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स्मृति में बीपी : चंदन दुबे

 

चन्दन दुबे, जलेश्वर, 22 जुलाई 025 । एक निरंकुश तानाशाही व्यवस्था को फेंकने के लिए जिस किसी भी तरह के साधनों को अपनाया जाय वो सभी जायज है “!
जहाँ तक मेरा निजी मामला है, तो मैं राजतन्त्र के खिलाफ नहीं हूँ किन्तु निरंकुश राजतन्त्र का मैं घोर विरोधी हूँ ! मुझे जिन मुक़दमों में संलग्न बताया गया है, उन सभी की जिम्मेवारी मेरी है ! नेपाल सरकार ने मुझे जिन विध्वंसात्मक, हिंसात्मक, राजतन्त्रको बर्खास्त करने और पंचायती व्यवस्था को पलटने का आरोप लगाया है उसमे मेरी किसी तरह की प्रत्यक्ष संलग्नता नहीं है ! किन्तु मैंने अपने वक्तव्यों, भाषणों एवं विचारधारा के द्वारा आंदोलनकारियों और प्रजातंत्रवादियों को प्रेरणा जरूर दि है ! मैं उन आंदोलनकारीयों के प्रेरणा का स्रोत होने के नाते खुद को दोषी मानता हूँ ! अब सरकार की जो मर्जी हो सो करे ! मैं सभी सरकारी कार्यवाही के लिए तैयार हूँ !
उपरोक्त स्टेटमेंट महामानव बीपी कोईराला ने वी.सं. २०३४ साल वैशाख १७ तथा जेष्ठ ४ गत्ते के रोज विशेष अदालत में उनके ऊपर चल रहे मुक़दमे के सन्दर्भ में दिया था ! गौरतलब है की जिन आठ धाराओं में उनपर मुकदमा दर्ज किया गया था उसमें उन्हें मृत्युदण्ड की सजा भी हो सकती थी ! बड़े निर्भीकता के साथ बीपी ने अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही को प्रदर्शित किया था !
निरंकुश राजतन्त्र के घोर विरोधी रहे बीपी नेपाल में अमन कायम रखने हेतु संवैधानिक राजतन्त्र की स्वीकृति भी देते रहे !
दरअसल वो बीपी ही थे जिनके दूरदर्शी और कुशल नेतृत्व में सफलतम प्रजातान्त्रिक आंदोलन के द्वारा १०४ वर्षों से चले आ रहे जहानियाँ राणा शासन को ख़त्म कर दिया गया !
शाहवंशिय राजपरिवार में आपसी मतभेद, स्वार्थ और अंतर्कलह बढ़ता जा रहा था ! राजा और राजपरिवार भोग विलास में व्यस्त रहते थे ! उनके इस मतभेद और अयोग्यता को एक मामूली भारदार जंग बहादुर राणा ने अवसर के रूप में उपयोग करना शुरू किया ! राजदरबार में घटित कोतपर्व और भण्डारखाल जैसी स्वार्थपूर्ण हिंसक घटनाओं के बाद जंग बहादुर शक्तिशाली होता गया !  धीरे धीरे पहले सेनापति फिर भण्डारखाल नरसंहार के पश्चात् शक्तिशाली प्रधानमंत्री बन बैठा ! सम्पूर्ण अधिकार खुद में निहित करते हुए राजा को केवल दुनियाँ को दिखाने हेतु गद्दी पर बिठाये रखा ! उसने कई राजा रानीयों को भी देश से निष्काषित कर दिया ! जिन्होंने बनारस जाकर रहना उचित समझा !
शाह वंश को नाम मात्र हेतु राजा मानते हुए जंग बहादुर ने सन १९४६ में बतौर प्रधानमंत्री जहानियाँ राणा शासन का संचालन किया !
जंग बहादुर ने देश की भूमि, कोष और राजाश्व का उपभोग अपने भाई भरदारों में बाँट दिया ! देश का राजश्व और किसानों से जबरन वसूला हुआ टैक्स राणा शासन के बड़े अधिकारी और भारदार उपभोग करते थे ! किसानों से बड़ी क्रूरता के साथ कर वसूला जाता था!
राणा शासनकाल में दलितों और महिलाओं के ऊपर चरम विभेद की स्थिती थी ! महिलाओं की मर्यादा का कोई मोल नहीं था ! राजपरिवार,राणा और उनके द्वारा नियुक्त किए गए जमींदारों के घरों में महिलाओं को बहुत कम पारिश्रमिक में दासी रखा जाता था ! साथ ही उनका शोषण भी किया जाता था ! इस व्यवस्था में देश का प्रधानमंत्री राज्य के खजाने को अपनी मर्जी से उपयोग कर सकता था ! प्रधानमंत्री के मृत्यु पश्चात् भाई को प्रधानमंत्री नियुक्त करने की व्यवस्था थी ! जनता को किसी प्रकार का कोई मौलिक अधिकार नहीं था ! देश के प्रायः सभी बड़े अधिकारी पदाधिकारी राणा वंश के होते थे ! राज्य व्यवस्था का विरोध अथवा अधिकार की बात करने पर सख्त सजा य फिर मृत्युदण्ड दिया जाता था ! राणाओं के मुख से निकला हुआ शब्द ही कानून होता था!
ये लोग खुद को देवदूत य ईश्वर का अंश मानते थे और जनता के दुखों को उनके भाग्य का दोष बतलाते थे !
जनता में बड़ी छटपटाहट थी, लोग क्रूर जहानियाँ राणा शासन के क़हर से तड़प रहे थे ! किन्तु कोई रास्ता नहीं दिख रहा था ! हालांकि लोगों के अधिकार की लड़ाई हेतु टंक प्रसाद आचार्य के नेतृत्व में गणेशमान सिंह, रामहरि शर्मा, शुक्रराज शास्त्री, धर्मभक्त और दशरथ चन्द सहित कुछ नेताओं ने वी.सं. १९९३ में नेपाल प्रजा परिषद की स्थापना की ! इस संगठन ने संघर्ष का कार्यक्रम तेज किया ! जनता में भी सुगबुगाहट तेज हो गई ! परिणाम स्वरुप राणाओं ने वी.सं. १९९७ में राजद्रोह लगाते हुए टंक प्रसाद आचार्य, दशरथ चन्द, शुक्रराज शास्त्री, धर्मभक्त माथेमा और गंगालाल श्रेष्ठ को मृत्युदण्ड की सजा सुनाई ! जिसमें टंक आचार्य ब्राह्मण होने के कारण आजीवन कारावास भेज दिए गए बांकी चार लोगों को मृत्युदण्ड दिया गया ! जो नेपाल के प्रजातान्त्रिक आन्दोलन के प्रथम शहीद भी कहलाए !
इस घटना के बाद लोगों में काफी आक्रोश पैदा हुआ और फिर जेल में रहते हुए टंक प्रसाद आचार्य के नेतृत्व में क्रांति के उद्घोष के साथ वी.सं. २००३ कार्तिक १२ गत्ते नेपाली राष्ट्रिय कांग्रेस पार्टी की स्थापना हुई जिसके कार्यवाहक सभापति हुए ३३ वार्षिय विशेश्वर प्रसाद कोईराला “बीपी” !
राणा शासन काल में देश में विकास की स्थिती शून्य थी और गरीबी चरम पर ! बीपी के पिता कृष्ण प्रसाद कोईराला ने गरीब के फ़टे हुए कपड़ों का पार्सल बनाकर राणा शासक को भेज दिया था ! जिस व्यंग्य के कारण चन्द्र शमशेर राणा ने उनको जेल भेज दिया था जहाँ उनकी मृत्यु भी जेल जीवन में ही हो गई थी !
बीपी के मन में भी राणाओं के प्रति आक्रोश था!
वी सं. २००४ में विराटनगर जुट मिल के मजदूर आंदोलन का नेतृत्व बीपी ने नेपाली राष्ट्रिय कॉंग्रेस के कार्यवाहक सभापति के तौर पर किया और नेपाल में पहली बार जेल गए ! वी.सं.२००६ चैत्र २७ गत्ते को नेपाली राष्ट्रिय कॉंग्रेस ने प्रजातान्त्रिक विचारधारा वाले समूहों के साथ समन्वय करते हुए जनक्रांति हेतु शंखनाद किया जहाँ से नेपाली कॉंग्रेस की स्थापना भी हुई !
वी.सं. २००७ साल के जनक्रांति का नेतृत्व बीपी ने लिया और उसी दृढ और कुशल नेतृत्व में हुए सशक्त संघर्ष के कारण वी.सं २००७ फाल्गुन ७ गत्ते राणा शासन ख़त्म हुआ और प्रजातंत्र की स्थापना भी हुई ! प्रजातंत्र स्थापना पश्चात् राजा त्रिभुवन शाह वापिस नेपाल लौटे और राणा कॉंग्रेस संयुक्त सरकार की स्थापना हुई जिसमें बीपी गृहमंत्री हुए !
किन्तु बीपी प्रजातंत्र के पक्षधर थे और जनता के लिए क़ानूनी राज्य और सामाजिक न्याय की वकालत करते थे ! वी.सं. २०१५ में हुए आम निर्वाचन में नेपाली कॉंग्रेस ने १०९ में ७४ सीटें जीतकर दो तिहाई का प्रचण्ड बहुमत प्राप्त किया ! नेपाली कॉंग्रेस के संसदीय दल के नेता बीपी कोईराला पहले जननिर्वाचित प्रधानमंत्री बने !
सरकार बनाने के साथ ही बीपी ने राणाओं द्वारा जनता की छिनी हुई जमीनों की समस्या समाधान के लिए भूमिसुधार तथा विर्ता उन्मूलन का काम आगे बढ़ाया ! उन्होंने “जसको जोत उसको पोत” के नीति को कार्यान्वयन हेतु आगे बढ़ाया ! बीपी समानता और समाजवाद के पक्षधर थे इसीलिए ” व्यवस्था बद्ले पछि अवस्था बद्लिनुपर्छ ” उनकी समाजवादी नीति थी !
नेपाली समाज में भयंकर असमानता विधमान है अतः शिक्षा, स्वस्थ्य और सम्पति में समानता लाने की आवश्यकता है बीपी का सिद्धांत था ! मार्क्स के समाजवाद से प्रभावित बिशेश्वर प्रसाद कोईराला ने नेपाल के लिए प्रजातान्त्रिक समाजवाद का दृष्टिकोण दिया ! नेपाली कॉंग्रेस ने इस दृष्टिकोण को मूल सिद्धांत के रूप में स्वीकारते हुए २०१२ साल के बिरगंज अधिवेशन द्वारा जारी दस्ताबेज और घोषणापत्र में सार्वजनिक किया था !
देश का विकास सहज और तीव्र गति में करने हेतु प्रजातान्त्रिक समाजवाद ही उत्तम व्यवस्था है, इसमें बीपी बहुत स्पष्ट थे ! बीपी के नेतृत्व में ही नेपाली कॉंग्रेस ने वी.सं. २०१३ में सोशलिस्ट इंटरनेशनल की पूर्ण सदस्यता ली थी जो आज भी कायम है ! जनता के जीवन स्तर को उठाने, आत्मनिर्भर, जगरूक और समर्थ बनाने हेतु राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता का एकमात्र विकल्प प्रजातान्त्रिक समाजवाद है बीपी बोलते थे !
बीपी ने जनता के स्वस्थ्य, शिक्षा,कृषि, आर्थिक उत्थान और मौलिक अधिकार के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करना सुरु किया ही था की राजा महेन्द्र ने बीपी कोईराला सरकार को वी.सं. २०१७ साल पूस १ गत्ते को बर्खास्त कर बीपी को सुंदरीजल जेल भेज दिया ! उनके साथ भद्रकाली मिश्र, गणेशमान सिंह और कृष्ण प्रसाद भट्टराई जैसे नेताओं ने भी आठ साल का जेल जीवन बिताया ! बीपी को २०२५ कार्तिक १४ गत्ते जेल से रिहा कर दिया गया जिसके बाद उन्होंने आगे का आठ साल भारत में बिताया !
ज़ब सिक्किम भारत के कब्ज़ा में आया तो बीपी को नेपाल की भी चिंता होने लागि ! बीपी ने अपने देश की मिट्टी में ही मरेंगे के दृढ निश्चय के साथ राष्ट्रिय मिलमिलाप का आह्वान करते हुए २०३३ पुस १६ गत्ते के दिन नेपाल प्रवेश किया !
कृष्ण प्रसाद कोईराला के तीसरे संतान के रुपमें बीपी कोईराला का जन्म वी.सं. १९७१ भदौ २४ गत्ते भारत के बनारस में हुआ था ! बिराटनगर में प्राथमिक शिक्षा के बाद  बीपी अध्ययन के लिए बनारस चले गए जहाँ से उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की ! आगे उन्होंने कलकत्ता विश्व विद्यालय से वी.सं. १९९३ में लॉ में ग्रेजुएशन भी किया था और कुछ दिनों के लिए दार्जिलिंग में वकालत की प्रैक्टिस भी की थी !
बताते चलें की बीपी सुरु से ही प्रजातंत्रवादी और साहसी रहे ! उन्होंने भारत में रहते अंग्रेजों के खिलाफ हुए स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया ! पहली बार भारतीय समाजवादी पार्टी के कार्यकर्त्ता के रुपमें सन् १९३० में जेल की यात्रा भारत में ही की थी ! दूसरी बार सन १९४२ में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जेल गए बीपी ने वहीं से राणा शासन के विरुद्ध संघर्ष करने के अभियान में लग गए थे !
कहते हैं बीपी की राजनीतिक चमक से एशिया के नेताओं में उनके प्रति ईर्ष्या होने लगी थी ! विपक्षी भी बीपी के प्रशंसक थे !
कोईराला कम्युनिष्ट के कटु आलोचक तथा विरोधी थे !
यधपी नेकपा एमाले के तत्कालीन महासचिव मदन भण्डारी ने वी.सं. २०४७ के एक अन्तर्वार्तामें कहा था “बीपी मलाई सबभन्दा मनपर्ने राजनेता हुन उहाँ भन्दा रचनात्मक सोंच र शैली का नेता दक्षिण एशियामा छैन “!
प्रचण्ड ने सुन्दरीजल जेल का दौरा किया था जहाँ वो बीपी के प्रयोग किए हुए वस्तुओं को छूते हुए भावुक हो गए थे !
बीपी के शैली और बौद्धिकता के विरोधी भी मुरीद थे!
बीपी के जीवन में अनेकों प्रलोभन आए किन्तु उन्होंने प्रजातंत्र और लोक कल्याण के लिए संघर्ष का रास्ता चुना !
वी.सं. २००९, २०१२ और २०१४ के अधिवेशन से लेकर वी.सं. २०३९ साउन ०६ गत्ते मृत्युपर्यंत बीपी ने कॉंग्रेस और देश का नेतृत्व किया !
केवल राजनीति में महानायक नहीं थे बीपी उन्होंने साहित्य में भी बखूबी नाम कमाया है ! नेपाली और हिन्दी में उन्होंने काफ़ी कथाएं, कविताएं और किताबें भी लिखी हैं ! खुद में साहित्य प्रेम जगाने वालों में बीपी ने भारतीय साहित्यकार शान्तिप्रिय द्विवेदी का नाम लिया है ! बीपी भारत के मुर्धन्य साहित्यकार मैथलीशरण गुप्त, अजमेरी, जयशंकर प्रसाद आदि के सानिध्यमें रहे और हिन्दी में अपने लेखनी को निखारा ! बाद में नेपाली में भी उन्होंने खूब लिखा ! नेपाली साहित्य में उनका कथा संग्रह स्वेत भैरवी और दोषी चश्मा काफ़ी लोकप्रिय साहित्य है !
सुन्दरीजल जेल जीवन को भी बीपी ने साहित्यमय बनाया है ! वहाँ लिखित उनकी पुस्तकें तीन घूम्ती (२०२५), नरेन्द्र दाई (२०२७), मोदिआईन (२०३६), हिटलर र यहूदी (२०४०), बुआ, आमा र छोरा (२०४५), बीपी कोईराला को समाजवाद, बीपी को डायरी और आत्म वृतान्त(२०५५) इत्यादि पुस्तकें प्रकाशित हैं जो आज भी अत्यंत लोकप्रिय और पठनीय है !
बीपी का आत्म वृतान्त तो प्रत्येक कॉंग्रेसीयों को पढ़नी ही चाहिए !
आज बीपी स्मृति दिवस के अवसर पर उनको याद करते हुए नेपाली कॉंग्रेस और नेपाली समाज को एकजुट होने की आवश्यकता है !
बीपी भले ही हमारे बिच नहीं हैं किन्तु उनके मार्गदर्शन पर चलते हुए नेपाली कॉंग्रेस और नेपाली समाज को लोकतान्त्रिक व्यवस्था की जो उपलब्धि मिली है उसके लिए बिशेश्वर प्रसाद कोईराला सदैव आदरणीय, अनुकरणीय और स्मरणीय रहेंगे !

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चन्दन दुबे
जलेश्वर

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