Sun. May 19th, 2024

अजय कुमार झा, हिमालिनी अंक मई । बरसों से सुनता और पढ़ता रहा हूं, “कि नेपाल में हिंदी की अवस्था दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही है । हजारों के मुख से अनेकों कार्यक्रमों में एक ही बात सुनाई देती है कि नेपाल में हिंदी की अवस्था कमजोर है । सरकार इसे कमजोर करना चाहती है, जबकी हम इसे मजबूत करना चाहते हैं ।” अब यह प्रश्न उठता है कि सरकार हिंदी को क्यों कमजोर करना चाहती है ? और हम जब उठाना चाहते हैं तो हम उठा क्यों नहीं पा रहे हैं ? क्या हम समस्या के जड़ को नहीं पहचान पा रहे हैं ? अथवा हिंदी की जो मौलिक समस्या है उसको हम नहीं समझ पा रहे हैं ? अथवा जिस जिम्मेदारी के साथ हमें काम करना चाहिए हमें उसका बोध नहीं है ? कहीं ना कहीं आधुनिकता के दवाब और हमारे काम करने की परंपरागत सोच और शैली में तालमेल नहीं होने से जो हमारा लक्ष्य है वह पूरा होता नहीं दिख रहा है ? परिणामतः चारों ओर एक निराशा और हताशा का वातावरण बनता दिख रहा है ।
हमें ध्यान यहां देना होगा कि भाषा के रूप में विश्व में परिचित बहुत ही सरल सहज स्वीकार्य हिंदी नेपाल में कमजोर क्यों हुई ? अंग्रेजियत के कारण ? अथवा सरकारी संयंत्र के कारण ? अथवा विदेशियों के कठपुतली नेपाल सरकार को उनके द्वारा दिया गया निर्देश ? या अन्य देशों के द्वारा नेपाल में हिंदी और हिंदुस्तान की उपस्थिति को कमजोर करने के षडयंत्र के कारण ? हमें इस बात को गंभीरता पूर्वक समझने की और ईमानदारी पूर्वक विचारने का प्रयास करना चाहिए ।

हिंदी की रोटी खानेवालों को भी चन्द पैसों के लोभ में हिंदी के विरुद्ध किए जा रहे षडयंत्र का सक्रिय हिस्सा बनते देखा जाता है । तो फिर सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ? हिन्दी के नाम पर अनेकों संस्थाएं यहां काम कर रही हैं । कालेजों में पढ़ाई की भी व्यवस्था है । स्कूली पाठ्यक्रमों में भी ऐच्छिक विषय के रूप में हिंदी रखने की व्यवस्था थी । लेकिन ये सब शून्य कैसे होता चला गया ? यह विचारणीय है । हमारी जड़ों को कोई खोखला करने में सक्रिय है और हमें इसका भान तक नहीं होता है । यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है, चुनौती है । रहस्यमयी अध्यात्मिक संसार में महारथ हासिल करने वाले हिन्दुओं को दो कौड़ी के मुट्ठीभर अंग्रेजी व्यापारी कब गुलाम बना गए इसका पता तक नहीं चला । एक समृद्ध सनातन संस्कृति के ऊपर मुट्ठीभर लुटेरे बारबार आक्रमण करते रहे और हम उसका समुचित प्रतिकार तक नहीं कर पाए; आखिर क्यों ? क्या हमसे वो ज्यादा ताकतवर थे ? अथवा भौतिक रूप से समृद्ध थे ? नहीं, कोई समृद्ध समाज हजारों मील दूर कठिन यात्रा कर धन लूटने क्यों जाएगा ? प्राण की बाजी लगाकर वही लोग लूटपाट मचाते हैं जिनका पेट खाली होता है । और जीना मुश्किल हो जाता है । इधर समृद्ध लोग उदार और सुविधा भोगी होने लगते हैं । ज्ञान का क्षेत्र विस्तृत होने के कारण उन्हें आत्म सुरक्षा के भौतिक और समारिक प्रबंधन का खयाल ही नहीं रहता है । परिणाम; जो सनातन हिन्दू समाज भुगतता आ रहा है ।

६ मई २०२३ को जलेश्वर स्थित पत्रकार महासंघ के सभाकक्ष में बहुभाषिक गद्य साहित्य अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में नेपाल के धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट भारत के मधुबनी और सीतामढ़ी के साहित्यकारों की सौहार्दपूर्ण उपस्थिति देखी गयी । हिंदी, भोजपुरी, मैथिली, बज्जिका, नेपाली, थारू, मगही आदि भाषाओं को संरक्षित करने के लिए अपनी–अपनी ओर से साहित्यिक रचना कर विशेष योगदान पहुंचाने वाले विद्वानों को एक मंच पर मौजूद देख सभी विद्वानों ने मुझे तो धन्यवाद दिया ही; साथ ही “साहित्य संवर्धन समिति” नामक संस्था को धन्यवाद दिया । अपने साहित्य वाचन के क्रम में भारत से आए अतिथियों में से श्री भुवनेश्वर चौधरी जी ने कहा कि हिंदी हमारे संस्कार और संस्कृति का द्योतक और अविच्छिन्न संवाहक है । इसके बिना मानवता अधूरी मानी जाएगी । जन्म से लेकर मृत्यु तक की मानवीय संवेदना और सामाजिक सद्भाव को सुमधुर बनाए रखने में सहायक हिंदी भाषा हमारे हृदय सिंहासन पर विराजमान है । जल्द ही यह विश्व हृदय के वीणा के तारों को झंकृत कर देगी । और हिंदी की मधुर झंकार भूमंडल के कोने कोने में झंकृत होती सुनाई देगी ।

इसी प्रकार सर्लाही से पधारे श्री शिवचंद्र चौधरी जी ने कहा कि मेरी मातृ भाषा बज्जिका जरूर है; परंतु मैं सपना भी हिंदी में ही देखता हूं । पूरे मधेस और समग्र नेपाल को एक सूत्र में पिरोने की क्षमता रखनेवाली भाषा यदि कोई है तो वह हिंदी ही है । विश्वमंच पर नेपाल और नेपालियों को भी जोड़ने का काम हिंदी ही करती आई है । इसी तरह हमारे निमंत्रण को स्वीकार कर रौतहट से पधारे साहित्यकार श्री विंदा सहनी जी ने नेपाली भाषी लोगों में मधेसी और मधेस के भाषा प्रति अनुभव से देखे गए क्षुद्रता को उजागर करते हुए मधेस में सक्रिय सभी मातृ भाषी अभियानियों से अपील करते हुए कहा कि हमें आपस में भाषा के नाम पर लड़ना नहीं है बल्कि अपनी अपनी मातृ भाषा को समृद्ध करने के लिए उत्कृष्टतम साहित्य रचना करना चाहिए । जब हम देवनागरी लिपि को मातृ लिपि मान बैठे हैं तब इस लिपि में संचरित सभी भाषा सहोदरी है, हमारी है । प्रमुख अतिथि के मर्यादा में अपनी मंतव्य रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्री युगल किशोर लाल कर्ण जी ने मधेस और जलेश्वर के ऐतिहासिकता पर जोर देते हुए कहा कि मंदिरों के दीवाल और उसपर अंकित शिलालेखों से पता चलता है कि जब दुनिया लिखना पढ़ना भी नहीं जानती थी उस समय हमारे पास पत्थरों पर लिखने का सामथ्र्य था । लेकिन राजनीतिक षडयंत्रों के कारण हम खुद अपनी ही मिट्टी से अनजान बनते जा रहे हैं । हमें हमारी मिट्टी को फिर से खोदकर उसमें दबे हुए रहस्यों को प्रकाशित करना होगा । अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकार श्री महेश्वर राय जी ने कहा कि हिंदी भाषा ने ही नेपाली शिक्षा प्रणाली को जन्म दिया है । नेपाल के सारे के सारे साहित्यकार, विद्वान, प्रशासक और शिक्षक – प्राध्यापक हिंदी भाषा से अनुप्राणित है । सब के हृदय में हिंदी विराजमान है । परंतु राजनीति दुश्चक्र के कारण और मधेसी विरोधी तुच्छ मानसिकता को पोषण करने के हेतु से हिंदी को योजनाबद्ध रूप में नेपाल से विस्थापित किया गया है । खासकर मधेसियों के जड़ों को खोखला करने के उद्देश्य से सरकारी पक्षों के द्वारा कुछ बिकाऊ मधेसियों को ही प्रयोग में लाया गया है । जिसका प्रभाव आज मातृ भाषा के नाम पर हो रहे संघर्ष के रूप में सरेआम दिखाई देता है । दुःख की बात तो यह है कि, किसी को भी अपनी मातृ भाषा से प्रेम नहीं है । अभियानी लोग भी अपने बच्चों को उस भाषा में पढ़ाना नहीं चाहते हैं । लेकिन सरकार द्वारा प्राप्त पोषण के कारण अन्य भाषा भाषी को गाली देने में पीछा नहीं पड़ते । इन्हें समाज में भाषा के नाम पर सिर्फ अराजकता फैलाना है । न की भाषा को समृद्ध करना है । उक्त कार्यक्रम में कूल मिलाकर यह देखने को मिला कि हम अपनी अपनी मातृ भाषा को समृद्ध करने का प्रयास करें, लेकिन सभी मातृ भाषाओं का संरक्षक और संबर्धक हिंदी को राज मुकुट धारण करके आगे बढ़ें । हिंदी रूपी बुलेट ट्रेन में मैथिली, भोजपुरी, अवधी, मगही, बज्जिका, अंगिका, थारू, नेपाली, किराती और खस भाषा रूपी बोगी को जोड़कर ही हम विश्वात्मा बन सकते हैं । हिंदी को कुचलने की सोच सूर्य को दीपक दिखाने के समान मूढ़ता का द्योतक होगा ।

नेपाल एक बहुभाषिक, बहुसांस्कृतिक, बहुधार्मिक और बहुसामाजिक देश है । गंभीरता पूर्वक देखा जाए और बृहत दृष्टिकोण से परखा जाए तो नेपाल एक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है देश नहीं । मैं फिर से कह रहा हूं राष्ट्र है देश नहीं । लेकिन दुर्भाग्य ! यह है कि इसे राष्ट्र बनने की गरिमा से षडयंत्र पूर्वक वंचित किया जा रहा है । अब नेपाल को हमें महाराष्ट्र बनाने दिशा में निर्णायक भूमिका निर्वाह करना चाहिए । और इसके लिए सांस्कृतिक जागरण तथा भौतिक विकास हेतु आंदोलन करना होगा । इसके लिए एक सार्वभौम तथा सर्वसुलभ, सहज भाषा को माध्यम के रूप में अंगीकार करना होगा । स्वतःस्फूर्त भावनात्मक संप्रेषण बिना विराट एकता की कल्पना करना अंधे के नेतृत्व में महाभारत लड़ने के समान पीड़ादायक सिद्ध होगा । अतः इस विराट अभियान तथा फिर से विश्वगुरु बनने के राह में हमारे लिए सहज और सरल भाषिक माध्यम क्या हो सकता है इस पर खुले दिल से संवाद किया जाय तो हम पाएंगे की हिंदी भाषा में ही वह सामथ्र्य है; जो दक्षिणी एशियाई देशों को तो पूर्ण रूपेण एकता के सूत्र में जोड़ेगा ही साथ ही विश्व में भी संवाद के माध्यम के लिए सहज यान के रूप में प्रवाल भूमिका निर्वाह कर सकती है । तो फिर जानते हुए हिंदी से नफरत क्यों ? क्या इस राष्ट्र को महाराष्ट्र होने के पक्ष में हिंदी भाषा रोड़ा के रूप में अवरोधक है ? अथवा सहजयान के रूप में संबर्धक है ? इस पर हमें विहंगम दृष्टिकोण से विचारना चाहिए कि नहीं ?
वैश्विक पटल पर हिंदी भाषा की अवस्था

आज हिंदी को पहले की भांति वैश्विक धरातल प्राप्त हो रहा है । विश्व के कई देशों में हिंदी के प्रति आकर्षण का आत्मीय भाव संचरित हुआ है । वे भारत के बारे में गहराई से अध्ययन करना चाह रहे हैं । विश्व के कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में हिंदी के पाठ्यक्रम संचालित किए जाने लगे हैं । विश्व के कई देशों के नागरिक हिंदी के प्रति अनुराग दिखा रहे हैं । इतना ही नहीं आज विश्व के कई देशों में हिंदी के संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं । जो वैश्विक स्तर पर हिंदी की समृद्धि का प्रकाश फैला रहे हैं । भारत के साथ ही सूरीनाम फिजी, त्रिनिदाद, गुआना, मॉरीशस, थाईलैंड व सिंगापुर में भी हिंदी वहां की राजभाषा या सह राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुकी है । इतना ही नहीं आबूधाबी में भी हिंदी को तीसरी आधिकारिक भाषा की मान्यता मिल चुकी है । आज विश्व के लगभग ४४ ऐसे देश हैं जहां हिंदी बोलने का प्रचलन बढ़ रहा है । सवाल यह है कि जब हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ रही है, तब हम अंग्रेजी के पीछे क्यों भाग रहे हैं । हम अपने आपको भुलाने की दिशा में कदम क्यों बढ़ा रहे हैं ।

हिंदी भाषा की अपनी प्राणवायु, प्राणशक्ति व उदारभाव होने के कारण ये शब्दसंपदा संवाद माध्यम का अनूठा उपहार के रूप में विश्व पटल पर शान के साथ विराजमान है । १३० करोड़ की आबादी वाले भारत देश में करीब ७० करोड़ से ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली राष्ट्र भाषा हिन्दी को दुनिया में बोलने वालों की संख्या एक अरब के करीब है । दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली हिन्दी भाषा विश्व की पांच भाषाओं में से एक है । भारत के अलावा अनुमानित ८०० से अधिक दुनिया के विश्वविद्यालयों व पाठशालाओं में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी ने वैश्विक दर्जा प्राप्त कर इसको अवसान की ओर धकेलने वाले क्षुद्रों के स्वरों पर लगाम लगा दिया है । जबकि नेपाल के स्थानीय भाषाओं के दो कौड़ी के तथाकथित अभियानी लोग हिंदी को कुचल कर अपनी मातृ भाषा को संबृद्ध करने का शकुनी संकल्प लिए बैठे हैं ।
विश्व पटल पर अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में सम्मानित हो रही हिन्दी को जो लोग घटिया समझते हैं उन्हें यह भी जान लेना चाहिये कि वैज्ञानिक रिसर्च द्वारा सिद्ध हो चुका हैं कि मस्तिष्क के दोनों हिस्से देवनागरी में ऊपर–नीचे, दाएं–बाएं अक्षर और मात्राएं होने के कारण सक्रिय रहते हैं जबकि अंग्रेजी भाषा में केवल बायां हिस्सा ही सक्रिय रहता है । लखनऊ का बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर कहता है कि हिन्दी पढ़ने से मस्तिष्क का विकास बेहतर तरीके से होता हैं । अभी और अधिक अनुसंधानात्मक परिणाम प्रकाश में आना बाकी है ।

समय की गंभीरता को हृदयंगम करना प्राज्ञों का धर्म होता है । तथा उस गंभीरता को सरल भाषा में जन जन समक्ष प्रस्तुत करना विद्वानों का परम दायित्व है । आज से २० वर्ष पहले का सामाजिक ढांचा और उससे भी बीस साल पहले का सामाजिक ढांचा के बीच तुलनात्मक समीक्षा किया जाय तो हम पाएंगे कि आज के सामाजिक ढांचा में अनंत गुना और अविश्वसनीय परिवर्तन हो गया है । प्राविधिक क्षेत्रों में हुए वैज्ञानिक विकासों से आज के मानव मात्र एक ही गांव में सीमित नहीं है । आज प्रत्येक मिनट में हमें अनेक स्थानों पर मौजूद अपने लोगों और संबंधित क्षेत्र के साथियों से वार्तालाप करना पड़ता है । जिस के लिए सरल और सुलभ माध्यम के रूप हिंदी भाषा का ही इस्तेमाल किया जाता है । चाहे व्हाट्स एप हो या मैसेंजर, इंस्टाग्राम हो या टेलीग्राम, गुगल मीट हो या जूम इन सभी माध्यमों में शामिल होकर अपनी भावनाओं और विचारों को संप्रेषित करने और सभी के लिए ग्राह्य भाषा के रूप में हम हिंदी का ही प्रयोग करते हैं । और आपकी और हमारी बाध्यता भी है । क्योंकि अन्य भाषा में वह सामथ्र्य ही नहीं है । अतः खुद को भटकने से बचाएं और समाज को भटकने से भी बचाने का प्रयास करें । अन्यथा एक दिन अपने ही समाज के लोग तिरस्कार करना शुरु कर देंगे । फिर मारे मारे फिरोगे । उस समय कोई आका काम नहीं आएगा । अपने हो लोग काम आएंगे । अतः षडयंत्र से मुक्त हो खुले दिल से संवाद किया जाय । उद्दात संस्कार ही सम्मान के योग्य होता है । वर्तमान समय में सनातन हिंदू संस्कृति व सभ्यता के संवाहक और संरक्षक हिन्दी के संवर्धन के लिए हमें विहंगम दृष्टिकोण से युक्त हो सक्रिय भूमिका निर्वाह करना चाहिए । धन्यवाद !



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1 thought on “हिंदी के सहोदरी : अजय कुमार झा

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