एमाले-काँग्रेस गठबंधन का क्या होगा असर, भारत-चीन संबन्धों पर
देश में एक बार फिर सत्ता बदल गई है. एमाले अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नई सरकार बनाने को लेकर अपना दावा भी पेश कर दिया है. नई सरकार बनाने का दावा करने के बाद ओली ने कहा है कि उन्हें 166 सांसदों का समर्थन हालिस है. इन सांसदों में से खुद उनकी पार्टी एमाले के 78 और नेपाली कांग्रेस के 88 सांसद शामिल हैं. देश में मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता कोई पहली बार नहीं हुइ है. इससे पहले भी कई बार यह सब होता रहा है । यह परिदृश्य देखने के लिए यहाँ की जनता तैयार ही रहती है । यह पहली बार नहीं है कि मौजूदा सरकार के गिरने या गिराने के बाद दूसरी पार्टी ने सत्ता में वापसी की है. इस बदलते परिदृश्य पर विदेश मामलों के जानकारों का मानना है कि सत्ता में ओली की वापसी से चीन का फायदा हो सकता है. के पी ओली के चीन के साथ संबंध शुरू से ही अच्छे रहे हैं. ऐसा माना जा रहा है कि अगर ओली सरकार ने इस बार सत्ता में वापसी करने के बाद भारत के प्रति अपना रुख नहीं बदला तो चीन के सामरिक प्रभाव के कारण इसका असर कुछ हद तक ही सही लेकिन भारत-नेपाल के रिश्ते पर पड़ेगा जरूरी.
नेपाल भारत के पड़ोसी मुल्कों में से एक है. बीते कुछ समय से जिस तरह से चीन की रुचि नेपाल में बढ़ी है उसे देखते हुए नेपाल भारत के लिए कूटनीतिक स्तर पर अब बेहद खास हो चुका है. ऐसे में अब जब नेपाल में ओली सरकार की वापसी तय हो चुकी है तो ये जानना भी बेहद जरूरी है कि आखिर इसका असर भारत पर कितना पड़ेगा. जानकारों का मानना है कि ओली के एक बार फिर नेपाल का प्रधानमंत्री बनने से नेपाल और भारत के संबंध में ज्यादा कुछ बदलाव नहीं होंगे. वहीं, कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि अगर केपी ओली एक बार फिर पीएम बनते हैं तो ये भारत के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. हालांकि, इस बार नेपाल में जो नई सरकार बनने जा रही है वो गठबंधन की सरकार होगी, लिहाजा पहले की तरफ ओली स्वतंत्र रूप से कोई भी बड़ा फैसला नहीं ले पाएंगे. उन्हें गठबंधन धर्म का पालन करना ही होगा.
शायद यही वजह है कि इस समय ओली के तेवर बदले हुए हैं । क्योंकि संसद में प्रचंड की पार्टी के विश्वास मत हारने और केपी ओली के एक बार फिर सत्ता में आने की गारंटी के बाद ओली की पार्टी ने भारत को लेकर जो बयान दिया वो बेहद दिलचस्प है. ये बयान भारत के साथ ओली नेपाल का भविष्य कैसे देखते हैं, इस ओर भी इशारा करता है. एमाले की स्थायी समिति के सदस्य ने कहा कि हम यह नहीं मानते कि भारत विरोधी नीति से नेपाल को कोई फायदा पहुंचना है.
उन्होंने कहा कि पार्टी के अध्यक्ष यानी केपी ओली भी 21वीं सदी की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इन दोनों देशों के बीच के संबंध को नई ऊंचाइयां देना चाहते हैं. उन्होंने आगे कहा कि ऐसा हमारा मानना है कि हम भारत के साथ अच्छे संबंध स्थापित करके ही अधिक विदेशी निवेश को आकर्षित कर सकते हैं. इससे नेपाल तरक्की के रास्ते पर और तेजी से आगे बढ़ेगा.
भविष्य में क्या होगा यह तो गर्भ में ही किन्तु देश के लिए स्थायीत्व की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता है । देश में 2008 में राजशाही के खात्मे के बाद से ही राजनीतिक अस्थिरता का दौर जारी रहा है. यही वजह है कि बीते 16 साल के लोकतंत्र के इस छोटे से कालखंड में ही देश ने 13 प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखा है. 2006 के बाद से खुद प्रचंड तीसरी बार नेपाल के पीएम बने हैं. इससे पहले प्रचंड 2008 से 2009 और 2016 से 2017 तक नेपाल के पीएम रह चुके हैं. दिसंबर 2022 में एक बार फिर पीएम बनने के बाद से प्रचंड संसद पांच बार विश्वास प्रस्ताव का सामना कर चुके हैं. इस बार वो सदन में अपना बहुमत साबित नहीं कर सके.


