किस ओर जाएगा नेपाल ? : लोकतंत्र या निरंकुशता ?
काठमांडू 15 सितम्बर, हिमालिनी रिपोर्ट। नेपाल में 23–24 भदौ को घटित घटनाएँ सामान्य असंतोष या आकस्मिक हिंसा नहीं, बल्कि किसी गहरे इशारे पर हुई योजनाबद्ध गतिविधियाँ प्रतीत होती हैं। इसका कोई मास्टरमाइंड था, और विभिन्न चरणों में अलग-अलग समूहों और व्यक्तियों को प्यादे के रूप में प्रयोग किया गया। हालांकि पूरे सबूत और प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इरादे साफ़ हैं—यह नेपाल को “नियंत्रित अस्थिरता” से हटाकर अब सीधे “पूर्ण अस्थिरता” (full-fledged destabilization) की दिशा में धकेलने की कोशिश है।
विशेष रूप से, इसका निशाना काठमांडू और पहाड़ के कुछ शहरी क्षेत्र तथा पूरा मधेश रहा।
नेपाली सेना की भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम में नेपाल की सबसे शक्तिशाली सुरक्षा संस्था—नेपाली सेना का वर्तमान नेतृत्व प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संलग्न दिखाई देता है। सेना का उद्देश्य राजनीतिक और नागरिक नेतृत्व को पूरी तरह अप्रासंगिक (politically defunct) बनाना दिखता है।
- घटनाओं के बीच संविधान को क्षत-विक्षत किया गया।
- राजनीतिक संस्थाओं को पंगु बनाने की कोशिश हुई।
- सेना ने “one step backward, two step forward” वाली रणनीति अपनाई है।
फिलहाल, राष्ट्रपति की दृढ़ता, जागरूक नागरिकों की हिम्मत और कुछ अन्य छिपी हुई शक्तियों के दबाव से स्थिति आंशिक रूप से नियंत्रण में है। लेकिन आने वाले समय में सेना नागरिक सरकार को ढाल बनाकर, नागरिक समूहों के बीच और अधिक तनाव फैलाकर, किसी प्रकार की निरंकुश सत्ता स्थापित करने की कोशिश कर सकती है यह अभी देखना बांकी है ।
राजनीतिक धाराएँ—दो विकल्प
नेपाल की राजनीति एक बार फिर दोराहे पर खड़ी है—
- सेना के खेल में फँसकर कुछ “उपलब्धि” बचाने की कोशिश करना।
- अहिंसक लेकिन दृढ़ प्रतिरोध के साथ और उन्नत लोकतंत्र की ओर बढ़ना।
इतिहास गवाह है कि पहला रास्ता चुनने वाले हमेशा असफल हुए—1960 (१७ साल बाद) कांग्रेस के नरमपंथी, माओवादी और मधेशवादी इसके उदाहरण हैं।
दूसरा रास्ता जोखिमपूर्ण है, लेकिन हारने पर भी समाजिक-राजनीतिक चेतना और नागरिक पूँजी में वृद्धि होती है। इस दृष्टि से यह लोकतंत्र की लंबी लड़ाई का हिस्सा है, और अन्ततः जीत का ही रूप है।
मेरी व्यक्तिगत पसंद भी दूसरा रास्ता ही है।
प्रेरणा
भारतीय कवि शिव मंगल सिंह सुमन की पंक्तियाँ इस संघर्ष में मार्गदर्शन करती हैं—
“क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही, वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं…”
जाँच और जवाबदेही
प्रधानमंत्री ने आशंका जताई है कि आगजनी और तोड़फोड़ के पीछे गहरी साज़िश है।
- वीडियो फुटेज और कुछ स्पष्ट सूत्र (lead) मौजूद हैं।
- सेना की संरचना और काठमांडू महानगरपालिका का कार्यालय पूरी तरह सुरक्षित रहा।
- निर्मल निवास और नारायणहिटी संग्रहालय को विशेष सुरक्षा मिली।
- लेकिन सिंहदरबार, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री निवास, संसद, सर्वोच्च अदालत, सभी मुख्यमंत्री कार्यालय, प्रदेश सभा भवन, और लगभग ३०० स्थानीय तह कार्यालय पूरी तरह ध्वस्त किए गए।
- 1000–1500 राजनीतिक नेताओं और कई नागरिकों के आवास भी नष्ट हुए।
स्पष्ट है कि सेना और सुरक्षा निकाय के शीर्ष अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
साथ ही, खुलेआम हिंसक धमकी देने वाले सूदन गुरुङ जैसे लोगों पर भी जाँच और कार्यवाही ज़रूरी है।
निष्कर्ष
नेपाल आज एक गहरे संकट में है। राष्ट्रपति, नागरिक समाज और नई पीढ़ी (Gen Z आंदोलन सहित) की निडर भूमिका ही लोकतांत्रिक मूल्य और उपलब्धियों को बचा सकती है।
अब प्रश्न यही है—क्या नेपाल एक बार फिर निरंकुश सत्ता की ओर लौटेगा या इस चुनौती से जूझते हुए और परिपक्व लोकतंत्र की ओर आगे बढ़ेगा?
राकेश मिश्रा के दो स्टेटस के आधार पर तैयार किया गया यह रिपोर्ट
https://www.facebook.com/share/p/14JQ3eZH6zt/
भारतीय कवि शिवमंगल सिंह सुमन की कुछ पंक्तियां
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।


