युवाओं में सेवा के आदर्शों को विकसित करती है एनसीसी : डॉ. पवन कुमार शर्मा
मैं एनसीसी हूं…
मैं हूं राष्ट्रीय कैडेट कोर। वैश्विक स्तर पर अगर बात करे तो मेरा यह नाम सबसे पहले 1666 में जर्मनी में सामने आया। लेकिन जो पहचान मुझे मिली वो भारत देश ने मुझे दी। मैं एनसीसी एक त्रि-स्तरीय सेवा संगठन हूं जिसमें सेना, नौसेना और वायु सेना शामिल है। मैं देश के युवाओं को अनुशासित और देशभक्त नागरिक बनाने में हमेशा तत्पर रहता हूं। भारत में मेरा गठन 1948 के राष्ट्रीय कैडेट कोर अधिनियम के तहत किया गया। इसे 15 जुलाई 1948 को स्थापित किया गया। मेरी उत्पत्ति ‘यूनिवर्सिटी कोर’ से मानी जा सकती है, जिसे 1917 के भारतीय रक्षा अधिनियम के तहत सेना की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से बनाया गया था।
1920 में, भारतीय प्रादेशिक अधिनियम पारित होने के बाद, ‘यूनिवर्सिटी कोर’ को ‘यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग कोर में बदल दिया गया। इसका उद्देश्य UTC की स्थिति को बढ़ाना और युवाओं के लिए इसे अधिक आकर्षक बनाना था। UTC के अधिकारी और कैडेट्स सेना की तरह वर्दी पहनते थे, जो सशस्त्र बलों के भारतीयकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। 1942 में, इसे यूनिवर्सिटी ऑफिसर्स ट्रेनिंग कोर के रूप में पुनः नामित किया गया। इस प्रकार, एनसीसी को UOTC का उत्तराधिकारी माना जा सकता है जिसे ब्रिटिश सरकार ने स्थापित किया था।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, UOTC ब्रिटिश उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। इससे यह विचार उभरा कि ऐसी बेहतर योजनाएं बनाई जाएं, जो शांति काल में भी अधिक युवाओं को बेहतर ढंग से प्रशिक्षित कर सकें। पंडित एच. एन. कुंजरु की अध्यक्षता वाली एक समिति ने सिफारिश की कि स्कूलों और कॉलेजों में एक राष्ट्रीय स्तर का कैडेट संगठन स्थापित किया जाए। गवर्नर जनरल द्वारा राष्ट्रीय कैडेट कोर अधिनियम को स्वीकार कर लिया गया और 15 जुलाई 1948 को राष्ट्रीय कैडेट कोर अस्तित्व में आया।
1949 में, लड़कियों के लिए ‘गर्ल्स डिवीजन’ की स्थापना की गई, ताकि स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियों को समान अवसर मिल सकें। 1950 में, एनसीसी को इंटर-सर्विस छवि दी गई, जब इसमें वायु सेना विंग को जोड़ा गया, और 1952 में नौसेना विंग को जोड़ा गया। इसी वर्ष, एनसीसी पाठ्यक्रम में सामुदायिक विकास/सामाजिक सेवा गतिविधियों को शामिल किया गया, जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू के सुझाव पर जोड़ा गया, जो एनसीसी के विकास में विशेष रुचि रखते थे।
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद, देश की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 1963 में एनसीसी प्रशिक्षण अनिवार्य कर दिया गया। 1968 में, इसे फिर से स्वैच्छिक कर दिया गया। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1971 के बांग्लादेश-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, एनसीसी कैडेट्स ने दूसरी पंक्ति के रक्षा कर्मियों के रूप में कार्य किया। उन्होंने आयुध कारखानों को सहायता प्रदान की, हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति की, और दुश्मन पैराट्रूपर्स को पकड़ने के लिए गश्ती दल के रूप में काम किया।
1965 और 1971 के युद्धों के बाद एनसीसी पाठ्यक्रम को संशोधित किया गया। अब इसे केवल रक्षा की दूसरी पंक्ति न मानकर नेतृत्व कौशल और अधिकारी जैसी योग्यताओं के विकास पर जोर दिया गया। एनसीसी कैडेट्स को मिलने वाले सैन्य प्रशिक्षण को कम कर दिया गया और सामाजिक सेवा और युवा प्रबंधन जैसे अन्य क्षेत्रों को अधिक महत्व दिया गया।
1988 में राष्ट्रीय कैडेट कोर का उद्देश्य निर्धारित हुआ था तथा यह समय की कसौटी पर खरा उतरा है। देश की वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में भी अपेक्षित आवश्यकता को पूरा कर रहा है। एनसीसी का लक्ष्य युवाओं में चरित्र निर्माण, कमांडरशिप, अनुशासन, धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण, साहस की भावना तथा स्वयं सेवा के आदर्शों को विकसित करना है। इसके अलावा इसका उद्देश्य जीवन के सभी क्षेत्रों में नेतृत्व गुणों के साथ संगठित, प्रशिक्षित और प्रेरित युवाओं का एक पूल बनाना है, जो राष्ट्र की सेवा करेंगे चाहे वे किसी भी कैरियर का चयन करें। कहने की जरूरत नहीं कि राष्ट्रीय कैडेट कोर युवा भारतीयों को सशस्त्र बलों में शामिल एवं प्रेरित करने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है।
1948 के कश्मीर युद्ध ने भारत को एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया कि स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मजबूत सशस्त्र बलों की आवश्यकता होती है। इसका त्वरित प्रभाव यह हुआ कि कुंजरु समिति की सिफारिशें 13 मार्च 1948 को संविधान सभा (विधायिका) के समक्ष प्रस्तुत की गईं। 19 मार्च 1948 को एक मसौदा विधेयक संविधान सभा (विधायिका) को भेजा गया, जिसने सभी सदस्यों के बीच गहरी रुचि और उत्साह उत्पन्न किया। विचार-विमर्श और संशोधनों के बाद, यह विधेयक 8 अप्रैल 1948 को सभा द्वारा पारित किया गया। केंद्र सरकार ने प्रांतीय सरकारों की राय और स्थायी समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया और कुंजरु समिति की सिफारिश पर “राष्ट्रीय कैडेट कोर” नामक एक कैडेट कोर के गठन को मंजूरी दी।
यह विधेयक 16 अप्रैल 1948 को गवर्नर जनरल की स्वीकृति प्राप्त कर “राष्ट्रीय कैडेट कोर अधिनियम, 1948” (अधिनियम संख्या XXXI, 1948) के रूप में पारित हुआ। इस अधिनियम में 13 धाराएं थीं, जो भारत में राष्ट्रीय कैडेट कोर के गठन का प्रावधान करती थीं।
एनसीसी के गठन की प्रक्रिया का पहला कदम एनसीसी सचिवालय की स्थापना थी, जिसे अब मुख्यालय महानिदेशालय एनसीसी कहा जाता है। वास्तव में, एनसीसी विधेयक के संविधान सभा (विधायिका) द्वारा पारित होने से पहले ही, रक्षा मंत्रालय ने एनसीसी सचिवालय का प्रारंभिक ढांचा स्थापित कर दिया था। कर्नल गोपाल गुरुनाथ बेवूर को एनसीसी के पहले निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने 31 मार्च 1948 को एनसीसी निदेशक का पदभार ग्रहण किया।
एनसीसी के मुख्य उद्देश्य
मेरा आदर्श वाक्य है ड्यूटी और यूनिटी।
देश के युवाओं में चरित्र निर्माण, सहकारिता, सेवा के आदर्श और नेतृत्व क्षमता का विकास करना
युवाओं को सेवा प्रशिक्षण प्रदान करके देश की रक्षा में रुचि उत्पन्न करना
एक ऐसा आरक्षित बल तैयार करना जो राष्ट्रीय आपातकाल में सशस्त्र बलों को तेजी से विस्तारित करने में सक्षम हो
आज मैं दुनिया की सबसे बड़ा वर्दीधारी युवा संगठन बन गया हूं। जब मेरी यात्रा शुरु हुई थी तब मेरी संख्या मात्र 20 हजार थी और आज मेरे पास 20 लाख कैडेट्स की स्वीकृत संख्या है।
एनसीसी परेड का विधिवत आरंभ सर्व धर्म पूजा अर्चना के साथ शुरू होती है। और इस भव्य आयोजन की सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाती है। इतना ही नहीं यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है कि 2025 गणतंत्र दिवस शिविर में कुल 2361 कैडेट्स हिस्सा ले रहे हैं। इनमें 917 कैडेट्स लड़कियां हैं। यकीन मानिए…ये लड़कियां जो 26 जनवरी की रिपब्लिक डे परेड में हिस्सा ले रही हैं उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य राजपथ पर परेड का हिस्सा बनना रहा है। आज इनके सपने साकार हो रहे हैं…हम हर कैडेट की आंखों में इन सपनों को साकार होते देख सकते हैं। इस बार के एक महीने के एनसीसी शिविर में जम्मू कश्मीर और लद्दाख से 114 कैडेट्स, उत्तर पूर्वी क्षेत्र से 178 कैडेट्स शामिल हैं। साथ ही युथ एक्सेंज प्रोग्राम के तहत 18 मित्र देशों के 144 केडेट्स शामिल हैं।
मैने एक अनोखी पहल की शुरुआत की। इसमें पूरे देश से नौसेना विंग के 528 कैडेट ने हिस्सा लिया। इन कैडेट्स ने उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से होकर गंगा और हुगली नदियों के किनारे लगभग 1,200 किलोमीटर की जल यात्रा की। ‘भारतीय नदिया-संस्कृति की जननी’ थीम पर आधारित इस जलयात्रा को 21 अक्टूबर, 2024 को कानपुर से रवाना किया गया और 20 दिसंबर, 2024 को कोलकाता में इस जलयात्रा का समापन हुआ।
देशभर के कई एनसीसी निदेशालयों के 34 कैडेट्स, 6 अधिकारियों और 20 स्थायी प्रशिक्षक कर्मचारियों की टीम ने एमटी अबी गमिन की चढ़ाई के चुनौतीपूर्ण अभियान में भाग लिया। टीम ने 4-5 फीट ताजा बर्फ का सामना किया। इसके बावजूद, टीम ने उल्लेखनीय दृढ़ता का प्रदर्शन किया। उन्होंने करीब 7,000 मीटर की सराहनीय ऊंचाई हासिल की।
अनुशासन, एकता, साहस और समर्पण के दम पर आज एनसीसी ने विश्व पटल पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। बात युद्ध की हो या फिर शांति के समय की, देश में आंतरिक समस्या हो या फिर कोरोना जैसी महामारी का दौर। जब जब देश को इन प्रशिक्षित युवाओं की जरुरत महसूस हुई तब तब इन्होंने अपनी कर्तव्यनिष्ठा से देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखा।
(लेखक भारत में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

