उन्मुक्ति हो या मधेश काठमांडू को षडयंत्र ही दिखता है : अजय कुमार झा
अजय झा, जलेश्वर । राजनीति का मुख्य भोजन खून है; खून के लिए हिंसा आवश्यक होता है। और हिंसा का सबसे सुरक्षित श्रोत और प्रेरक तत्व राजनीतिक सिद्धांत और संस्था होता है। नेपाल के राजनीतिक परिवेश और संस्कार में भी इन्हीं पोषक तत्वों का भंडार समाहित है। अमानवीय नृषंश हत्या-हिंसा और निर्दयता नेपाली राजनीति का संस्कार रहा है। सत्ता के लिए जंग बहादुर राणा ने वि सं 1903 में गगन सिंह थापा का हत्या के साथ साथ कोत पर्व जैसे 400 से अधिक लोगों को अत्यधिक क्रूरता के साथ हत्या करना, इसके बाद भंडार खाल पर्व के नाम पर सैकड़ों का हत्या करना, फिर अपनी ही राजा राजेंद्र के साथ हिंसक घटनाओं का अंजाम देकर उन्हें बंदी बनाना। ईस प्रकार से राजनीतिक हिंसा के अनेकों उदाहरण राजदरबार के भीतर ही देखा जा सकता है। इन सभी क्रूरताओं को पार करने में सफल और मूढ़ पशुवत नेपालियों को गौरवांवित करने वाली घटना तो माओवादियों के द्वारा जनक्रांति के नाम पर 25 हजार नेपालियों का नृशंश हत्या है। राजा वीरेंद्र के परिवार और सहयोगियों के साथ किए गए अमानवीय कृत्य विश्व क्रूरता का उत्कृष्टतम नमूना। सायद इससे बड़ा राष्ट्रघाती कृत्य नहीं हो सकता। नेपाली जनता के हृदय के धड़कन प्रिय राजा के वंश का सामूहिक हत्या विदेशियों के इसारे पर करने के बाद हम नेपाली ही गौरव का अनुभव कर सकते हैं।
हजारों कर्तव्यनिष्ठ और गरीब नेपालियों को खुद की सत्ता प्राप्ति के लिए गोली मारकर नृशंस हत्या किया जाना क्या हिंसा नहीं था ? सैकड़ों वर्षों से राजनीतिक अधिकार से वंचित किया गया समुदाय को अपना भविष्य और अधिकार के लिए आवाज उठाने पर उसे दोषी करार देना, घोर दमन करना, सत्ता के बल पर अपनी ही नागरिकों के साथ बलात्कार करना क्या राष्ट्रवादी का प्रमाण है ? एकही संविधान में मधेशी, जनजाति और थारू के लिए दमनकारी न्याय और खसार्य के लिए मुक्तिदायक न्याय से क्या नेपाली राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा ? न्याय सम्पादन के क्रम में कभी कभी अदालत भी चुकता हुआ दिखाई देता है।
जबकि कानून सब के लिए बराबर होना चाहिए। कानूनी व्यवहार में दावपेंच तथा अपना पराया जैसा व्यवहार ही राष्ट्रीय अखंडता के लिए चुनौती खड़ा कर देता है। राष्ट्र के विश्वनीयता पर कलंक चिन्ह लग जाता है। क्षणिक लाभ अथवा अहंकार के पुष्टि के कारण राष्ट्र विखंडन की ओर लुढ़कने लगता है। एक सार्वभौम राष्ट्र में किसी खास वर्ग के जनता के प्रति इस प्रकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार सामूहिक अदुरदर्सिता और विवेक शून्यता का द्योतक भी माना जाएगा। यह सोच राष्ट्र को भीतर से खोखला और बाहर से घृणा का केंद्र बना देगा। राजनीतिक दूरदर्शिता और संस्कार इसी घड़ी में काम आता है। वैसे हमारे नेताओं और प्राज्ञों में इन दोनों तत्वों की कमी है। जातीय अहंकार और पदीय उन्माद के अंधेरे कोठरी से गरजने में अपने को वीर बहादुर समझने वाले माओवादी के डर से पेंट में ही दिशा पिसाब करते थे। यह किसी से छुपा नहीं है। आज गगन थापा, विश्व प्रकाश और कोइराला लगायत बहुतों के कलेजे में रेशम चौधरी के नाम से ही आग लग जाता है; तो प्यारे! हजारों नेपालियों को मौत के घाट उतारने बाला माओवादी को अपना अभिभावक किस तरह बनाए? कौन सा आदर्श और न्याय था इसमें? अरे, उसने तो सरकार को ही पीछे कदम रखने पर मजबूर कर दिया था। और तुमलोग बहादुरी के साथ पीछे लौटते रहे। कांग्रेस का मातृभूमि मधेस भी उसके हाथों से छीन गया। लेकिन अहंकार ज्यों का त्यों गरज रहा है। इसे ही सामूहिक मूढ़ता कहते हैं।
तो क्या यह भी सीखना होगा कि लोकतंत्र में कानून सब के लिए बराबर है? यह बराबरी का अधिकार न मिलने पर जनता सड़क पर उतरने को बाध्य हो जाती है। जो धीरे धीरे संघर्ष का रूप धारण कर लेती है। मूलतः इसका दोषी सरकार को ठहराया जाता है। लेकिन सत्ता स्वार्थ और क्षुद्र बुद्धि के कारण सरकार अत्याचार के राह को अपनाकर दमन के द्वारा आम जनता के भावना को कुचलने का अक्षम्य अपराध करना शुरू कर देती है। इस तरह अधिकार प्राप्ति के लिए लड़ाई और संघर्ष के क्रम में भौतिक और मानवीय क्षति होना स्वाभाविक हो जाता है। संघर्ष के क्रम में सरकारी क्रूरता के कारण वीरगति को प्राप्त हुए नागरिकों को शहिद का दर्जा मिलना विश्वव्यापी मान्यता है। क्या इतनी भी समझ नहीं है? अरे मूढ़ो! हक और अधिकार का लडाई नहीं था तो मधेस से तुम्हारा जड़ कैसे सफाया हो गया? रेशम चौधरी के पिता, पत्नी और पार्टी को इतना जनमत कैसे प्राप्त हुआ? सिके राउत को इतना जबरदस्त समर्थन किसने दिया है? क्या घंटी की टंकार कान में नहीं गूंज रही है? भौतिक अंधापन से कई गुणा खतरनाक बौद्धिक अंधापन होता है। विदेशियों के इसारों पर नाचने बालों के पास सच्चाई को देखने का न हिम्मत होता है, न क्षमता।
कितनी बड़ी विडंबना है कि नेपाल के शीर्ष नेतागण बड़ी निर्लज्जता और गौरव के साथ ( राजनीति करानेबालों को दस पंद्रह वर्ष जेल नेल काटा हुआ होना चाहिए ) ऐसा अभिव्यक्ति देते हैं। और हमारे पत्रकार तथा संचार माध्यम इसे महावाणी के सगौरब प्रसारण करते हैं। अब तो इसका सीधा मतलब हुआ कि नेपाल में राजनीतिक प्रतिष्ठा पाने के लिए आजीवन कारावास मिले इसतरह का भीषण, घिनौना और अमानवीय अपराधी होना होगा। क्या यह राष्ट्रीय संस्कार पर प्रश्नचिह्न खड़ा नहीं करता है?
प्रचंड जी और माओवादी नेताओं से एक प्रश्न करना चाहता हूं। प्यारे, 2074 के चुनाव में ओली के शरणागत होकर अपना अस्तित्व बचाने में सफल हुए। ईसबार कांग्रेस के शरणागत होकर किसी तरह अपना अस्तित्व कायम रख सके। अब आगे क्या होगा? कभी सोचा है? जनता के गरिमा और राष्ट्र के महिमा के ध्वंसक; आप ने अपनी संतान के भविष्य सुनिश्चित करने के सिवाए किया ही क्या है? राष्ट्रीय राजनीतिक संस्कार को धूमिल और अपमानित करना ही आपका एकमात्र उद्देश्य लगता है। तो उधर कांग्रेस नेतृत्व को द्विविधा का काला बादल घेरे हुए है। आंतरिक सत्ता लिप्सा में उलझे कांग्रेस को न अपना भविष्य दिखाई दे रहा है और न देश का। जनता के सहज मत से विजय प्राप्त करनेवाला रेशम चौधरी और उनके पार्टी के प्रति जनता का उल्लेख्य समर्थन को नजर अंदाज करना राष्ट्र में विद्रोह के लिए जनता को उकसाने के अलावा और क्या हो सकता है? गगन थापा, विश्व प्रकाश और कोइराला लगायत को इतना भी बोध नहीं है और चले हैं सरकार का नेतृत्व करने! अरे मूढ़ता की भी कोई सीमा होती है यार!
इस बार किसी प्रकार का राजनीतिक आंधी नहीं था; आम नागरिकों ने नेताओं के काम को मूल्यांकन करके मतदान किया है। परिणाम में मधेशी दलों का अस्तित्व भी ढह गया। लेकिन, रेशम चौधरी के समर्थन में वहां के लोगों में आज भी उतना ही जोश और जुनून है। इसी तरह सि के राउत के प्रति भी वही जोश और जुनून दिख रहा है। इस जुनून के साथ खिलवाड़ करना अस्तित्वहीनता का द्वार खोल सकता है। अतः भैंस बुद्धि से ऊपर उठकर प्रज्ञा का अनुसरण करें! खुद भी पशुता से ऊपर उठें और अपनी कार्यकर्ताओं को भेड़चाल से मुक्ति का मार्ग खोलें। इसी में हम सबका सामूहिक कल्याण है। राष्ट्रीय अस्तित्व का खयाल है।
जरा सोचिए, पंचायत कल में बहुदल के लिए संघर्ष हुआ। लोग सहिद हुए। जनता को दमन करने का आरोप किस पर लगा? सरकार पर कि आंदोलनकारी पर ? झापाली कान्ड में लोगों की हत्या हुई। बहुदल आन्दोलन में लोग मारे गए। माओबादी आन्दोलन में नेपाली भूमि नेपाली जनता के रक्त से लाल हो गई। मधेश आन्दोलन में मधेश की भूमि को मधेसियों के लाशों से भर दिया गया। थारुवान आन्दोलन में अमानवीय क्रूरताओं की हदें लांघ दी गई। इन सभी घटनाओं में को मारे गए वो सभी नेपाली नागरिक ही थे। और कितनी बड़ी विडंबना है कि, ए सारे लोग लोकतांत्रिक प्रणाली में अपनी अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए मारे गए। इसका क्या मतलब निकाला जाए? क्या यह देश मुट्ठीभर खसार्य का बपौती है? अगर अहंकार यही है, तो परिणाम भीषण हो सकता है। और दुर्योधन को जब कृष्ण ने भी नहीं समझा सका तो इन मूढ़ों को हम जैसे क्या समझा पाएंगे।
जरा ध्यान से देखा जाए कि नेपाल के सत्ता में कैसे कैसे लोग निर्णायक भूमिका में विराजमान है; तो आप पाएंगे, हत्यारा, लुटेरा, देश वेचुवा, दलाल, वैदेशिक एजेंट और षडयंत्र के महारथियों से ही संसादको सुशोभित करना है तो फिर रेशम चौधरी जैसों से कैसा आपत्ति? रेशम चौधरी से डर किसको है? ध्यान रहे! वंशावादियों के अलावा रेशम और सिके राउत जैसों से अन्य किसी को कोई भय नहीं है। लेकिन मधेसवादी भी रेशम और राउत से भयभीत रहते हैं। इन दोनों की मौजूदगी मधेस वेचुवाओं के लिए प्राण घातक सिद्ध हो गया है। और यह भयारस पहाड़ तक फैलेगा ही। आम नेपाली नागरिक वंशवादी और परंपरावादियों से उन्मुक्ति खोज रही है। अतः समझदारी से पेश आने में ही भलाई है। अन्यथा अपने वंश की सुरक्षा के लिए शरणस्थल खोजना मुस्किल हो जाएगा। भविष्य की संभावित दुर्घटनाओं को वर्तमान में हीं भाप लेना बुद्धिमानी है। बुद्ध के संतति को युद्ध में नहीं प्रज्ञापूर्ण समझदारी में गौरव करना चाहिए। दमन में नहीं समझ में गौरव करना चाहिए। हिंसा में नहीं सहिष्णुता में सौभाग्य ढूंढना चाहिए। घृणा से नहीं प्रेम से प्रभुत्व को प्राप्त करना चाहिए। षडयंत्र में नहीं सम्यक समर्पण से सौंदर्य को प्राप्त करना चाहिए। यहीं से नेपाल और नेपालियों के सुंदर भविष्य का द्वार होगा।



