एक भटका हुआ देश, नेपाल : अजय कुमार झा
अजयकुमार झा, अंक जून 025 । मैं ऐसी स्थिति नहीं देखता, जहां नेपाल जैसे संप्रभु राष्ट्र को वैचारिक स्तर पर किसी अन्य देश से विचारों का आयात करने की आवश्यकता हो । दुनिया के तीन सर्वोत्तम धर्म और संस्कृतियाँ; चूंकि नेपाल की उपजाऊ धरती प्राचीन हिंदू संस्कृति, प्राचीन बौद्ध संस्कृति और प्राचीन किरात संस्कृति की जन्मभूमि है, इसलिए २०० साल के इतिहास वाले देशों से ज्ञान की भीख मांगना नेपालीपन का अपमान है ! यह बेवकूफी है ! हमारी कमजोरी यह है कि हम अपनी संस्कृति को बचा पाने में असमर्थ हैं । हमारी पुस्तकें पढ़कर यूरोपीय लोग हमारे स्वामी बन गए हैं और हमें यूरोप जाकर उनके चरवाहे बनने में गर्व महसूस होता है । यही हमारे मूल पतन का कारण है । यह हमारा दायित्व नहीं है कि हम ऊपर न उठ सकें, यह सिर्फ हमारी अज्ञानता है ।
पहली बात जो हमें सोचनी चाहिए वह है शारीरिक विकास । जब ५० साल पहले हम खाद्यान्न से लेकर कपड़े और अन्य विलासिता की वस्तुओं तक सब कुछ निर्यात कर रहे थे, तो इतने वैज्ञानिक विकास के बाद भी हम भिखारी कैसे बन गए ? पहले हम अपनी ९० प्रतिशत आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर थे, आज हमें एक किलो चावल भी बाहर से खरीदना पड़ता है । हम इतनी परनिर्भरता के साथ कैसे जीवित रह सकते हैं ? जैसा कि कहा जाता है, “पाराश्रित सपने खुशी नाही” ।
कौन नहीं जानता कि अमेरिका नेपाली जमीन और जÞमीर को खरीदने के लिए आकुल व्याकुल हो रहा है ? अमेरिका को नेपाल में जमीन क्यों खरीदनी पड़ी ? एक ओर हम नेपाली आधुनिकता का बिगुल बजा रहे हैं और कह रहे हैं कि नेपाल में रहने का मतलब है हाशिए पर रहना, वहीं दूसरी ओर भारत, अमेरिका और चीन हमारी जमीन के लिए भीषण संघर्ष करने को तैयार हैं । आखिर बुद्धिमान कौन है ? क्या हम नेपाली हैं या विदेशियों के लिए काम करने वाले विदेशी मिशनरी हैं ? क्या हम शुतुरमुर्ग की तरह चुपचाप, अपनी आंखें बंद करके, अपने घर की समस्याओं को सुलझाने में असमर्थ होकर बैठे रह सकते हैं ? समस्याएँ जीवंतता का प्रतीक हैं और समाधान ढूँढ़ना बुद्धिमत्ता का प्रतीक है । हमारे ऋषि और पूर्वजों ने ज्ञान के स्रोत और आकाश तक की खोज की है । उन्होंने ब्रह्माण्ड का वर्णन और विश्लेषण किया है तथा सृजन और प्रलय का सूत्र दिया है । बुद्ध ने जीवन की समस्याओं और उनके उचित समाधान के लिए सार्वभौमिक, अकाट्य सिद्धांत दिए हैं । फिर भी हम चंद पैसों की तलाश में अरब के रेगिस्तान में भटकते रहते हैं । उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी हम यूरोप और अमेरिका के चरवाहे बनने के लिए लालायित हो गए हैं । हम अपने सांसारिक परिवारों को छोड़कर कोरिया, जापान, कनाडा, भारत और ऑस्ट्रेलिया में खुशी की तलाश कर रहे हैं । जो कि असंभव है ।
देश के आंतरिक हालात दिन–प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे हैं तथा समस्याएं बढ़ती जा रही हैं, ऐसे में समस्या को ज्यों का त्यों छोड़ देना बुद्धिमत्ता नहीं बल्कि कायरता मानी जाएगी, जबकि तीव्र तकनीकी बुद्धिमता एवं विवेक का प्रयोग कर देश के लिए समाधान खोजने का प्रयास किया जाना चाहिए । हे एशिया के सितारा बुद्ध के बच्चों ! कम से कम अपने पूर्वजों के सम्मान की रक्षा करने का साहस तो दिखाओ ! कार में यात्रा करना, होटलों में खाना, शराब और मांस का सेवन करना आदि आधुनिकता का प्रमाण नहीं है । आंतरिक मन में कटुता, ईष्र्या, घृणा, लोभ, लालच, तनाव, भय, चिंता और हिंसा अतिभारित अवस्था में जमा हो गई है, और क्या बाहरी तौर पर मौज–मस्ती करने की बात करना अपने आप को धोखा देना नहीं है ? अरे संसार के लाखों अरबपति पुरुष और महिलाएं भारत, नेपाल और अन्य जगहों पर इस्कॉन मंदिरों में कृष्ण भक्ति का आनंद लेने के लिए यूरोप, अमेरिका, रूस और ऑस्ट्रेलिया छोड़ रहे हैं । वे अपने बच्चों को सनातन हिंदू संस्कृति की परंपराएं और संस्कार दे रहे हैं । वे त्याग, तपस्या, योग, ध्यान, भजन, कीर्तन, आनंद के सागर के माध्यम से परमात्मा की भक्ति में आनंदित हो रहे हैं । यह उनके लिए परम उपलब्धि है, जबकि हम पश्चिम के सामने आत्मसमर्पण कर रहे हैं, उन्हें भोजन देने के लिए अपनी बहुमूल्य विरासत को त्याग रहे हैं । क्या आप इस बारे में नहीं सोच सकते ?
चूँकि विचार की शक्ति सबसे अधिक प्रभावी और विश्वसनीय है, इसलिए हमें अपने अस्तित्व के बारे में सोचना चाहिए । अन्यथा हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों का बलिदान क्यों दिया ? क्या उसका जीवन व्यर्थ था ? या यह दूसरों के नियंत्रण में था ? नहीं, उन्होंने अपने धर्म, संस्कृति और बच्चों की रक्षा के लिए दुश्मन से लड़कर बहादुरी से मौत को स्वीकार किया था । बेशक, तब भी कुछ षड्यंत्रकारी मौजूद थे । बेशक वे थे. लेकिन उस समय किसी में भी आज की तरह अपने देश और धर्म के साथ खुलेआम गद्दारी करने का साहस नहीं था । आज सरकार चाहकर भी देश की सुरक्षा करने में असमर्थ है । भ्रष्टाचार से भरे देश में घोटाले पर घोटाले और कुछ हद तक दण्ड से मुक्ति अपने आप में चिंता का विषय है । लेकिन चूंकि ये सारी गतिविधियां पार्टी और नेतृत्व के संरक्षण में चलती हैं, इसलिए जनता असहाय और चुप रहने को मजबूर है । जो सरकार गरीब लोगों को भारत से एक किलो नमक भी नहीं लाने देती, वह इसके बदले हवाई अड्डे से सैकड़ों किलो सोना गायब कर देती है । इसे सामान्य घटना नहीं माना जाना चाहिए । इस प्रकार की उपेक्षा के कारण आज नेपाल का राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र कैंसरग्रस्त होता जा रहा है । भ्रष्टाचार एक कैंसर है जिसका निदान न होने पर व्यक्ति और राष्ट्र अपंग हो जाता है ।
यहां नेपाल का अस्तित्व ही खतरे में पड़ने वाला है । भ्रष्टाचार की सामूहिक प्रवृत्ति तथा देश को बांटने और लूटने की प्रवृत्ति ने नेपाल के अस्तित्व पर खतरे की घंटी बजा दी है । चूंकि समस्या अभी लाइलाज स्थिति में नहीं पहुंची है, इसलिए देश को बचाने के लिए अभियान को तुरंत तेज करना बुद्धिमानी होगी । समय बीतने के बाद रोने–धोने या शहीद होने से कुछ हासिल नहीं होगा । एक बुद्धिमान समाज में, संभावित खतरे की मात्र धारणा ही जागरूकता के लिए पर्याप्त है । वे अपने पड़ोसियों को दुर्घटना का कारण बताकर जागरूकता बढ़ाते हैं और समाज को दिशा प्रदान करके सामूहिक अस्तित्व की रक्षा करते हैं । वास्तव में ये देशभक्तों के सच्चे पुत्र हैं । दरअसल, ऐसे देशभक्त, लोक–हितैषी, सभ्य और सुसंस्कृत व्यक्तियों को तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता था । क्योंकि आज रक्षक ही देश के भक्षक बनते जा रहे हैं, सरकार स्वयं अत्याचार और भ्रष्टाचार की संरक्षक और पोषक बन गई है । अधिकारी समाज के लिए हानिकारक अपराधी साबित हो रहे हैं ।
१९५० के दशक के आरम्भ तक नेपाली नागरिक नहीं बल्कि प्रजा थे, और राज्य के प्रति उनके अधिकार नहीं बल्कि एकमात्र कर्तव्य थे । १९५०–५१ के राजनीतिक आंदोलन ने एक शताब्दी पुरानी राणा तानाशाही को समाप्त कर दिया । इसने देश में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाए और एक बहुदलीय राजनीतिक प्रणाली की शुरुआत की । पारंपरिक और आधुनिक ताकतों के बीच राजनीतिक संघर्ष के परिणामस्वरूप, राजा ने १५ दिसंबर १९६० को तख्तापलट कर दिया और १९६२ में पंचायत प्रणाली का उद्घाटन किया गया । लोकतंत्र लोकप्रिय समर्थन की कमी के कारण नहीं, बल्कि तख्तापलट के कारण समाप्त हो गया ।
१९६२ के पंचायत संविधान ने सभी कार्यकारी, विधायी और न्यायिक शक्तियां राजा को सौंप दीं । पंचायत प्रणाली का जोर एकीकरण को बढ़ावा देने पर था, न कि विविधता को प्रोत्साहित करने पर, भले ही राज्य के खिलाफ किसी भी प्रकार के सामाजिक–राजनीतिक प्रतिरोध को बलपूर्वक दबा दिया गया हो । उस समय की राजनीति उग्र राष्ट्रवादी नारे “सभी नेपाली पंच हैं, सभी पंच नेपाली“ से प्रेरित थी । पंचायती दर्शन में बहुलवाद के लिए कोई स्थान नहीं था ।
सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि १९६३ में नई नागरिक संहिता लागू करके जाति व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया । भौतिक बुनियादी ढांचे का योजनाबद्ध विकास, सड़कें प्रशासनिक और सुरक्षा कारणों से बनाई गईं, जिससे पहुंच और संपर्क भी बढ़ा । इसी प्रकार, देश भर में शिक्षा के विस्तार और संस्थागत विकास ने जाने–अनजाने एक जागरूक समुदाय का निर्माण किया, जिसने पंचायत व्यवस्था को भी जड़ से उखाड़ फेंकने का काम किया । इसी तरह १९९० में बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली के बाद, नेपाल में एक दशक के भीतर तीन संसदीय और दो स्थानीय चुनाव हुए । नेताओं के अयोग्यता, अक्षमता और पदलोलुपता ने विभिन्न विवादों और भ्रष्टाचार घोटालों के कारण जनता की नजरों में बदनाम कर दिया था । लोग लोकतांत्रिक प्रणाली और इन राजनीतिक दलों के नेताओं से तंग आ चुके थे । इसी बीच माओवादी का तांडव शुरू होने लगा । हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी । भीषण गृह संग्राम हुआ, सरकार हारकर समझौता करी और देश में एक नए युग का आरंभ हुआ । नया नेपाल का निर्माण होनेवाला था । लेकिन देश बेचुआ, बिकाऊ संस्कार कैसे मिट जाता ? बस वही विदेशी के इशारों पर सत्ता में बने रहने की पुरानी खेल शुरू होगया । परिणाम आज लाखों युवा राजा के पक्ष में खड़े हो गए हैं ।
यह युवा वर्ग समाज के इन राजनीतिक उलटफेर से असंतुष्ट होता जा रहा था । इस समूह के कुछ लोगों को तो यह भी पता नहीं था कि पिछली व्यवस्था में नागरिकों की स्थिति कैसी थी । विशेषकर २०६३ के बाद पैदा हुई पीढ़ी ने यह नैरेटिव गढ़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है कि ’देश में कुछ नहीं हुआ है ।’ यह पीढ़ी ठीक से अपने मताधिकार का प्रयोग भी नहीं कर पाई है । सूचना प्रौद्योगिकी और राजनीतिक सशक्तीकरण के साथ पैदा हुई यह पीढ़ी अतीत में वापस नहीं जाना चाहती । नेपाल के एक कोने में बैठी इस पीढ़ी ने दुनिया के कुलीन देशों की प्रगति और विकास को क्यों नहीं देखा है ? हमारा देश अमेरिका जैसा विकास क्यों नहीं कर पाया है ? हर दिन वे सरकार से सवाल करते हैं कि उन्हें सरकार जैसी सुविधाएं क्यों नहीं मिल पा रही हैं । हमपर सांस्कृतिक आक्रमण क्यों हुआ ? हम ८० प्रतिशत हिंदू होते हुए भी धर्म निरपेक्ष क्यों किया गया ? किसके इशारे पर किया गया ? विकास के नामपर हो रहें ब्रह्मलुट का जिम्मेवाद कौन है ? अपराधियों को कौन संरक्षण देता आया है ? जनता के पैसा को विदेशी बैंकों में किस किसने और क्यों रक्खा ? आम युवा युवती खाड़ी देशों में अपनी जवानी और खून पसीना बहा रहा है और ए देश बेचुआ बूढ़े लोग मौज मस्ती करते हैं । अब यह हमें स्वीकार नहीं है । इन सारी भावनाओं और प्रताड़नाओं का इकठ्ठा शक्ति प्रक्षेपण गणतंत्रवादी के विरुद्ध है जिसके लाभदायक साइड इफेक्ट राजा वादियों को सहज ही में मिल रहा है ।
ध्यान रहे ! न राजा के प्रति आम आदमी में श्रद्धा बढ़ी है न राजाबादी नेतृत्व के प्रति ही, परन्तु जब जीवन खतरे में हो, धर्म पर संकट हो, संस्कृति ह्रासन्मुख हो और सरकार निकम्मा तथा शत्रुओं के इशारे पर चल रही हो तब सिद्धांत और प्रणाली को नजर अंदाज कर तात्कालीन समाधान पर केंद्रित होना ही बुद्धिमानी मानी जाती है । और आज के युवा इसी धार से आगे बढ़ रही है । नेपालको पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका होने से बचाने के लिए आम जन, जिसने राजा और राजतंत्र दोनों को अनुभव किया है; वो भी किंकर्तव्यविमूढ़ दिख रहे हैं । शिक्षा के साथ साथ चेतनवृद्धि स्वाभाविक ही है और जहां के लोग जिस स्तर तक चेतनशील होते हैं वहां जीवन और संस्कृति के संरक्षण और संपोषण के प्रति उत्कट भाव भी उतना ही अधिक और सशक्त होता है । सोशल मीडिया पर सक्रिय ९० प्रतिशत नेपालियों में अपनी अस्तित्व और संस्कृति को बचाए रखने तथा शत्रु के षडयंत्र को निष्प्रभावी करने के साथ ही कड़ा प्रतिकार करने के प्रबल मानसिकता नेपाली हिंदुओं, मुस्लिमों, बौद्ध तथा किरातों में देखा जा सकता है । फिरभी डालर के लोभ में राष्ट्रीय अस्तित्व के साथ खिलवाड़ करना किसी भी हालत में शुभ संकेत नहीं हो सकता ।
पड़ोसी देश भारत के बंगाल और कश्मीर प्रदेश में आतंकियों के साए में पलनेवालों का जीवन कितना भयानक होता है यह सोशल मीडिया के कारण अब किसी से छुपा नहीं है । लोग यह भी समझने लगे हैं कि युद्ध हो या द्वंद्व, हिंसा हो या दंगा; इसमें सरकार और सरकारी नौकरों को कोई क्षति नहीं होती । इस भीषण हिंसा के चपेट में आम आदमी ही पड़ते हैं, वो भी योजनाबद्ध तरीके से पारे जाते हैं । और सरकार अदृश्य रूप में उसके पक्ष में खड़े दिखती है । इन षडयंत्रमुलक योजनाबद्ध तरीकों से निष्पन्न हिंसक वारदातों पर बने फिल्मों ने सिनेमाघरों में चीख पुकार मचा सकती है तो वास्तविक घटना के संबंध में क्या कहा जा सकता है । आज नेपाल भी उसी भयावह योजना के शिकार होते दिख रहा है । युवाओं में दिख रहे प्रतिकार के भाव और आक्रोश इन्हीं घटनाओं का समष्टिगत प्रभाव है । आज के युवा अपने पूर्वजों के धरोहर को सुरक्षित देखना चाहते हैं । विदेशियों के कुदृष्टि से बचाते हुए खुदको बुलंद करना चाहते हैं । स्वाधीन नेपाल को गुलामी मानसिकता के नेतृत्व से मुक्त कराना चाहते हैं । लेकिन दुर्भाग्य है कि उन्हें अपनों से ही लड़ना पड़ रहा है । अपने ही नेतृत्व से संघर्ष करना पड़ रहा है । यह नेपालियों के लिए हर हाल में दुखद है ।
नेपाल के किसी भी नेता या बुद्धिजीवी में नेपाली राजनीति, कूटनीति तथा समस्याओं को विदेशी षड्यंत्र के जाल से सुरक्षित बाहर निकालने की क्षमता नहीं है । उन्हें लोगों को मरते छोड़कर किसी भी समय विदेश पलायन करने में अधिक समय नहीं लगेगा । क्योंकि उन्होंने देश को लूटकर विदेशों में अपने परिवार के लिए सुरक्षित माहौल बना लिया है । पाकिस्तान की तरह वही लोग वर्षों बाद फिर से राष्ट्रवाद का दुहाई देकर मुक्तिदाता के रूप में हमारे अगले पीढ़ी को लड़ने के लिए प्रेरित कर खुद सत्तासीन हो जाएंगे । नेपाल के संदर्भ में आज भी इसका उदाहरण अमेरिका से आयातित नेताओं को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है । जिस प्रकार आज सभी पार्टियों के नेता मिलजुलकर जनता को बेवकूफ बनाते हुए देश को लुट रही है वह आगे भी अनेक रूपों में हमें यूज एंड थ्रो करेंगे । सावधान हमें रहना है । क्योंकि भविष्य में हम आम नेपाली लोग अपनी ही भूमि पर दलितों के रूप में गुलामी का जीवन जीने को मजबूर होंगे, आर्थिक गरीबी, शारीरिक कष्ट का दर्द झेलेंगे और अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष करेंगे । जो लोग कमीशन के लालच में आकर अपनी मातृभूमि को विदेशियों के हाथों बेचने की कोशिश करते हैं और जो लोग इसके समर्थन में अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं, वे सभी दलाल हैं । वे देशद्रोही हैं । आइये समय रहते इन लोगों की पहचान करें । अन्यथा देर हो जायेगी ।

