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नेपाल का कुम्भ मेला

 

मनिषा मिश्र:नेपालवासी भी कुम्भ स्नान के लिए भारत के चार जगहों पर उपयुक्त समय अनुसार जाते है जैसेः
हरिद्धार कुम्भ राशि मे बृहस्पति और मेष राशि मंे र्सर्ूय रहने पर ।
प्रयाग -इलाहाबाद) मेष राशि में बृहस्पति और मकर राशि मे र्सर्ूय रहने पर । nepal kumbhamela
नासिक सिंह राशि में बृहस्पति और मेष राशि मे र्सर्ूय रहने के समय ।
उज्जैन यहाँ भी मेला नासिक के समय ही लगता है ।
कबीरदास जी कहते है “कस्तुरी कुण्डली बसे, मृग ढुढंे बन माहि । ” वही हाल हम नेपालवासी का है, हम अपनी इस पावन धरा कीे बहुत सी विशेषताओं से अनभिज्ञ हैं । मै जगतगुरु मुकुसन्दशरण देवाचार्य जी का आभार व्यक्त करती हुँ कि उन्होंने हमें इस बराहक्षेत्र स्थित चतराधाम और कुम्भ मेला के बारे में इस तरह वर्ण्र्ााकिया और कुम्भ के महत्व को समझाया
वराह क्षेत्र में ही नारायण के प्रथम अवतार वराह भगवान का करीब दो अर्ब बर्षपहले अवतार हुआ था । नेपाल का यह दूसरा पर्ूण्ा कुम्भ मेला है । इससे पहले २०५९ साल मे हुआ था । २०६४ साल मे अर्ध कुम्भ मेला लगा था ।
जगत्गुरु के कथनानुसार देवताओं और असुरों के द्वारा जिस क्षीर सागर का मन्थन हुआ था वो भी यही है । विष्णु भगवान मोहिनी का रूप धारण कर अमृत बाँटने का स्थान भी यहीं है । अमृत बाँटने के पश्चात नारायण भगवान जिस कौशिकी नदी में स्नान किये थे वो नदी भी यही कोशी नदी है । अमृत कुम्भ से भारत में चार जगह बुन्द गिरा -हरिद्धार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन) जो कुम्भ मेला के रुप में प्रचलित है ।
अमृत बाँटने के बाद नीचे का गाढा अमृत यहीं कौशिकी नदी मे गिरा था और उसी का पिण्ड बनाया गया जो हाल मे पिण्डेश्वर महादेव के रुप मे प्रचलित है ।
२ मई -१९ गते बैशाख) को भारत के प्रसिद्ध संत शिरोमणि, महामण्डलेश्वर योगीराज पाइलट बाबाजी के स्नान करने के लिये चतराधाम मे आगमन हो रहा है । महायोगी पाइलट बाबाजी के चरित्र का चित्रण चन्द कागज के पन्नों पर करना मेरे लिये असम्भव है, वो असीम हैं । वो हिमालय के सिद्ध योगी हंै, जो इस जगत में अपना आनन्द, अपना प्रेम, अपनी करुणा, अपना सङ्कल्प, अपना अनुग्रह, अपना आत्मजागरण बाँटने आये हंै । मेरी नजर मंे तो वो एक पर्ूण्ा कुम्भ हंै जो अपना अमृतरूपी आर्शीवाद अपने सभी शिष्यों मे बाँटते हंै ।

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