानव ही बन गया यहाँ पर रावण, सोने का पीला रंग चढÞा जब उस पर नया सवेरा पृ. ३७ प्रगतिवादी कवि प्राचीन, जर्ीण्ा रुढिÞयों पर आधारित समाज को वदलकर, उसमें व्याप्त आर्थिक विषमता दूर कर, एक नवीन आदर्श समाज की स्थापना करने की कामना करते है। यह कामना हमारे देश के हिन्दी कवियों की रचनाओं में भी मिलती है – ऐसा हम राज्य बनाएँगें। कोई न जहाँ होगा नंगा, कोई न रहेगा भिखमंगा सबके मानस से फूटेगी, प्रेयसि मानवता की गंगा भूलोक यही कि अन्य कहीं, कोई न समझ ये पायेंगे उस दिन भू को साकेत समझ, सुर भू पर फूल चढÞाएँगे सब प्राणी भी शिक्षित होगे, शुचि मन्त्रो से दीक्षित होंगे सव वादों से परे जहाँ, सब रामराज्य इच्छित होंगे “स्वयंवरा”- र्सर्ूयनारायण दास संक्षेप में नेपाल की हिन्दी कविता में छायावादी, रह

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