एक वर्षमें संविधान मिलेगा
०संविधानसभा की दूसरी बडी राजनीतिक पार्टर्ीीमाले ने आप पर इतना भरोसा किया है। बहुत बडी जिम्मेबारी दी गई है आपको, संविधान निर्माण के लिए। कैसा महसूस हो रहा है – – निःसन्दहे , सं िवधान निमार्ण् ा म ंे सहभागी हाने े का अवसर पाकर म गवर् महससू कर रही ह।ँू ले िकन साथ साथ थाडे ीÞ चिन्तित भी ह ँू यह

सोचकर कि क्या इस जिम्मेवारी को पूरा करना आसान होगा – विगत के अनभु व आरै दशे की वतर्म ान परिस्थिति क े कारण कछु भयभीत ह।ँू
०राजनीतिक पार्टर्ीीी बात करें तो सभी दल आन्तरिक विवाद में फँसे हुए हैं, दूसरीे तरफ दलों के बीच भी बहुत ज्यादा विभेद है, संविधान के आधारभूत मुद्दों को लेकर बहुत सारे विभेद हैं। ऐसे मे संविधान का बनना कैसे सम्भव है

– – राजनीतिक दलों में आन्तरिक विवाद है और अन्य दलों के साथ भी विभेद की स्थिति है, इसमें कोई दो मत नहीं। लेकिन एक बात निश्चित है कि संविधान तो बनना ही है और बनेगा भी। सभी दल ने अपने घोषणा पत्र में संविधान बनाने की प्रतिबद्धता को व्यक्त किया है। एक वर्षके अन्दर में संविधान बनाने के लिए सभी दल को थोडÞा-बहुत संझौता करना होगा, हठ त्यागना होगा और जनता की भावनाओं को समझ कर संविधान निर्माण में लगना होगा। संविधानसभा की पहली बैठक से ही विगत संविधान सभा में हर्ुइ सहमति का स्वामित्व लेने की प्रक्रिया शुरु हो गई है। कुछ दल ने इसमें आपत्ति भी जनाई है, उन सभी को सहमति में लाकर आगे बढÞना होगा। बाँकी जो विवाद है खास कर शासकीय स्वरूप और राज्य पर्ुनसंरचना तो इसमें भी दलों के बीच समझदारी बनेगी। और जनता को एक वर्षमें संविधान मिलेगा। यह अलग बात है कि मेहनत कुछ ज्यादा करनी होगी।

० राष्ट्र की आधी जनसंख्या का आप प्रतिनिधित्व करती हैं, लम्बे अरसे से राजनीतिक और सामाजिक कार्य में भी लगी हैं, आप को क्या लगता है- क्यों पीछे है महिला – और इसका समाधान क्या है – –
यह सामाजिक दृष्टिकोण की बात है। सनातन युग से समाज ने महिला को कमजोर, अबला और पर निर्भर जीव की तरह देखा है और व्यवहार भी वैसा ही होते आया है। समाज के व्यवहार से महिला खुद भी अपने आपको कमजोर समझने लगी और उसने खुद को चाहार दीवारी के अन्दर समेट लिया। समय के साथ बहुत कुछ परिर् वर्तन हुआ है महिलाएँ राजनीति, व्यापार और सञ्चार क्षेत्र में आ र ही हैं। उन लोगों की प्रतिभा देख कर मेरा भी मन गद्गद् हो उठता है लेकिन यह संख्या पर्याप्त नहीं है। आधा आकाश कहलाने वाली महिला जब तक राजनीतिक, आथ्ािर्क और वैचारिक क्षेत्र में आगे नहीं आयेगी, महिला की अवस्था में खास परिवर्तन नहीं हो पायेगा। आर क्षण के नाम पर कुछ महिला संविधानसभा में सदस्य बन जाने से समस्या समाधान नहीं होगा। हमारी सबसे बडी कमजोरी है कि महिला की समस्या को हमने कभी राष्टी्र य समस्या क े रूप म ंे नही ं लिया। महिला राष्ट ्र की सम्पति ह,ै राष्ट्र का अंग है और आधा से भी ज्यादा जनसंख्या का प्रतिनिधित्व कर ती ह ै ता े इसकी समस्या का े राष्टी्र य समस्या समझना चाहिए। आरै म ैं इसका े राष्ट ्र क े मद्दु े क े रूप म ंे स्थापित करन े की काे िशश करूगं ी। ०
महिला के साथ साथ आप मधेश से भी सम्बन्ध रखती हैं जहाँ कि महिला की स्थिति तुलनात्मक रूप में और ज्यादा नाजुक है, उन लागों के लिए आपने क्या सोचा है – –
सबस े पहल े ता े म ंै यह बताना चाहती ह ँू कि मधशे म ंे सिर्फ महिलाआ ंे कि हालत नाजकु नही,ं परुु ष की अवस्था भी वसै ी ही ह।ै अशिक्षा और बेरोजगारी ने सभी को निराश बना रखा है। धनुषा, सप्तर ी, सिरहा की बात कर ंे ता े पत््र यके दिन हजारा ंे यवु ा विदशे पलायन कर रह े ह।ंै आरै महिला की अवस्था इसस े भी नाजकु ह।ै अशिक्षा, बरे ाजे गार ी, अन्ध विश्वास, साँस्कृतिक कुरीति ने मधेशी महिला को और ज्यादा परेशान किया है। एक बात तो निश्चित है- राजनीतिक सशक्तिकरण क े अभाव म ंे महिला विकास सम्भव नही।ं ले िकन दसू री तरफ दखे ंे ता े लगातार मधशे म ंे भी परिवतर्न का असर हा े रहा ह।ै इस बीच मधशे क े नाम पर बहुत से राजनीतक दल भी खुले, समावेशी के नाम पर कुछ फायदा भी हअु ा ह ै ले िकन मधशे या मधशे ी महिला स े ज्यादा नते ाआ ंे को लाभ हुआ है। नेकपा एमाले का घोषणापत्र में मधेश और मधेशी महिला के विकास के बारे में स्पष्ट खाका तैयार है। और इस दल के प्रतिनिधि होने के नाते पार्टर्ीीे घोषणापत्र के अनुसार मैं आगे बढूंगी। जहाँ तक मेरा व्यक्तिगत मामला है तो राजनीतिक और सामाजिक रूप से मधेशी महिला के लिए जो सशक्तिकरण अभियान शुरु किया गया है, वह जारी रहेगा। उनकी क्षमता, चेतना अभिवृद्धि के लिए मैं दत्तचित्त हो कर लगी रहूँगी। पद मिल गया, संविधान सभा की सदस्य बन गयी इसमें मंै सन्तुष्ट नहीं। लेकिन एक बात मैं फिर कह दूँ- जब तक आवाज बुलंद नहीं होगी तब तक कोई विकास सम्भव नहीं।

