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अकेले पड़ते बालेनः स्वतंत्र नेतृत्व की मुश्किल यात्रा !: लिलानाथ गौतम

 

 

लीलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक जून 025 । देश की राजधानी में स्थित है काठमांडू महानगरपालिका । जनसंख्या, सामाजिक–सांस्कृतिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से भी काठमांडू महानगरपालिका देश की अन्य पालिकाओं की तुलना में विशाल और विशिष्ट है । लगभग तीन वर्ष पहले सम्पन्न स्थानीय चुनाव में यहाँ स्वतंत्र उम्मीदवार बालेन शाह मेयर के रूप में निर्वाचित हुए । केवल काठमांडू में ही नहीं, देश के अन्य पालिकाओं में भी स्वतंत्र उम्मीदवार पालिका प्रमुख के रूप में निर्वाचित हुए थे । लेकिन काठमांडू से निर्वाचित शाह और धरान उप–महानगरपालिका से निर्वाचित हर्क साम्पाङ आज भी देश–विदेश में बसे नेपाली नागरिकों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं ।

राजनीतिक सिंडिकेट से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने स्थानीय जनभावनाओं और इच्छाओं के अनुसार काम नहीं किया, ऐसी आम शिकायतों के बीच में निर्वाचित स्वतंत्र उम्मीदवारों से जनता को बड़ी उम्मीदें थीं । चुनाव के कुछ समय तक वह आशा और उत्साह बनी भी रही । लेकिन अब धीरे–धीरे स्वतंत्र जनप्रतिनिधियों की कार्यक्षमता पर भी कई प्रश्न उठने लगे हैं । चाहे वह काठमांडू हो या धरान– सभी जगह अब यह आवाजÞ उठने लगी है कि कार्य करने के लिए स्वतंत्र जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों से निर्वाचित प्रतिनिधि चाहिए । लेकिन ऐसा कहने वालों में अधिकांश किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े कार्यकर्ता ही होते हैं ।
इसी पृष्ठभूमि में काठमांडू महानगरपालिका के भीतर बीते कुछ महीनों से जो स्थिति बनी है, उसने आम नागरिकों को निराश किया है । स्वतंत्र उम्मीदवार होने के कारण राजनीतिक दलों ने उन्हें काम करने नहीं दिया, ऐसा कहने वाले भी काफी संख्या में हैं ।

ऐसा क्यों हुआ ?
पिछले पाँच महीनों से काठमांडू महानगरपालिका की कार्यपालिका की बैठक नहीं हो सकी है । बैठक बुलाने के लिए पालिका सदस्यों को लिखित रूप से मांग करनी पड़ी । इस तरह लिखित मांग करने वाले सदस्यों की संख्या ४१ है । कुल ४३ सदस्यीय कार्यपालिका में से ४१ सदस्यों द्वारा लिखित अनुरोध के बावजूद मेयर बालेन्द्र शाह (बालेन) बैठक नहीं बुला सके । कÞानून के अनुसार, कार्यपालिका की बैठक हर महीने कम से कम एक बार होनी चाहिए । लेकिन काठमांडू महानगर की बैठक पाँच महीनों से नहीं हुई है । परिणामस्वरूप कार्यपालिका द्वारा लिए जाने वाले कई निर्णय अधर में लटके हैं, और विकास–निर्माण कार्य भी प्रभावित हुआ है ।
बालेन शाह का समर्थन करने वाले स्वतंत्र नागरिक इसके लिए सत्तारूढ़ नेकपा एमाले और नेपाली कांग्रेस के जनप्रतिनिधियों तथा संघीय सरकार से नियुक्त कर्मचारी (मुख्य प्रशासनिक अधिकारी) सरोज गुरागाई को मुख्य रूप से दोषी मानते हैं । लेकिन आरोपित कांग्रेस और एमाले के प्रतिनिधि इस पूरे मामले को लेकर यह कहने लगे हैं कि स्वतंत्र प्रतिनिधि के रूप में चुनाव जीतना ही समस्या है । इससे देश के अन्य पालिकाओं में निर्वाचित स्वतंत्र जनप्रतिनिधियों के प्रति दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आने लगा है ।

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कानून के अनुसार स्थानीय सरकार को असार १५ (जुलाई के पहले सप्ताह) में अगले आर्थिक वर्ष का अनुमानित आय–व्यय विवरण (बजट) प्रस्तुत करना होता है । अब उस समय में एक महीना भी शेष नहीं है, लेकिन काठमांडू महानगरपालिका में कार्यपालिका की बैठक बुलाने के कोई संकेत नहीं हैं । काठमांडू जैसे बड़े महानगर में बजट निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने में भी देरी हो चुकी है । विडंबना यह है कि महानगर के प्रमुख (मेयर) स्वयं कार्यपालिका की बैठक बुलाने के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं ।

इसका मूल कारण हैं प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी सरोज गुरागाई । बालेन की दृष्टि में गुरागाई एक भ्रष्ट प्रशासक हैं । मेयर बालेन का आरोप है कि ‘काठमांडू टावर’ निर्माण के लिए गुरागाई ने गैरकानूनी तरीके से स्वीकृति दी । इसी आरोप के आधार पर उन्होंने गुरागाई को काम करने से रोका । लेकिन संघीय सरकार ने उनका कोई विकल्प नहीं भेजा, बल्कि गुरागाई को ही काम पर लौटने के लिए कहा । बालेन अब यह कहकर बैठक नहीं बुला रहे हैं कि जब तक गुरागाई पद पर हैं, वह बैठक नहीं करेंगे । इस समय बालेन और गुरागाई के बीच बातचीत और संपर्क भी बंद है । इस पूरे घटनाक्रम ने बालेन को अकेला कर दिया है । ४३ सदस्यीय कार्यपालिका में अब उनके पक्ष में केवल १ सदस्य बचा है ।

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काठमांडू महानगरपालिका के प्रमुख पद पर एक युवा इंजीनियर के रूप में स्वतंत्र उम्मीदवार के जीतने को कुछ लोगों ने नेपाल की राजनीति में सकारात्मक और नयां संकेत माना था । शुरू में निर्वाचित वॉर्ड अध्यक्षों ने दलगत आग्रह को अलग रखकर मेयर बालेन को सहयोग किया था । क्योंकि पालिका प्रमुख का पद कार्यकारी होता है, वहाँ दलगत स्वार्थ अपेक्षाकृत कम चलता है । इसीलिए सदस्यों ने कुछ हद तक साथ भी दिया । लेकिन अब सभी दलों के प्रतिनिधि एकजुट हो गए हैं, बालेन अकेले रह गए हैं । हाल ही में महानगरपालिका के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी से जुड़े विवाद में उपमेयर सुनिता डंगोल, अन्य सदस्य और कर्मचारी बालेन के साथ नहीं खड़े हुए । यहाँ तक कि उन्होंने उन्हीं विवादित प्रमुख प्रशासक गुरागाई को जÞबरदस्ती कार्यालय में प्रवेश भी दिलाया, जो बालेन की मर्जी के खिलाफ था ।

विकास खर्च के मामले में काठमांडू महानगरपालिका सबसे कमजोर दिख रही है । इस पर गंभीर समीक्षा कर आगामी वर्ष के लिए रणनीति बनाना अभी का काम है । लेकिन यहाँ तो नियमित बैठक के लिए भी सदस्यों को मांग करनी पड़ रही है । अब यही विषय बालेन के खिलाफ आरोप के रूप में उठने लगा है । संघीय सरकार के असहयोग को बहाना बनाकर महानगरपालिका को ही बंधक नहीं बनाना चाहिए –ऐसा मत अब बलवान होता जा रहा है । बालेन पर यह भी आरोप लग रहा है कि उन्होंने पद की गरिमा के अनुसार समझदारी और संयम नहीं दिखाया ।

महानगरपालिका सहित स्थानीय निकायों में अध्यक्षात्मक और संसदीय दोनों प्रणाली की मिश्रित लोकतांत्रिक विधियाँ और प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं । लोकतांत्रिक पद्धति को आत्मसात किए बिना ऐसे संस्थानों का नेतृत्व करना कठिन होता है । आलोचकों के अनुसार, यदि बालेन ने लोकतांत्रिक विधियों और प्रक्रियाओं को आत्मसात किया होता, तो यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती । काम करने की ऊर्जा रखने वाले लोगों की नीयत खराब नहीं हो सकती । लेकिन नीयत साफ होते हुए भी उन्हें विधि और प्रक्रिया अपनाने में अरुचि हो सकती है । तत्काल परिणाम चाहने वालों को विधि और प्रक्रिया झंझट लग सकती है । लेकिन लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में नीयत अच्छी हो तब भी विधि और प्रक्रिया की अनदेखी नहीं की जा सकती । चुनाव में उम्मीदवार बनने का अर्थ ही विधि और प्रक्रिया की सर्वोच्चता को स्वीकार करना होता है । यही बात आलोचक आज बालेन को समझा रहे हैं ।
यदि बालेन को प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी गुरागाई को हटाने के लिए सरकार पर दबाव बनाना ही था, तो उन्हें महानगरपालिका के सदस्यों का समर्थन जुटाना चाहिए था । लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया । महानगरपालिका किसी एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं चलती, यह बात बालेन भूल गए । लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुसार बैठक संचालित कर काठमांडू महानगरपालिका का नेतृत्व करना बालेन के लिए उपयुक्त और स्वाभाविक होता । सदस्यों की मांग का सम्मान करते हुए अब बालेन को शीघ्र बैठक बुलानी चाहिए । बजट प्राथमिकता निर्धारण जैसे काम आगे बढ़ाने पर ही काठमांडू के मतदाताओं का भी सम्मान होगा । बालेन की सफलता से प्रेरित होकर राजनीति में आने वाले युवाओं को हतोत्साहित करने वाली यह एकल यात्रा उनके अपने भविष्य के लिए भी उचित नहीं दिखती ।

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बालेन का पाँच वर्षीय कार्यकाल अब तीन वर्ष पार कर चुका है । अब जो भी काम करना है, उसके लिए केवल दो वर्ष शेष हैं । इस अवधि में यदि वह इसी तरह विवादों में घिरे रहते हैं, तो आम जनता की उम्मीदों और विश्वास पर फिर से पानी फिर जाएगा । इस जनभावनाओं को सम्मान करना उनके लिए भी फायदे मंद हो है ।

 

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