नई सरकार से किसी चमत्कारिक परिवर्तन की अपेक्षा नहीं : श्वेता दीप्ति
श्वेता दीप्ति
एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं और अब चौथी बार उन्होंने यह पद संभाला है । लेकिन इस बार जिस तरह से वह प्रधानमंत्री बने, यह उनकी बड़ी राजनीतिक कुशलता मानी जा रही है । पिछले दिनों उन्होंने जो कूटनीतिक चाल चली है वह चर्चा में है ।
तीन साल पहले, उनके कदम (प्रतिनिधि सभा को भंग करने) को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था । एमाले के ही २३ सांसदों के हस्ताक्षर के साथ प्रधानमन्त्री में दावा कर के कांग्रेस सभापति शेरबहादुर देउवा ने ओली को विस्थापित किया था ।
और आज देउबा के समर्थन से ओली रविवार को प्रधानमंत्री बन गये हैं । इस बार ओली ने ऐसी राजनीति की कि देउबा को खुद प्रधानमंत्री का प्रस्ताव लेकर बालकोट पहुंचना पड़ा ।
राष्ट्रपति ओली के देश के ४५वें प्रधानमंत्री बनने के साथ ही नेपाली राजनीति में कई सवाल उठ रहे हैं, जिनका जवाब खोजा जा रहा है । सभी के जेहन में एक सवाल सबसे पहले आ रहा है कि आखिर इतनी जल्दी क्या थी दो बड़ी पार्टियों के साथ सरकार बनाने की ?
वैसे तो कांग्रेस और एमाले के नेताओं ने राजनीतिक स्थिरता और सुशासन को मुख्य आधार बना कर सरकार बनाने की बात कही है । लेकिन माओवादी केंद्र समेत सत्ता से बाहर हो चुकी पार्टियां उनकी बात पर यकीन नहीं कर पा रही हैं । दूसरी चिंता इस बात की भी है कि दो बड़ी पार्टियों के एक होने से एकाधिकार बढ़ सकता है ।
कांग्रेस और एमाले यह दावा कर रही है कि उनका गठबंधन राजनीतिक स्थिरता और सुशासन देने के लिए है । किन्तु जो गंभीर मुद्दे भ्रष्टाचार के प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा उठाए गए थे उन मामलों पर कांग्रेस–एमाले गठबंधन सरकार क्या करेगी ? यह सामान्य रुचि का विषय है । अगर दोनों पार्टियों के बीच सत्ता सहयोग भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने, अगला चुनाव जीतने और खर्च जमा करने के लिए है तो यह देश की व्यवस्था और संविधान पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है । नए गठबंधन की वास्तविकता से सभी परिचित हैं । सभी यह समझ रहे हैं कि यह समीकरण कुछ मामलों को ढकने और लीपापोती के लिए ही बनी है । क्योंकि हकीकत और सच्चाई यह है कि अपराध या भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए ही यह गठबंधन किया गया है । प्रचंड सरकार ने भ्रष्टाचार के कुछ गंभीर मुद्दे उठाए थे जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा है ।
ऐसे में ओली के नेतृत्व वाली सरकार से भ्रष्टाचार पर काबू पाना या उससे सम्बन्धित विषयों पर न्याय की अपेक्षा की ही नहीं जा सकती है । क्योंकि भ्रष्टाचार और संगठित अपराध शीर्ष स्तर पर हैं । इसलिए यह वर्तमान सरकार के लिए कोई आवश्यक विषय नहीं हो सकता है ।
जहाँ तक संविधान संशोधन की बात है तो संविधान में सुधार के लिए सिर्फ गठबंधन ही नहीं सभी राजनीतिक ताकतों को एक साथ आना होगा क्योंकि इसके बिना संशोधन की संभावना ही नहीं है । न केवल राष्ट्रीय शक्ति, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय शक्ति के सहयोग के बिना यह कार्य करना कठिन प्रतीत होता है ।
हर बार की तरह हम इस सरकार से गरीबी उन्मूलन, बेरोजगारी, युवा पलायन रोकने की उम्मीद तो कर सकते हैं किन्तु देश की राजनीतिक इतिहास को देखते हुए यह भी कपोल कल्पना ही दिखती है । क्योंकि हर बार की तरह इस बार भी सत्ता बचाए रखने की ही कवायद बनी रहेगी क्योंकि गठबंधन की सरकार पर हमेशा तलवार लटकती ही रहती है । इसलिए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार से किसी चमत्कार की अपेक्षा की ही नहीं जा सकती है । हाँ यह आम जनता अवश्य चाहती है कि मध्यावधि चुनाव की नौबत नहीं आए क्योंकि इसका भार आम जनता को ही उठाना पड़ता है ।


