न्यायपालिका पर पड़ा राजनीति का साया: पूर्वन्यायाधीशों की टिप्पणी
काठमांडू, 10 जुलाई 2025 । पूर्वन्यायाधीशों की संस्था पूर्वन्यायाधीश फोरम नेपाल ने हाल ही में संविधानिक इजलास द्वारा जारी आदेश की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि इस निर्णय से न्यायपालिका पर राजनीतिक प्रभाव की छाया स्पष्ट रूप से देखी गई है।
फोरम ने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि संविधानिक इजलास ने न्यायिक स्वतन्त्रता की रक्षा करने में स्वयं असफलता देखाई, जिससे आम जनता में यह धारणा बन रही है कि न्यायपालिका राजनीतिक प्रभाव में आई है।
अध्यादेश असंवैधानिक, न्यायिक प्रक्रिया कमजोर
फोरम ने 18 असार को जारी निर्णय के सन्दर्भ में कहा कि कार्यपालिका द्वारा गणपूरक संख्या (quorum) घटाने हेतु जारी अध्यादेश न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इसने संविधान और विधायिका के मूल उद्देश्य को ही नष्ट कर दिया है।
फोरम के अनुसार, संसद द्वारा पारित किसी कानून को अध्यादेश के माध्यम से बदलना संविधान के खिलाफ है।
संवैधानिक सर्वोच्चता पर हमला
विज्ञप्ति में यह भी उल्लेख किया गया है कि असंवैधानिक अध्यादेश के आधार पर संवैधानिक पदाधिकारी नियुक्त कर, उसे इजलास द्वारा वैध ठहराना कार्यपालिका की निरंकुशता को बढ़ावा देना है।
फोरम ने यह स्पष्ट किया कि इस प्रकार के आदेशों से संवैधानिक सर्वोच्चता की मान्यता खत्म हो रही है।
संसद की भूमिका और नियमावली पर सवाल
फोरम ने संविधान की धारा 292(1) का हवाला देते हुए कहा कि संसदीय सुनवाई बाध्यकारी है, लेकिन प्रतिनिधि सभा द्वारा इसे निष्क्रिय कर देना संविधान के खिलाफ है।
फोरम के अनुसार, संसद की नियमावली को संविधान की बराबरी में रखने की व्याख्या भी गलत और त्रुटिपूर्ण है।
फैसला विरोधाभासी, न्यायपालिका असमंजस में
फोरम ने यह भी कहा कि संवैधानिक इजलास को याचिकाओं और बहस में उठे मुद्दों के आधार पर आदेश जारी करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उनके अनुसार, एक ही आदेश में बहुमत और अल्पमत की स्पष्टता न होना, और एक न्यायाधीश द्वारा परमादेश जारी करने की राय परस्पर विरोधाभासी है, जिससे न्यायिक भ्रम और असमंजस की स्थिति बनी है।
संस्था की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि पूर्वन्यायाधीश फोरम नेपाल उन पूर्वन्यायाधीशों द्वारा गठित संस्था है जो सक्रिय न्यायाधीशों के सार्वजनिक टिप्पणी न करने के नियमों से अलग होकर सार्वजनिक मुद्दों पर स्वतंत्र रूप से टिप्पणी करती है।
इस संस्था के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्वन्यायाधीश टोपबहादुर सिंह हैं।
यह पहला अवसर नहीं है जब फोरम ने सार्वजनिक रूप से न्यायिक फैसलों पर प्रतिक्रिया दी हो। हालिया बयान ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि क्या नेपाल की न्यायपालिका राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रह पाई है?


