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आरक्षण नहीं अवसर को खोजती आधुनिक महिला

 

कञ्चना झा:बात करीब एक महीना पहले की है । सीमावर्ती जिला धनुषा स्थित एक गाँव की मैथिल ब्राह्मण परिवार की एक महिला -नाम गोप्य) को निर्ममता के साथ पीटा गया । बर्बर पिर्टाई के कारण महिला का पूरा शरीर सूज गया था । पुलिस केस हो जायेगा यही सोचकर महिला को सीमावर्ती भारत बिहार के एक अस्पताल ले जाया गया । कुछ दिन के इलाज के बाद उसे जनकपुर लाया गया । एक कान दो कान करते बात चारों ओर फैल गई । कुछ महिला अधिकारकर्मी और सञ्चार माध्यम ने घटना को गम्भीरता के साथ लेते हुए कानून का सहयोग लेने की सलाह दी । शुरु में पीडिÞत महिला ने भी सहमति जतायी लेकिन बाद में मुकर गयी । वह कहती है- पति से अलग रहना मुश्किल है । दो बच्चे हैं गुजारा कैसे चलेगा –nari
जब मियाँ बीबी राजी तो क्या करेगा काजी, कहते हुए पुलिस, महिला अधिकारकर्मी और सञ्चारकर्मी सभी ने घटना को भुला दिया । वैसे तो पूरे नेपाल में महिलाओं की यही स्थिति है लेकिन खास कर तर्राई में यह समस्या और भी ज्यादा है । महिला अपने ही घर में पीडिÞत बनकर रहने को बाध्य है । अल्पसंख्यक मधेशी समुदाय में महिला विरुद्ध हिंसा मुद्दा पर विस्तार से अध्ययन करते हुए कविता कुमारी मण्डल कहती है – महिला हिंसा के बहुत कारण हंै, जिसमें सबसे अहम महिलाओं में आर्थिक परनिर्भरता ही है ।
कविता अपने शोधपत्र में लिखती है कि, मधेशी समुदाय की महिला बहुत तरह के हिंसा सहने को बाध्य है । पति और घरवालों की पिर्टाई, दुत्कार, दहेज के कारण प्रताडÞना, डायन  के आरोप में समाज से बहिष्कार, बेचबिखन, यौनजन्य जैसी हिंसा से मधेश की बहुत सारी महिलाएँ पीडिÞत हैं । लेकिन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होने के कारण ये सब सहन करने को वह बाध्य है । वह खुलकर आने से कतराती है और अन्दर ही अन्दर पीडÞा सहती रहती है । स्मरण रहे- महिला हिंसा की ७० प्रतिशत घटना में देखा गया है कि पीडिÞत महिला आर्थिक रूप से परनिर्भर होती है ।
नेपाल की कुल जनसंख्या की आधी से ज्यादा संख्या महिला की ही है । मधेश की बात करें तो भी तथ्याँक में कोई खास र्फक नहीं । लेकिन  तुलनात्मक रूप से मधेशी महिला की हालत दयनीय है और वे ज्यादा प्रताडिÞत हैं । मधेश के अधिकांश जातजाति में महिला को एक वस्तु के रूप में लिया जाता है । उसे घर की चारदीवारी से बाहर जाने की छूट नहीं । महिला है, महिलाओं को घर के अन्दर ही रहना चाहिए  प्रतिष्ठा का विषय माना जाता है । और प्रतिष्ठा का यही भ्रम सम्पर्ूण्ा मधेश को सामाजिक और आर्थिक रूप से दिवालिया कर रहा है ।
काठमान्डू मैतीदेवी में रह रहे संजीव कर्ण्र्ााा मानना है कि अब वे दिन गये जब  महिलाओं का घर में रहना प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी । वो कहते हंै- जैसे किसी महिला को उसके पति का काम करना अच्छा लगता है उसी तरह महिला अगर बाहर काम करे तो पुरुषों को भी अच्छा लगता है । संजीव की पत्नी एक कम्पनी में अच्छे पद पर कार्यरत हैं । संजीव का कहना है – जब मैं किसी से अपनी पत्नी के बारे में बात करता हूँ तो मुझे गर्व महसूस होता है । महिला भी काम करना चाहती है लेकिन इसमें पति की बहुत बडÞी भूमिका रहती है । पति को चाहिए की वो मोटिभेट करे, और घर काम में भी थोडÞा सहयोग करे । वो आगे कहते हंै- महिला अगर अर्थोपार्जन करने लगे तो समाज में पुरुष और महिला में जो र्फक है खुद ब खुद कम होता चला जायेगा ।
करीब  दस साल से काठमांडू में रह रहे राजन सिन्हा कहते हैं – कैसे होगा हम लोगों का विकास – आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया, एक आदमी कमाये और पाँच आदमी खाये कैसे उठेगा मधेशियों का जीवनस्तर – पहले के जमाने में लोगों के पास पर्याप्त खेतीवारी थी, पुरुष बाहर का काम देखते थे और महिलाएँ घर का । लेकिन अब वो दिन गये । दो कमरा लेकर रह रहे राजन कहते हैं- सुबह शाम खाना बनाने के बाद मेरी पत्नी को कोई काम ही नहीं था । फिर वह घर बैठे  कुछ आमदनी हो यही सोचकर सिलाई बुनाई का काम करने लगी । राजन की आर्थिक स्थिति अब अच्छी है । और राजन की पत्नी नमिता को भी छोटी-छोटी जरुरतों के लिए पति का मुँह नहीं देखना पडÞता है । राजन की बात में हँा में हाँ मिलाते हुए नमिता कहती है- कोई जरुरी नहीं की आप बाहर ही काम करें घर बैठ कर भी आप अर्थोपार्जन कर सकती हैं । नमिता कहती हैं कि महिला हिंसा अंत करने का  रामवाण नुस्खा भी यही है।
कुछ महीने पहले अन्तराष्ट्रीय मजदूर संगठन -आई एल ओ) ने एक अध्ययन किया जिससे पता चलता है कि दक्षिण एसिया में महिला रोजगार में नेपाल सबसे से आगे है । नेपाल कीे करीब ८० प्रतिशत महिला किसी न किसी रोजगार में लगी हर्ुइ है । लेकिन दर्ुभाग्य घरवालों के लिए खाना बनाना, कपडÞा धोना, बच्चे को पालना और खेत में काम करने को भी रोजगार मान लिया है आइ एल ओ ने । ये सभी काम तो हैं लेकिन इससे प्रत्यक्ष रूप से अर्थोपार्जन नहीं होती । दक्षिण एसिया में महिला रोजगारी में बंगलादेश दूसरे नम्बर पर है, जहाँ  करीब ६० प्रतिशत महिला कोई न कोई रोजगार कर रही है । इसी तरह मालदीभ में ५९, श्रीलंका में  ३८, भारत में २५ और पाकिस्तान में २२ प्रतिशत महिला रोजगार में लगी हर्ुइ हंै । जिसमें अधिकांश की हालत बहुत ही नाजुक है । परम्परागत खेती और घर में काम करने के कारण उन लोगों की आमदनी अत्यन्त न्यून है । वैसे भी विश्व में करीब एक अरब ३० करोडÞ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं जिसमें से महिलाओं की संख्या ७० प्रतिशत है ।
बहुत लोगों ने इस सच्चाई को समझ लिया और परिवर्तन के बहाव में अपने-आप को ढालने की प्रयास भी किया है । लेकिन कम उम्र में शादी, बच्चांे का भार और अध्ययन को निरन्तरता न दे सकने के  कारण वह चाह कर भी अर्थोपार्जन में नहीं लग सकती । जनकपुर की अनिता साह कहती है- जब पढने की उम्र थी शादी हो गई, घर परिवार में फंस गये और अब चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती । अनिता की उम्र अभी ३५ वर्षहै । दस बजे पति दफ्तर चले जातें है और बच्चे  स्कूल और काँलेज उसके बाद दिन कटना उनके लिए  मुश्किल हो जाता है । ज्यादातर अकेले रहने के कारण परिवार में अक्सर कलह होता रहता है । वह कहती है- अकेले रहने के कारण से केवल नकारात्मक विचार मन में आते है । जब महिलाओं को वो आँफिस जाते देखती है तो वह सोचती है कि काश मैं भी आँफिस जाती ।
अनिता के बात में सच्चाई है । वैसे भी पुरानी कहावत है, खाली दिमाग शैतान का घर । घर में अकेले रहने के कारण चन्दना दास तो बीमार ही पडÞ गयी थी । काफी इलाज करवाया डाँक्टर से । डाँक्टर के सलाह से उसने घर से निकलाना शुरु किया । अभी वह राजनीति से जुडÞ गयी है । पार्टर्ीीा काम, कार्यकर्ता के काम में इतना व्यस्त रहती है कि घर पहुँचकर आराम करने का मन होता है । आजकल चन्दना को नींद भी अच्छी आती है । घर में भी खुशहाली है । अब  उसे न तो सर में दर्द होता है न तो वो पति और बच्चे के साथ झगडÞती । वह कहती है- मेरा मन शुरु से ही राजनीति में लगता था और जब से घर से बाहर निकलने लगी हूँ, बहुत व्यस्त रहने लगी हूँ ।  मेरी सबसे बडÞी आमदनी ही मेरे घर की खुशियाली और मेरा स्वस्थ होना है । चन्दना का कहना है पुरुष हो या महिला सभी को काम करना चाहिए । और प्रत्यक्ष रूप से आमदनी बढÞाने वाला काम हो तो सोने पे सुहागा ।
पिछले पुस्ता की बात करें तो अधिकांश महिला घरेलू काम में ही व्यस्त रहती थीं । कुछ एक घराने के महिला घर से बाहर निकलती थी लेकिन अभी समय बदल गया है । आज हर महिला आत्मनिर्भर बनने की सोचती है । हर परिवार में महिला शिक्षा की बात चल रही है । ये अलग बात है कि यह सौभाग्य सभी को प्राप्त नहीं होता । गाँव से दूर स्कूल या काँलेज, आर्थिक दुरावस्था के कारण बहुत सारी महिला आधारभूत शिक्षा से भी वञ्चित रह जाती है । लेकिन हर महिला जो शिक्षा लेती है उनकी इच्छा होती है कि आगे जाकर अपने पैरों पर खडÞी हो सकें । लेकिन नेपाल में खास कर मधेशी महिला की बात करें तो उनके आगे दो बडÞी समस्या है । पहली समस्या भाषा की है । अधिकांश महिलाओं की पर्ढाई लिखाई मधेश में होने के कारण से उनकी नेपाली कमजोर होती है । नेपाल में सरकारी हो या गैर सरकारी नेपाली भाषा को विशेष अहमियत दिया गया है । लोक सेवा परीक्षा के लिए ये अनिवार्य है । और इसी जगह वह मात खा जाती हंै । दूसरी भारत के सीमा से जुडे रहने का कारण बहुत परिवार में बहुएँ भारत से ही आती है । भारत में उनकी शिक्षा कुछ भी हो लेकिन भाषा के कारण उनका आगे बढÞना कठिन होता है ।
काठमांडू कुपन्डोल में रह रही उमा की भी यही समस्या है । उमा भारत में जन्मी, प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा सभी भारत में ही हर्ुइ लेकिन, शादी नेपाल में हो गयी तो उसे नेपाल आना पडÞा । वह कहती है- मैं चाहती हूँ कि काम करुं लेकिन हिन्दी भाषी होने के कारण मुझे ज्यादा अवसर नहीं है । लेकिन काठमांडू की कमर तोडÞ मंहगाई और दिनभर बेकार बैठना उमा को पसन्द नहीं । अगले तीन महीने में भी कोई नौकरी नहीं मिली तो घर में ही वह कोई प्रत्यक्ष अर्थोपार्जन का काम शुरु करने की  योजना बना रही है ।
क्रान्तिकारी अन्दाज में वह कहती है -क्यूँ बात करें आरक्षण की,  इसलिए कि हम नारी हैं ,अबला है, जबरदस्ती हमें हक दो अधिकार दो, सम्मान दो, तो लो नहीं चाहिए वह हक अधिकार वह सम्मान जिसे जबरदस्ती लेना पडेÞ । हम तो निकल पडÞे हैं उस रास्ते पर जहाँ मंजिल बहुत दूर नहीं । हमने रास्ता बनाना सीख लिया है ।
लेकिन सभी की सोच  न तो उमा की तरह है, न तो उनके परिवारवालों की तरह । किरण का कहना है- प्रकृति ने महिला को घर परिवार के लिए बनाया है । पुरुष पैसा कमाये और महिला घर चलाए ये बात सदियों से चली आ रही है और यही सही भी है । वह आगे कहती है- मुझे काम करना अच्छा नहीं लगता और ना ही मेरे पति को अच्छा लगता है कि मैं बाहर जाकर काम करुं । पति अगर अच्छा कमाता हो तो काम करने की जरुरत क्या , वह प्रति प्रश्न करती है ।
वहीं दूसरी ओर कई महिलाओं का तो यह कहना है कि वह चाहते हुए भी बाहर काम नहीं कर सकती । पति और घर परिवार के लोग उन्हे काम करने नहीं देते । कई महिलाओं ने तो कुछ दिन बाहर काम करके काम छोडÞ दिया या कहें कि काम छोडÞने को बाध्य हो गयी क्योकि उनके पति उनसे हर वक्त बहुत सारा प्रश्न किया करते थे । उसके साथ बात क्यों किया – आँफिस से आने में लेट क्यों हो गया, दूसरे के साथ अनावश्यक हंसने की क्या आवश्यकता – आदि आदि । अपना नाम प्रकाशित न करने के शर्त पर एक महिला कहती है-मेरे पति हर वक्त अनावश्यक शंका उपशंका करते थे, अन्ततः मैने नौकरी छोडÞ दी । महिला की इस बात मंें कुछ तो सच्चाई है कि महिला जब घर से निकलती है तो पति बहुत सारे प्रश्न पूछते हैं । लेकिन इस पूछने वाली बात को नकारात्मक रूप से नहीं लिया जाना चाहिए । घर का कोई सदस्य बाहर हो तो चिन्ता होना स्वभाविक ही है । कभी-कभी ज्याद केयरिंग करनेवाले लोग ज्यादा प्रश्न करते हैं । वैसे भी अगर पुरुष लेट से घर आये तो घर की महिलाएँ भी परेशान होती है और लेट होने का कारण पूछती है । अगर पुरुष प्रश्न पूछता है तो उसे शंका के रूप में समझना ठीक नहीं ।
किन्तु समय बदल रहा है । अब महिला और पुरुष दोनों  चेतनशील हैं । वरिष्ठ सञ्चारकर्मीर् अमरेन्द्र यादव कहते हैं- काम करने से अर्थोपार्जन तो होता ही है साथ-साथ उनका सम्मान ,और हैसियत भी बढÞता है । वास्तव में देखा जाय तो महिला तब तक आगे नहींं बढ सकती है जब तक कि वह आत्मनिर्भर न हो । लेकिन पुरुष के सहयोग बिना यह सम्भव नहीं । पुरुष को चाहिए कि महिला को प्रोत्साहित करे, घर के काम में थोडÞा हाथ बटा दंे, क्योंकि वह भी तो इंसान ही है ।

ग्रामीण वातावरण था, कम उम्र में ही शादी हो गयी , इसलिए अध्ययन को निरन्तरता नहीं दे पायी । लेकिन मन में हर वक्त सीखने की चाह रहती थी कि कुछ नया सीखूँ । खास कार सिलाई, बिनाई, कढर्Þाई में मेरा ज्यादा मन लगता था लेकिन पति की यह इच्छा थी कि मैं ज्यादा से ज्यादा समय घर में दूँ । फिर मैंने सोचा कि ठीक है, घर को ही अच्छी तरह से देखूँ । लेकिन अभी जब देखती हूँ कि महिलाएँ भी कुछ-कुछ कर रही हैं तो मन में आता है कि काश मंै भी करती । वैसे भी अब समय बदल रहा है, अब समय ऐसा आ रहा है कि महिला को रोक पाना मुश्किल है, वो हर क्षेत्र में आगे आ रही है । हँा, लेकिन ऐसी बात नहीं कि अर्थोपार्जन के लिए बाहर निकलना ही जरुरी है, घर में रह कर भी बहुत काम किया जा सकता है । -विभा झा
अगर महिला अर्थोपार्जन करे तो उसके लिए तो अच्छा है ही, साथ साथ परिवार में ज्यादा खुशियाली आती है । लेकिन अर्थोपार्जन के लिए बाहर ही जाना कोई जरुरी नहीं । घर में बैठ कर भी बहुत कुछ किया जा सकता है । मंै खुद चाहती हूँ कि कोई काम करुँ । कोई ढंग का काम मिलेगा तो करुंगी भी लेकिन अभी तक मिला नहीं है । वैसे भी अभी बच्चे छोटे हैं तो मैं चाहती हूँ कि थोडÞे दिन और रुक जाऊँ,  ताकि बच्चों की देखभाल अच्छे तरीके से कर सकूँ । – अर्चना सिंह
मैंनेै आई ए पास ही किया था कि मेरी शादी हो गई । शादी के बाद बच्चे हो गये और मैंने अपने आप को बच्चों की देखभाल में लगा दिया । वास्तव में कहिए तो मुझे कभी नौकरी या कोई काम करने की इच्छा ही नही हर्ुइ । मेरी हमेशा से यही सोच रही है कि पति पैसा कमाये और पत्नी घर का व्यवस्थापन करे । वैसे भी पति और पत्नी दोनो काम करने लगे तो बच्चांे की देखभाल में कमी हो जाती है और इसका असर बच्चों के भविष्य पर पडÞता है । दूसरे को देखकर कभी-कभी मन में आता है कि, काश मैं भी नौकरी करती लेकिन छेाटी नौकरी करने को मन नहीं, बहुत कम पैसे मिलते हैं । मंै तो दूसरी महिलाओं को भी यही सुझाव दूँगी कि घर को ठीक से संभाले । घर ठीक तो सब ठीक ।  कुछ लोग कहते हैं कि महिला आत्म निर्भर नहीं है इसलिए वो हिंसा का शिकार होती है । मैंै ऐसा नहीं मानती । मुझे लगता है आत्म विश्वास होना चाहिए । और दूसरी बात एक महिला को दूसरे महिला का साथ देना चाहिए , महिला हिंसा खुद ब खुद खतम हो जायेगी । – शिवानी झा
गाँव में उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी । इसलिए ज्यादा पढÞ नहीं पाई । फिर शादी हो गयी इच्छा थी की श्रीमान मुझे पढायें लेकिन ऐसा नहीं हो सका । फिर मैने  सिलाई बुनाई की ट्रेनिङ ली लेकिन ऐसा लगा मैंै परिवार में समय नहीं दे पा रही हूँ । श्रीमान ने भी कहा कि मंै बच्चे को देखुँ और वह बाहर देखेंगे। मंै भी उनकी बात में सहमत हो गयी । लेकिन अब दिन काटना मुश्किल हो गया है । बच्चे बडÞे हो गये , सभी अपने काम में व्यस्त रहते हैं  और मैं दिन भर घर में । वास्तव में कहें तो टीभी देखने और गप्पे लडाने के अलावा और कोई काम नहीं । बेटी सब काम पर जाती है और सोच रही हूँ कि बहु भी मैं ऐसी लाउँंगी जो बाहर काम कर सके । अब समय आ गया है कि पुरुष और महिला दोनो काम करे और घर के काम काज में बराबरी की जिम्मेवारी वहन करे । – रीता मिश्रा
मेरे पिताजी की इच्छा थी कि मैं स्वयं अपने पैरों पे खडÞी हो सकूँ । मेरे ससुर और श्रीमान कीे भी इच्छा थी कि मैं काम करुँ । मेरी खुद की भी यही इच्छा थी कि मंै भी आँफिस जाऊँ , कुछ काम करुं लेकिन ऐसा हो नहीं पाया । शादी और फिर थोडÞे दिन में बच्चे ने बहुत सारी जिम्मेवारी दे दी । अभी जब मैं देखती हूँ, मेरे पडÞोस की महिला सब  नौकरी करने जाती है और घर परिवार भी अच्छे तरीके से चला रही है तो मुझे बहुत अफसोस होता है । काश मंै भी कुछ काम करती । एक दो बार मन में आया कि मैं भी कुछ काम करुँ लेकिन अब थोडÞी बीमार रहने लगी हूँ , इसलिए सम्भव नहीं लगता । अब बच्चे बडÞे हो गये हैं तो सोच रही हूँ घर पर ही रह कर कुछ अर्थोपार्जन वाला काम करुँ । – रजनी मेहता
बच्चे जब तक छोटे थे तब तक मन में नहीं आया कि मंै भी काम करुँ । वैसे भी घर का काम और बच्चे को सम्भालने में सारा समय बीत जाता था । लेकिन अब जब बच्चे बडÞे हो गये हंै तब लगता है कि अब काम करने की उम्र नहीं । जल्दी शादी हो जाने के कारण अध्ययन को भी निरन्तरता नहीं दे पायी । आई ए पास हूँ, लेकिन इस पर्ढाई से अच्छी नौकरी तो नहीं मिल सकती है । दूसरी बात मेरे पास नागरिकता नहीं । यहाँ तो छोटा  बडÞा सभी काम के लिए नागरिकता ही चाहिए यहाँ तक की पर्ढाई के लिए भी । मुझे लगता है कि घर परिवार के कामकाज से जब फर्ुसत मिलता है तब कुछ काम करुँ और इसके लिए मेरे श्रीमान भी प्रोत्साहित ही करते हैं । – भावना झा
घर के काम में इतना व्यस्त रहती हूँ कि बाहर निकलने का सोच ही नहीं बना पाती हूँ । लेकिन घर में रहते हुए जब भी फर्ुसत मिलती है तो मैं स्वेटर, पर्स जैसी चीजें बनाती रहती हूँ । बच्चों से फुर्सत मिलने के बाद कुछ करने का योजना बना रखा है । मेरे श्रीमान की भी काफी इच्छा है कि मैं कुछ काम करुं, और मुझे उम्मीद है कि  मंै कुछ शुरु करुंगी तो वह मुझे काफी सपोर्ट करेंगें । अभी मैं पीएच डी करने की सोच रही हूँ इसलिए भी बाहर काम करने का मना नहीं बनाया है । आजकल महिलाएँ भी बाहर काम करने लगी हंै, बहुत अच्छी बात है । हाँ लेकिन एक बात जरुर याद रखना चाहिए मर्यादा से बडÞा पैसा कभी भी नहीं हो सकता । मुझे लगता है हर महिला को कुछ न कुछ काम करना चाहिए लेकिन मर्यादा को भूलकर नहीं । – कनकलता आर्य

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