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अवकाश क्यों नहीं ? : डॉ शशि कला लढ़िया

 

अवकाश क्यों नहीं???
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धरती कहना चाह रही है,
एक भूली बिसरी,
दर्द और टीस भरी कहानी।
एक हसीन दौर था,
जब उस पर लहराती थी,
चूनर,
हरी,पीली,धानी।
पहले ना थी,उसकी छाती,
इस तरह अगणित, दरारों से विदीर्ण।
ना थीं मानव की संवेदनाएं,
इतनी संकीर्ण।
सरसता का स्रोत,
प्रतिक्षण किए रहता था,
उसे स्नेह से आप्लावित।
आज छिन रहा है,उस सुहागिन का श्रृंगार।
लुट रहे हैं उसके ज़ेवर,
शाला,पलाश,अमलताश।
और लूट का माल ,,,,,,
कोई भी वापस करने की,
नीयत नहीं रखता।
और ना ही उसे,
प्यार से सहेजता है,,,,,
मानव की बेरहमी का,
राई रत्ती हाल,जानती है धरती।
फिर भी दिन-प्रतिदिन,
समृद्धि उलीच कर भी,
लुट रही है,
कराह रही है,
धरती ।
किसी को अवकाश नहीं है सुनने का,,,,,
लेकिन फिर भी,
कहना चाह रही है,
अपनी छिनी हुई,
दौलत के बीते दिनों के,
सुख की कहानी।
धरती,
दुखियारी धरती।
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डॉ शशि कला लढ़िया

डॉ शशि कला लढ़िया
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