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मधेश को समावेशीकरण नहीं अधिकार चाहिए

 
madhesh andolan
मधेश

काठमाण्डू, १२ सेप्टेम्वर । अगर ये कहें कि एक लचर और लड़खड़ाती व्यवस्था के बीच हम जी रहे हैं तो कुछ गलत नहीं होगा । राजनीति और स्वार्थनीति ये दोनों ही हावी हैं हम पर । इन दोनों शब्दों में अगर कुछ गलत है तो वह है नीति, अगर इस शब्द को हटा दिया जाय तो जो बचता है अर्थात राज और स्वार्थ बस यही एक सच है । किसी भी स्थिति में राज करने का जो स्वार्थ है वही सर्वोपरि रूप में सामने दिख रहा है । नीति तो कहीं है ही नहीं । सत्ता की गलियारों में भटकने की ख्वाहिश इस हद तक काबिज  है कि अपनी मिट्टी को ही भूल गए हैं । आज मधेश इस असमंजस में है कि वह किसे अपना कहे । मधेश की धरती ने जिस सोच और नारों को बुलन्द किया था, जिस सुदृढ़ भविष्य की कल्पना की थी, आज उसका कोई स्वरूप सामने नहीं दिख रहा । बंद कमरे में जिन चंद ठेकेदारों के हाथों संविधान निर्माण की तैयारी हो रही है और झिर्रियों से जो बातें निकल कर आ रही हैं उनमें कहीं भी मधेश हित की बातें  नजर नहीं आ रही । आए भी कैसे ? क्योंकि मधेश जो चाहता है वह चाहत ही टुकड़ों में बंट गई है । जिन वादों के साथ मधेशी दलों ने राजनीतिक जमींन पर अपने पैर जमाए थे आज वो जमीन ही बदल गई है । एक मधेश एक प्रदेश के वादे के साथ आन्दोलन शुरु हुआ । वादे करने वाले खुद कई भाग में बंट गए । पद भी मिला, अवसर भी मिला पर अगर कुछ नहीं मिला तो उपलब्धि । किन्तु उनके खजाने अवश्य भरे । आज संविधान निर्माण की जिम्मेदारी जिन हाथों में है  क्या वो मधेश की आवश्यकता, उसकी इच्छा, उसकी स्थिति को समझने और उसपर ईमानदारी से कार्यान्वयन करने के मूड में है ? जहाँ तक हालात बताते हैं कि इसकी सम्भावना अत्यन्त न्यून है । क्योंकि न तो पहले कभी मधेश को महत्ता मिली है और न आज मिलने की स्थिति नजर आ रही है । सिर्फ एक दो सर्वोच्च पदों पर मधेशी चेहरा बिठा देना मधेश और मधेशी को मजबूती, सम्मान और स्वाभिमान नहीं दिला सकता है । समावेशी के नाम पर लालीपाप थमाया जा रहा है और मधेशियों को ठगा जा रहा है । किन्तु मधेश को समावेशीकरण नहीं अधिकार चाहिए । तलवार, कलम और अर्थ इनमें से आप कहीं नहीं हैं तो आप निष्क्रिय समुदाय हैं और इन सब में मधेशी उपस्थिति नगण्य है । हालात कैसे बदले और अधिकार कैसे मिले यह ज्वलन्त प्रश्न है । अगर इसका उत्तर मधेश को नहीं मिला तो आनेवाला कल निःसन्देह वह तूफान लाएगा जिसे रोकना मुश्किल होगा क्योंकि मधेश आन्दोलन की धरती रही है और सब्र की भी कोई सीमा होती है । श्वेता दीप्ति

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