असफलता की ओर उन्मुख GenZ की सरकार- हनीमून पीरियड मेही मधुमेह की चपेट में
डा. विजय दत्त, काठमांडू 29 जुलाई। रूढ़िवादियों की अहंकारी, भ्रष्टाचारी, गैर-जिम्मेदाराना और आपसी समझ की कमी जैसी विशेषताओं वाली सरकार को विद्रोह के बल पर उखाड़ फेंककर दो-तिहाई बहुमत वाली GenZ की सरकार आई, लेकिन ‘हाथी आया, हाथी आया… पहाड़ निकला चुहिया!’
सुशासन, रोजगार और शून्य भ्रष्टाचार का मूल मंत्र कहाँ चला गया? जनता हर तरफ सवाल पूछ रही है। आत्मदाह रुकने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। केवल प्रेम प्रसाद ही नहीं, गणेश और विवेक जैसे कई अन्य भी हैं। पुलिस प्रशासन में दंडहीनता (unpunished crime) बढ़ रही है। जनता के बीच रहने वाले ही जनता के सीने में गोली मार रहे हैं! खासकर तराई-मधेश में अजीब स्थिति बनी हुई है। आपराधिक मनोवृत्ति से ग्रस्त पुलिस प्रशासन दीख रही है । नागरिकों का कहना है कि कुशासन की कितनी गिनती कराई जाए।
किसी भी नई सरकार या नेतृत्व के शुरुआती १०० दिन या कुछ अतिरिक्त महीनों को राजनीति विज्ञान में ‘हनीमून पीरियड’ (मधुमास) कहा जाता है। जनता के अजेय और अभूतपूर्व जनादेश से बनी सरकार से, नई सोच और नई पीढ़ी (GenZ) से जिस अभूतपूर्व आशा, सुशासन और बदलाव की उम्मीद की गई थी, वह शुरुआती चरण में ही संकट में पड़ती दिख रही है। हनीमून पीरियड में ही मधुमेह (मधुमासमै मधुमेह) के इस गंभीर लक्षण ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि GenZ की नींव पर बनी या उनके प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली सरकार किस तरह असफलता के रास्ते पर आगे बढ़ रही है।
*शांति-सुरक्षा में गंभीर चूक, पुलिस की बर्बरता और कानूनी उल्लंघन*
गृह प्रशासन और शांति-सुरक्षा की स्थिति इस समय बेहद कमजोर मोड़ से गुजर रही है। पुलिस प्रशासन जनमुखी और जवाबदेह होने के बजाय उसमें आपराधिक मानसिकता और गैर-जिम्मेदाराना रवैया और बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है।
इसका जीवंत उदाहरण सुनसरी के देवानगंज और कपिलवस्तु में हुई घटनाएँ हैं, जहाँ आम नागरिकों को पुलिस की गोली और अत्याचार के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी है। वहीं दर्जनों लोग अस्पताल के बिस्तरों पर जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। देवानगंज में पुलिस द्वारा ही की गई हत्या की घटना ने यह अहसास कराया है कि राज्य का रक्षक ही भक्षक बन गया है। हाल ही में पुलिस *महानिरीक्षक (IGP) का यह बयान कि अवैध घुसपैठिए रोहिंग्या, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, सोमालियाई आदि देश में शांति-सुरक्षा बिगाड़ रहे हैं और आगे और संकट पैदा होगा, अत्यंत संवेदनशील और चिंताजनक है।*
विशेष रूप से, सुनसरी की देवानगंज घटना केवल शांति-सुरक्षा की कमजोरी भर नहीं है, यह ‘स्थानीय प्रशासन अधिनियम, २०२८’ और संविधान की धारा १६ (सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार) का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। कानून द्वारा भीड़ नियंत्रण के दौरान घुटने से नीचे गोली चलाने की स्पष्ट सीमा तय किए जाने के बावजूद नागरिकों के सीने और पेट में गोली दागना पुलिस प्रशासन की बर्बरता और गैर-कानूनी चरित्र को उजागर करता है। गृह मंत्रालय की आंतरिक जांच समिति गठित करके घटना को लीपापोती करने की पारंपरिक शैली को छोड़कर, दोषी सुरक्षाकर्मियों और आदेश देने वाले अधिकारियों पर मुलुकी अपराध संहिता के तहत ‘कर्तव्य ज्यान’ (गैर-इरादतन हत्या/हत्या) में स्वतंत्र कानूनी कार्रवाई जब तक नहीं होगी, तब तक राज्य के प्रति अविश्वास कम नहीं होगा।
*धार्मिक उग्रता, अवैध धन और शरणार्थी संकट*
देश में धार्मिक उन्माद और उग्रता हाल के दिनों में और फल-फूल रही है। ‘गल्फ’ देशों और अन्य संदिग्ध स्रोतों से अवैध रकम (Illegal Funding) नेपाल लाकर धर्म परिवर्तन (Proselytizing), धार्मिक उन्माद, अवैध हथियारों के साथ प्रदर्शन और सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने का खेल तेज कर दिया गया है।
दूसरी ओर, कोविड-१९ के समय में भी नेपाल की खुली सीमाओं और कमजोर सुरक्षा नीति का फायदा उठाते हुए रोहिंग्या, बांग्लादेशी, सोमालियाई और पाकिस्तानी शरणार्थियों की घुसपैठ बढ़ रही है। जनभावना यह है कि इसमें उच्च पदस्थ लोगों की ही भूमिका है। इसने नेपाल के जनसांख्यिकी संतुलन को ही नहीं बिगाड़ा है, बल्कि राष्ट्रीय शांति-सुरक्षा के सामने भी गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
ऐसे संवेदनशील समय में धरान के मेयर हर्क सम्पांग जैसे पात्रों की बयानबाजी और कदम धार्मिक विभेद का बीज बोने का काम कर रहे हैं। उधर, संवैधानिक दायित्व निभा रहे ‘आदिवासी जनजाति आयोग’ ने गाय को राष्ट्रीय पशु के पद से हटाने की सिफारिश की है, जिसका स्पष्ट संदेश यह है कि गाय काटने की अनुमति दी जाए। यह देश को और अधिक हिंसक मुठभेड़ की ओर ले जाएगा। आरोप लगने लगे हैं कि इससे समाज में भड़की सांप्रदायिक आग में घी डालने का काम हो रहा है।
*डिजिटल सुशासन: सिर्फ कवि की कल्पना!*
सरकार ने डिजिटल नेपाल और चुस्त-दुरुस्त सुशासन के चाहे जितने भी नारे लगाए हों, व्यवहार में वह केवल ‘कवि की कल्पना’ तक ही सीमित रह गया है। सरकारी डिजिटल प्रणाली, वेबसाइटें और सेवाएँ हमेशा सर्वर ‘डाउन’ रहने की समस्या से जनता त्रस्त है। तकनीक के प्रयोग के जरिए भ्रष्टाचार रोकने और त्वरित सेवा देने की बात केवल बातों तक ही सिमट कर रह गई है।
*आंतरिक कलह और संवैधानिक प्रश्न: सेना परिचालन का विवाद*
सरकार के भीतर का असंतोष और खींचतान अब छुप नहीं पा रही है। प्रधानमंत्री और विभागीय मंत्रियों के बीच गंभीर मतभेद के कारण नीतिगत फैसले ठप हैं। वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री के बीच गहरा संवादहीनता का माहौल है, जो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इसी बीच, राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ माने जाने वाले नेपाली सेना का परिचालन किस तरह हो रहा है? क्या वह संविधान की भावना और व्यवस्था के अनुकूल है? यह गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। भदौ २३ और २४ गते (सितंबर ८ और ९) को हुए GenZ आंदोलन के दौरान सेना की भूमिका या परिचालन के विषय को लेकर जिस तरह संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं, उसने राज्य के अंगों के बीच समन्वय और संवैधानिक सीमाओं पर ही बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। लेकिन, देवानगंज में सेना का परिचालन कैसे हुआ? कहाँ गई राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक ?
*कुटनैतिक क्षेत्र पुर्णतः असल*- नवगठित GenZ सरकार पुर्णतः असफल दिखाइ दे रही है । मित्र राष्ट्र भारत अौर दक्षिणी मित्र राष्ट्र के साथ संबध अच्छा नहि दिख रही है ।
*निष्कर्ष*
GenZ की ऊर्जा, चेतना और नेतृत्व में जनता ने जिस नए नेपाल का सपना देखा था, वर्तमान सरकार की इन गतिविधियों ने उस पर ठंडा पानी डालने का काम किया है। शांति-सुरक्षा में गंभीर चूक, पुलिस की बर्बरता, अनियंत्रित शरणार्थी समस्या, धार्मिक उग्रता और मंत्रियों-प्रधानमंत्री के बीच आंतरिक विद्रोह ने सरकार को असफलता की कगार पर पहुँचा दिया है, ऐसा प्रतीत होता है।
यदि समय रहते इन गंभीर त्रुटियों को सुधारकर सुशासन, निष्पक्ष जांच—विशेषकर सुनसरी और कपिलवस्तु हत्याकांड के लिए न्यायिक आयोग का गठन—तथा संवैधानिक मर्म के अनुसार कार्य नहीं किया गया, तो यह केवल सरकार का पतन नहीं होगा, बल्कि यह पूरी नई पीढ़ी के राजनीतिक भविष्य और विश्वास को कभी न पूरा होने वाला नुकसान पहुँचाएगा, ऐसा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है। यदि इन समस्याओं का समय पर समाधान नहीं हुआ, तो देश को फिर से किसी अनिष्ट का सामना न करना पड़े, यह कहा नहीं जा सकता! जनभावनाओं को संबोधित करना सरकार का पहला दायित्व है; जनता के कर (टैक्स) का सही उपयोग होना चाहिए। नागरिक सुरक्षा गंभीर संकट मे है । चिकित्सक असुरक्षित अौर आन्दोलित, किसान ,व्यापारी कि अवस्था समेत संकट मे ।

विश्लेषक

