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राजनीति जब आत्म हत्या सिखाये तब वह‌ अराजक नीति है : कैलाश महतो

 

कैलाश महतो, पराशी ।२०७८ का फाल्गुण माह रहा होगा, जब रेशम चौधरी जी ने फोन करके डिल्ली बजार जेल में मिलने के‌ लिए हमें‌ बुलाया था । कुछ ही दिन पूर्व दश साल के राजनीतिक जेल जीवन यापन कर रिहा हुए धनुषा के दिपक यादव जी को साथ लेकर हम रेशम‌ जी से मिलने डिल्ली बजार के जेल पहुंचे थे । जेल में हमारी लम्बी बातचीत हुई । बातचीत के दौरान रेशम जी ने उनके द्वारा खोले जाने बाले पार्टी को सहयोग करने का प्रस्ताव आया । हमने पार्टी खोलने पर प्रश्न उठाते हुए कहा था कि अभी के दौर में पार्टी खोलना दल दल‌ में फंसने के बराबर होने की तस्वीर दिखाते हुए किसी ठोस और जन-आधारित मुद्दे को उठाकर एक राजनीतिक अभियान चलाने की बात कही थी । उन्होंने अपने जिद्दी तर्क पर अडकर हमें अनेक लुभावने बातों से नहलाने की कोशिश की, परन्तु हम उनके तर्क को परहेज करते हुए वहां से विदा लिए । अन्तत: जेल के अन्दर से ही उन्होंने अपनी धर्म पत्नी रञ्जिता श्रेष्ठ  चौधरी जी के नेतृत्व में “नागरिक उन्मुक्ति” नामक एक‌ पार्टी खोली, जो आज रेशम जी के गले का दर्दनाक नासूर बन चुका है । बात आज इतनी गम्भीर हो चुकी है कि रञ्जिता जी रेशम जी के लिए राजनीतिक “ज्योति मौर्या” बन चुकी हैं ।

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स्मरण हो कि भारत में एस.डी.एम. (S.D.M) रही ज्योति मौर्या को अधिकारी बनाने में‌ उनके पति ने जो कष्ट, लगानी और विश्वास की थी, उसके ठीक विपरीत के परिणाम देखने को मिली थी । नौवत यहां तक बनी थी कि ज्योति मौर्या ने अपने उस पति से छुटकारा पाने के लिए उनकी हत्या तक करवाने की पोल खुली थी, जिसने उन्हें‌एस.डी.एम. जैसी शक्तिशाली अधिकारी बनाया था । उस घटना ने हजारों पतियों को इस कगार पर ला खडा किया कि पतियों ने अपने पत्नियों को थप पढाने और नौकरी करबाने पर प्रतिबन्ध लगा दी । हजारों पत्नियों को पढाइयों से हाथ धोना पडा था । आज वही हालात रेशम चौधरी जी का होना हर पति के लिए एक नयां पाठ हो सकता है ।

राजनीति जब आत्म हत्या सिखाये, तो वह‌ अराजक नीति है । आश्चर्य तो यह है कि रेशम जी को किसी शूटर द्वारा गोली मरवाने की धम्की मिलना । हद है राजनीति का बुखार । दुनिया के इतिहासों में ऐसे बहुत से वारदातें मिलते हैं, जिसमें‌ अपने खास ही खास का जान का दुश्मन बनकर उसकी जीवन लीला समाप्त की है । यह कोई नयी बात नहीं है । नेपाल खुद ऐसे घटनायी इतिहास का खजाना है । मगर आश्चर्य की बात यह है कि राजनीति आखिर इतना कठोर और निर्दयी क्यों ? सत्ता इतना शातिर और अपराधिक क्यों ?

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एक तरफ राजनीति और दूसरे तरफ मोह नीति । राजनीति में अगर सेवा भाव है, तो वह जनता का साझा संस्था बन जाता है । मगर जब नेतृत्व में व्यक्तिगत मोह और लालच पनप जाये, तो वह विध्वंशकारी और अपराधिक होने का परिणाम नागरिक उम्मुक्ति पार्टी का श्रीमान श्रीमति का आन्तरिक राजनीतिक‌ लालच, कलह और अहंकार प्रमाणित करता है ।

हमने रेशम जी से कहा था कि राज्य द्वारा राजनीति को जो आकार दिया गया है, उस अवस्था में राजनीतिक पार्टी ही खोलकर समाज को कोई निकास नहीं‌ दिया जा सकता । उसके लिए निर्दिष्ट और निर्धारित मुद्दों को जन-आन्दोलन के जरिये पहले सम्बोधन करबा लिया जाना चाहिए और तब उसके बाद आवश्यकता और औचित्य के आधार पर पार्टी खोलने से जनता की जैविक आवश्यकता और नेता का राजनीति अवस्था दोनों‌ विधिवत् रुप से स्थायी और मजबूत रहेगा । मगर रेशम जी नशे में‌ थे । जेल के अन्दर उनका रुतवा ही कुछ अलग थी ।‌ सज संवरकर बातों‌ को ढिंढोरा पिटने में माहिर हो चुके थे ।

राजनीति शक्ति प्राप्त करने की संघर्ष का रास्ता है ।‌ मगर जब वह शक्ति अतिरोक्ती में‌ तब्दील‌ हो जाये, तो वह भाइ-मारा, पिता द्रोह, पति छोड, पत्नीखोर और अनपनत्व तोड हो जाता है । राजनीति छल, कल, बल और हत्या तक से दोस्ती कर लेता है ।

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एक‌ मन्त्री बनने और न बनने देने के मुठभेर में‌ पहुंचा नागरिक उन्मुक्ति पार्टी किसी भी धरातल पर जनता का पार्टी नहीं हो सकता । वह केवल सत्ता और स्वार्थ के लिए बनाये गये किसी समूह का दुकान है ।‌

देश को बदलाव देने बाले हर मिजाज और दिमाग को यह निर्धारण करना होगा कि उसे पार्टी खोलकर क्या करना है । अभी के परिस्थिति में देश और जनहित के‌ लिए पार्टी आवश्यक है या राजनीतिक‌ अभियान और स्वतन्त्र राजनीतिक‌ आन्दोलन की अपरिहार्यता ?

विगत के सत्तायी राजनीतिक इतिहास और वर्तमान की राजनीतिक‌ मनोदशा से राजनीतिकर्मियों को बेहिचक यह पाठ सिखना चाहिए कि सत्तायी चुनाव और राजनीति विध्वंश, तोडफोड और हिंसा के आलावा और कोई राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक सकारात्मकता नहीं दे सकता । उसके लिए स्वतन्त्र मजबूत राजनीतिक‌ अभियान और ठोस मुद्दे की आवश्यकता है ।‌ दूर दृष्टि की जरुरत है । अन्यथा नेपाल के राजनीति में अनेकानेक‌ रेशम चौधरी और रञ्जिता श्रेष्ठ चौधरी जन्म लेते रहेंगे, अपराध का दायरा बढता जायेगा और समाज राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रुपों में थप पीडित होता जायेगा ।

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