शिक्षक की दयनियता ! 12वीं कक्षा पास अब होंगे शिक्षकों का बॉस
3 years ago
जनकपुरधाम । हाल ही में नेपाल सरकार द्वारा पेश किए गए शिक्षा विधेयक ने शिक्षकों की गरिमा को और कमजोर कर दिया है। सरकार ने आसानी से शिक्षकों को स्थानीय निकायों के अधीन कर दिया। शिक्षकों के स्थानांतरण, पदोन्नति, नियुक्ति, बर्खास्तगी, पुरस्कार और दंडित करने का अधिकार स्थानीय कर्मचारियों और नेतृत्व के हाथों में हस्तानांतरित कर दिया गया है। एक तरफ जहां शिक्षकों ने स्नातक, स्नातकोत्तर और विद्यावारिधी जैसी उच्च डिग्री हासिल कर ली है, वहीं दूसरी तरफ 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करने वालों को पदोन्नति कर शिक्षकों का बॉस बनाकर भेजा जा रहा है। क्या इसके लिए सरकार को अक्षम, नासमझ, बेईमान या निकम्मा कहा जा सकता है ? सरकार जनता के भोट से बनती है! जनता को योग्य और दूरगामी निर्णय लेने की क्षमता शिक्षक प्रदान करते हैं। अतः आम नागरिक अयोग्य होने का दोष सीधा शिक्षक के ऊपर जाता है। आखिर उसने इतना अयोग्य नागरिक पैदा क्यों किया ? या वह खुद ही अयोग्य है; जिसके कारण उसे योग्य और अयोग्य का भेद तक पता नहीं था ? कही न कही यह प्रश्न जेहन में उठता है। हाँ, यह हमारे ही अविवेकपूर्ण निर्णय का परिणाम है कि आज हमें ऐसे व्यक्ति के अधीन काम करना पड़ रहा है जो हमसे कम पढ़ा-लिखा है। और हम पर हुकूमत जमाता है, यह एक शिक्षक का घोर अपमान है! शिक्षक समाज और व्यक्ति के भविष्य का दर्पण होते हैं। शिक्षक के हाथों में विनाश और सृजन अनायास ही नृत्य करते हैं। यह नृत्य कथक और तांडव दोनों हो सकता है। नर्तक गंधर्व चित्रसेन और महाकाल भी हो सकते हैं। माइकल जैक्सन और ईदी अमीन भी हो सकता है। नेल्सन मंडेला और हिटलर भी हो सकते हैं। शिक्षक चाणक्य ने अपने शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य के माध्यम से एक ओर सम्पूर्ण भारत में एकमात्र मगध सम्राट नन्दवंश के अहंकार को चूर किया, तो दूसरी ओर विश्व विजेता सिकन्दर को उसकी औकात बतायी। यही एक कुशल शिक्षक की गरिमा एवं महिमा है। लेकिन क्या आज के शिक्षक एक प्रतिशत भी उनके तुलना में योग्य हैं? उत्तर जबान पर लटका रहता है; नहीं, असंभव!
सवाल उठता है कि आखिर शिक्षक की ऐसी दयनीय स्थिति क्यों हुई? अन्य सभी कर्मचारी आर्थिक और सामाजिक रूप से सम्मानित और शक्तिशाली दिखाई देते हैं, परंतु शिक्षक अंदर और बाहर से दरिद्र क्यों हो गए? संभवतः अधिकांश शिक्षकों के अंदर न तो ज्ञान है और न ही बाहर का कोई स्वाभिमान। वर्तमान में शिक्षका को न तो पार्टी कार्यकर्ता इज्जत करते हैं और न ही दूसरे दलों से जुड़े लोग। न समाज में कोई इज्जत है न सम्मान। खुद के पढ़ाए विद्यार्थी से भी शिक्षक भयभीत नजर आते हैं । नेताओं के चक्रव्यूह में इतनी बुरी तरह शिक्षक फस गए हैं कि इससे मुक्ति का मार्ग ढूंढना उनके लिए असंभव हो गया है। पार्टियों के दलाली, नेताओं के इशारों पर नाचने में गौरवशाली मानना आज भीषण शाप बन गया है।आज एक भी सभ्य शिक्षक अपनी संतान को शिक्षक बनने की सलाह नही देते हैं। क्या कारण होगा? बस सम्मान! और क्या हो सकता है! वर्तमान समय में ऐसे नागरिकों को ढूंढना मुश्किल है जो पार्टी से जुड़े नहीं हैं, साथ ही उनके द्वारा पढ़ाए गए छात्र भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, इसलिए उन्हें उनसे भी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। ऐसे में प्रतिद्वंद्वी विद्यार्थी के पास अपने गुरु को सम्मान करने के बदले अयोग्यता के लांछना लगाकर बदनाम कर परास्त करना ही एक मात्र ध्येय रह जाता है। फिर यदि वे चुनाव जीत जाते हैं और मेयर, डिप्टी मेयर, सांसद, मंत्री बन जाते हैं, तो वो अपनी गुरु से भी जी हजूरी की अपेक्षा करने लगता है। जिसे अनेकों शिक्षक अपनी दुम हिलाते हुए उनके आगे पीछे कर उनकी इच्छाओं का पूर्ति कर देते हैं। बाद में वही शिक्षक जिन पर उनकी चेलों की कृपा दृष्टि होती है, शिक्षक समाज का नेतृत्व पाते हैं। जो गौरव का विषय होता है। जिसे पाने के लिए किसी शैक्षिक योग्यता की नहीं चकड़िया दक्षता की आवश्यकता होती है। जो जितनी जल्दी अपनी आन बान और स्वाभिमान को बेच देते हैं वे उतने ही सफल शिक्षक की श्रेणी में गिने जाते हैं। धीरे-धीरे यह प्रवृति संस्कार में बदल जाती है, जो परंपरा का रूप धारण कर हमें आत्मग्लानि में डूबकर जीने को मजबूर कर देती है। इसी परंपरा के कारण आज शिक्षक वर्तमान समाज की सबसे निचली एवं तिरस्कृत श्रेणी में पहुंच गए हैं। ऐसा लगता है कि यह समाज शिक्षक को अन्य कार्यालय के कार्यालय सहायक से भी कम दर्जा दे रहा है। इसके लिए कोई और दोषी नहीं है, बल्कि ज्ञान का स्रोत स्वयं शिक्षक है।
आज अधिकांश शिक्षक अपने पद एवं कार्य की गरिमा को नहीं जानते हैं। अधिकांश शिक्षक भट्ठी प्रेमी हो गए हैं। पार्टियों के कारिंदा और भरिया हो गए हैं। अक्षमता उनकी बाध्यता बन गई है। यह विचार कि शिक्षा क्षेत्र ध्वस्त हो गया है क्योंकि जो लोग राजनीति के लिए भी योग्य नहीं हैं वे शिक्षण में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं, ऐसा समाचारों में बार-बार उल्लेख मिलता है। इसमें कुछ सच्चाई तो होनी चाहिए ! बड़ा विरोधाभास है ; एक तरफ सरकार कहती है कि सरकारी स्कूल में नामांकन बढ़े, ज्यादा बच्चे जुड़े, उधर जनता शोर किये जा रहे है कि सरकारी स्कूल में अफसरों के बच्चे पढाई करें। सरकारी विद्यालयों में नेता और अधिकारियों के बच्चे न पढ़ने के कारण आम जन में शिक्षकों की गरिमा, मर्यादा और उनके गुणवत्ता पर शंका होना स्वाभाविक हो जाता है। इस अवस्था में अभिभावक गण और समाज में ये सोच पनप रही है कि मास्टरों को कुछ नही आता। “मास्टर” यही शब्द अब संबोधन का बाकी रह गया है। गुरु जी तो कब के गायब हो गए।
चुनाव अभियान हो या पार्टी के कार्यक्रम के प्रचार प्रसार; नेतृत्व वर्ग की मानसिकता में यह धारणा घर कर गई है कि शिक्षकों को थोड़े से दारू मांस पिलाकर सक्रिय किया जा सकता है, जो व्यवहारिक सत्य भी है। यह इतिहास है कि शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा के लिए गठित संघ संस्था के नेतृत्वकर्ता सरकार के हाथों आसानी से बिकते आ रहे हैं। इसने शिक्षक की शक्ति को भी कुचलने का काम किया है। ऐसे में आम शिक्षक कहां जाएंगे? अपनी समस्याओं को किसे कहें? अनेक पार्टियों के समर्थक होने के कारण शिक्षकों की पार्टी के अनुरूप विचारधारा है। यदि उनकी पार्टी उन्हें जूतों से मारती है, तो भी वे सम्मानित महसूस करते हैं और चुप रहते हैं; शिक्षक के अनेक प्रकार की नियुक्ति के कारण भी इनकी सांगठनिक ढांचा कमजोर है।
सिर्फ संबंधित शिक्षकों की ही चिंता करने की प्रवृत्ति के कारण जो परेशानी में हैं, उनको सहयोग के बदले हिजड़ों की तरह ताली बजा रहे होते हैं, इस मनोविज्ञान को सरकारी पक्ष अच्छे से समझ रही है। इनकी लाइलाज कमजोरी के कारण ही इन्हें नाली के कीड़े की तरह घृणा के पात्र बना दिया गया है। फिलहाल शिक्षकों की प्रवृत्ति को देखते हुए और भी नीचे जाने की संभावना है मजबूत होती दिख रही है।
बिना घुमाए फिराए सीधा सच कहें, ” तो जब तक देश की व्यवस्था नहीं बदलती, तब तक शिक्षकों के पास सम्मान पाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।” वर्तमान व्यवस्था में किसी उद्धारकर्ता की प्रतीक्षा में भी सम्मानजनक निकास की संभावना नहीं दिख रहा। राजनीतिक षडयंत्र में फसे शिक्षक के जीवन में न तो शांति और स्थिरता है न नैतिक सफलता ही। जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है उन्हें भौतिक सफलता तो मिलती दिख रही है, परन्तु सामाजिक जीवन में वो एक निकृष्ट शिक्षक के श्रेणी में ही गिने जा रहे हैं। यह सामाजिक न्याय है, जो सर्वोपरी होता है। धन्यवाद!





