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प्रकृति आधार है हमारे जीने का : डा.श्वेता दीप्ति

 

काठमान्डू 5 जून


आज सम्पूर्ण भूमण्डल प्रकृति की असहज दशा और पर्यावरणीय चिन्ता से त्रस्त है । विकसित समाज और आधुनिक बनने की चाहत ने प्रकृति के साथ निरन्तर खिलवाड़ किया है जिसका परिणाम मानव समाज भुगत रहा है बावजूद इसके इसे सुरक्षित करने के प्रति मानव सचेत नहीं हो पाया है । प्रकृति, जिससे जीवन है, जिससे हम हैं और जो हमारे लिए है उसे ही हम तबाह करने पर तुले हुए हैं ।
पर्यावरण मनुष्य के जीवन को संतुलित एवं नियंत्रित रखता है। प्रकृति प्रदत्त समस्त उपादानों के साथ खेलकर मनुष्य आनंद ले रहा है, यह भूलकर कि हमारे इस अन्याय के लिए प्रकृति हमें क्या दंड देगी, हमारे बाह्य एवं आंतरिक भाव के वातावरण को प्रकृति ही संतुलित करती है। वनस्पति, जीव–जंतुओं, धरती, पानी, हवा, प्रकाश का दोहन अंधाधुध हो रहा है। साथ ही मानवीय भाव, प्रेम, संवेदना, उदात्तता का भी दोहन दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण मानवजाति के अस्तित्व के लिए जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी मानवीय भाव और संवेदना भी है। कवियों ने प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर मानवीय भाव–भूमि के पर्यावरणीय उद्बोधनों को नया आयाम प्रदान किया है छायावादी कवियों ने प्रकृति का मानवीकरण कर प्रकृति के अचेतन एवं जड़ अवयवों को सचेतना से जोड़ा है। प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने कविता करने की प्रेरणा का स्रोत प्रकृति को ही बताया है । आधुनिक युग में काव्यों में प्रकृति चित्रण उन रूपों में चित्रित हुई है, जिसमें आलंबन, उद्दीपन, संवेदनात्मक वातावरण निर्माण, रहस्यात्मक, प्रतीकात्मक अलंकार योजना, मानवीकरण लोकशिक्षा और दूती के रूप में प्रकृति चित्रित की जाती है। समस्त पर्यावरणीय बाह्य वृतियों के अध्ययन के साथ–साथ पर्यावरणीय अंतवृतियों का अध्ययन भी आवश्यक है, जो साहित्य में ही संभव है । छायावादी कवियों का प्रकृति से गहरा नाता रहा है। छायावादी कवि जगत् के अणु अणु एवं कण कण में एक अलौकिक सौंदर्य की छटा देखता है। जयशंकर प्रसाद अपनी कालजयी रचना कामायनी में समस्त प्रकृतिप्रदत्त शक्तियों का भौतिकवादी मानवों द्वारा शोषण का वर्णन करते हुए कहते हैं
प्रकृत शक्ति तुमने यंत्रों से सबकी छीनी,
शोषण कर जीवनी बना दी जर्जर झीनी
पर्यावरण अपने बाह्य उपादनों के साथ स्वयं एक साध्य के रूप में साहित्य में अहम् भूमिका निर्वहन करता है। कविता के बाहरी और भीतरी दोनों ही स्तरों में पर्यावरण सौंदर्य की खोज में रत् संयोग और वियोग को प्रतिष्ठापित करने का प्रयास करता है। जहां एक ओर भाव प्रकृति के साथ प्रेम और आत्मउद्बोधन बनकर सौंदर्य सृष्टि का साधन बनते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रेम और आत्मउद्बोधन प्रकृति के साथ अंतर्संबंधित होकर रमणीय चित्रमयता को साकार करते हैं।
पर्यावरणीय अवधारणा प्रकृति शब्द की व्यंजना को चरितार्थ करती है। कवियों ने प्रकृति को कल्पना शक्ति के अलौकिक, अद्भुत, अपराजित सृष्टि विधायनी अस्त्र के रूप में अपना हथियार बनाया। इसी हथियार के माध्यम से अनेक अनगढ़ शिल्पों को गढ़ा। प्रकृति को अनुभूति प्रकाशन का माध्यम बनाकर प्रेम, पीड़ा, दर्द, अवसाद, दुस्ख, विरह, वेदना का अंकन किया।
प्रकृति चित्रण द्वारा प्रेम वेदना की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति की। संयोग सुखों की मादक स्मृति को प्रकृति के माध्मय से मनोदशा चित्रण का साधन बनाया। वैयक्तिक भाव–भूमि से परे प्रकृति में ही कवियों ने व्यथित विश्व के प्रति सहानुभूति की हार्दिक भावाभिव्यंजना की। गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने साहित्य में प्रकृति का अनुपम चित्रण किया है। वे कहते हैं, एक अंकुर को देखकर जो प्रसन्नता का अनुभव होता है, उसकी तुलना और किसी खुशी से नहीं की जा सकती।
अज्ञेय ने कहा है कि साधारण बोलचाल में ‘प्रकृति’ ‘मानव’ का प्रतिपक्ष है, अर्थात मानवेतर ही प्रकृति है, वह सम्पूर्ण परिवेश जिसमें मानव रहता है, जीता है, भोगता है और संस्कार ग्रहण करता है और भी स्थूल दृष्टि से देखने पर प्रकृति मानवेतर का वह अंश हो जाती है जो कि इन्द्रियगोचर है, जिसे हम देख, सुन और छू सकते हैं, जिसकी गन्ध पा सकते हैं और जिसका आस्वादन कर सकते हैं। साहित्य की दृष्टि कहीं भी इस स्थूल परिभाषा का खंडन नहीं करती, किन्तु साथ ही कभी अपने को इसी तक सीमित भी नहीं रखती। अथवा यों कहें कि अपनी स्वस्थ अवस्था में साहित्य का प्रकृतिबोध मानवेतर, इन्द्रियगोचर, बाह्य परिवेश तक जाकर ही नहीं रुक जाता क्योंकि साहित्यिक आन्दोलनों की अधोगति में विकृति की ऐसी अवस्थाएँ आती रही हैं जब उसने बाह्य सौन्दर्य के तत्त्वों के परिगणन को ही दृष्टि की इति मान लिया है। यह साहित्य की अन्तःशक्ति का ही प्रमाण है कि ऐसी रुग्ण अवस्था से वह फिर अपने को मुक्त कर ले सका है, और न केवल आभ्यन्तर की ओर उन्मुख हुआ है बल्कि नयी और व्यापकतर संवेदना पाकर उस आभ्यन्तर के साथ नया राग सम्बन्ध भी जोड़ सका है।
प्रकृति के प्रेमी हैं अज्ञेय क्योंकि प्रकृति के बगैर साहित्य अधूरा है । सुख हो दुख हो, विरह हो या मिलन हो, जीवन हो या मृत्यु हो, प्रकृति मानव मन की भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए हमेशा आलम्बन बनी है । अज्ञेय प्रकृति के सौन्दर्य का आचमन करने में पूर्णतया दक्ष हैं । संध्या का आगमन और उसके साथ ही आकाश में टिमटिमाता एक अकेला सितारा और उस सौंदर्य को निहारती कवि की आँखें—
उषा अनागता पर प्राची में
जगमग तारा एकाकी
चेत उठा है शिथिल समीरण
मैं अनिमिष हो देख रहा हूँ
यह रचना भैरव छविमान ।
तेरा स्थान, (इत्यलम)
और फिर संध्या सुन्दरी के आगमन को उनका मन आतुर हो उठता है —
संध्या की किरण परी ने, उठ अरुण पंख दो खोले…..
देखी उस अरुण किरण ने, कुल पर्वतमाला श्यामल
बस एक श्रृंग पर हिम का, था कम्पित कंचन झलमल ।—अंतिम आलोक(इत्यलम)
सुमित्रानन्दन पन्त ने प्रकृति की कल्पना प्रेयसी के रूप में की और ‘निराला’ ने संवाहिका शक्ति के रूप में और दोनों कवियों के प्रकृति चित्रण में समानता और अन्तर दोनों ही पहचाने जा सकते हैं। किन्तु जिस व्यक्तिगत अन्तर की बात हम कह रहे हैं वह इससे गहरा था। निःसन्देह काव्यगत चित्रों पर कवि के व्यक्तित्व के इस आरोप का अध्ययन पश्चिमी साहित्य के सन्दर्भ में किया जा सकता है और दिखाया जा सकता है कि उसमें भी अँग्रेज रोमांटिक काव्य के व्यक्तिवाद का कितना प्रभाव था और यदि व्यक्तिवाद के विकृत प्रभावों को ही ध्यान में रखा जाए तो यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि पश्चिमी प्रभाव यहाँ भी विकृतियों का आधार बना, जैसा कि वह पश्चिम में भी बना था। किन्तु किसी प्रभाव का केवल उसकी विकृतियों के आधार पर मूल्यांकन नहीं किया जा सकता और रोमांटिक व्यक्तिवाद का स्वस्थ प्रभाव यह था कि उसने प्रकृति के चित्रों को एक नयी रागात्मक प्रामाणिकता दी। जो तथ्य था और सबका ‘जाना हुआ था उसे उसने एक व्यक्ति का ‘पहचाना हुआ बनाकर उसे सत्य में परिणत कर दिया। जहाँ यह व्यक्तिगत दर्शन केवल असाधारणत्व की खोज हुआ और यह प्रवृत्ति पश्चिम में भी लक्षित हुई जैसी कि हिन्दी के कुछ नये कवियों में वहाँ उत्तम काव्य का निर्माण नहीं हुआ। जैसा कि रामचन्द्र शुक्ल ने कहा है ः
‘केवल असाधारणत्व दर्शन की रुचि सच्ची सहृदयता की पहचान नहीं है।’ किन्तु जहाँ व्यक्तिगत दर्शन ने उस पर खरी अनुभूति की छाप लगा दी वहाँ उसके देखे हुए बिम्ब और दृश्य अधिक प्राणवान और जीवनस्पन्दित हो उठे। यह भी रामचन्द्र शुक्ल का ही कथन है कि ः
‘वस्तुओं के रूप और आस पास की वस्तुओं का ब्यौरा जितना ही स्पष्ट या स्फुट होगा उतना ही पूर्ण बिम्ब ग्रहण होगा और उतना ही अच्छा दृश्यचित्रण कहा जाएगा ।’
और यह व्यक्तिगत दर्शन या निजी अनुभूति की तीव्रता ही है जो वस्तुओं के रूप को ‘स्पष्ट या स्फुट’ करती है। प्रकृति के जो चित्र रीतिकाल के कवि प्रस्तुत करते थे, वे भी यथातथ्य होते थे। उस काव्य की समवर्तिनी चित्र कला में शिकार इत्यादि के जो दृश्य आँके जाते थे वे भी उतने ही रीतिसम्मत और यथातथ्य होते थे। किन्तु व्यक्तिगत अनुभूति का स्पन्दन उनमें नहीं होता था और इसीलिए उनका प्रभाव वैसा मर्मस्पर्शी नहीं होता था। बाँसों के झुरमुट पहले भी देखे गए थे, किन्तु सुमित्रानन्दन पन्त ने जब लिखा ः
बाँसों का झुरमुट, संध्या का झुटपुट
हैं चहक रही चिडि़याँ, टी वी टी टुट टुट ।
तब यह एक झुरमुट बाँसों के और सब झुरमुटों से विशिष्ट हो गया क्योंकि व्यक्तिगत दर्शन और अनुभूति के खरेपन ने उसे एक घनीभूत अद्वितीयता दे दी…जब हम दृश्य चित्रण की परम्परा का अध्ययन इस दृष्टि से करते हैं तब यह स्पष्ट हो जाता है कि छायावाद ने प्रकृति को एक नया सन्दर्भ और अर्थ दिया जो न केवल उसे तत्काल पहले के खड़ी बोली के युग से अलग करता है बल्कि खड़ी बोली के उत्थान से पहले के युगों से भी अलग करता है ।… छायावाद के लिए ‘प्रकृति’ मानवेतर यथार्थ का पर्याय नहीं थी, मानव के साथ मानव–निर्मिति को छोडकÞर शेष जगत भी उसकी प्रकृति नहीं था। बल्कि इस शेष में जो सुन्दर था, जो सौष्ठव सम्पन्न था, जो ‘रूप’ सम्पन्न था, वही उसका लक्ष्य था। शास्त्रीय (क्लासिकल) दृष्टि में प्रकृति की हर क्रिया और गति–विधि एक व्यापक नियम अथवा ऋतु की साक्षी है । छायावाद की दृष्टि ऋतु को अमान्य नहीं करती थी, पर उसका आग्रह रूप सौष्ठव पर था। नयी कविता के रूप का आग्रह कम नहीं है, पर उसने सौष्ठव वाले पक्ष को छोड़ दिया है, तद्वत्ता पर ही वह बल देती है। ‘व्यवस्थित संसार’ के स्थान में ‘सुन्दर संसार’ की प्रतिष्ठा हुई थी, अब उसके स्थान में ‘तद्वत संसार’ ही सामने रखा जाता है। इतना ही नहीं, मानव निर्मिति को भी उससे अलग नहीं किया जाता क्योंकि ऐसी असम्पृक्त प्रकृति अब दीखती ही कहाँ है ?
इस प्रकार प्रकृति वर्णन का वृत्त कालिदास के समय से पूरा घूम गया है। कालिदास ‘प्रकृति के चौखटे में मानवी भावनाओं का चित्रण’ करते थे, आज का कवि ‘समकालीन मानवीय संवेदना के चौखटे में प्रकृति’ को बैठाता है और, क्योंकि समकालीन मानवीय संवदेना बहुत दूर तक विज्ञान की आधुनिक प्रवृत्ति से मर्या्दित हुई है, इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि आज का कवि प्रकृति को विज्ञान की अधुनातन अवस्था के चौखटे में भी बैठाता है।

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डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमलिनी ।
काठमांडू, नेपाल ।

 

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