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रामजानकी विवाहोत्सव और खोती हुई चमक : कैलाश दास

 


कैलाश दास, जनकपुरधाम, २३ नवंबर । रामजानकी विवाहोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है; यह इतिहास, संस्कृति और पहचान का पुनर्जागरण भी है । हर साल जनकपुरधाम में मनाया जाने वाला यह पर्व हजारों साल पहले हुई दिव्य शादी को जीवंत करता है।
रामजानकी विवाहोत्सव में बरात का आगमन, वर–वधू की स्मृति, मंडप का ऐतिहासिक पुनर्निर्माण ये सभी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि जनकपुरधाम को विश्व के प्रमुख धार्मिक गंतव्यों में अग्रस्थान पर खड़ा करने की क्षमता रखते हैं । राम और सीता का विवाह कोई साधारण कथा नहीं है, यह दक्षिण एशिया की साझा संस्कृति और भावनाओं का केंद्र है। यही कारण है कि इसका सांस्कृतिक प्रभाव नेपाल, भारत, श्रीलंका, थाईलैंड, कंबोडिया और इंडोनेशिया तक देखा जाता है। इतने गहरे सांस्कृतिक बंधन वाले जनकपुरधाम को पर्यटन दृष्टि से आज भी क्यों उपेक्षित रखा गया है? यही प्रश्न राज्य और समाज दोनों के सामने है।
पहले विवाहोत्सव एक महीने तक मनाया जाता था। उस समय शहर उत्सव में डूबा हुआ लगता था । रीति–रिवाज, सांस्कृतिक प्रदर्शन, बरात का स्वागत यात्रा सबने जनकपुरधाम को आध्यात्मिक उजाले से नहा दिया था । लेकिन समय के साथ यह महोत्सव १५ दिनों में सिमट गया और आज यह केवल एक सप्ताह की औपचारिकताओं तक सीमित हो गया है। भीड़ तो आती है, लेकिन वही उत्साह, उमंग और उजाला पहले जैसा नहीं है । महोत्सव तो है, लेकिन उसका प्रबंधन, संरचना, प्रचार–प्रसार और पर्यटन–मित्र वातावरण अभी भी अधूरा है ।

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जनकपुरधाम विवाहोत्सव के माध्यम से विश्वभर के हिन्दू धर्मावलंबियों को आकर्षित करने की शक्ति रखता है । भारत के अयोध्या में राज्य ने व्यापक निवेश करके राम मंदिर को विश्व धार्मिक गंतव्य बना दिया है । वहां प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी आते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था फलफूल रही है । लेकिन जनकपुरधाम में राज्य का ध्यान अभी भी प्रतीक्षा में नजर आता है। धार्मिक मार्ग अव्यवस्थित हैं, आवास व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर है, सूचना का अभाव है, और पर्यटन पूर्वाधार न्यूनतम हैं । परिणामस्वरूप, विवाहोत्सव जैसी विश्वस्तरीय सांस्कृतिक संपदा भी सीमित दायरे में ही कैद रह जाती है।
ज्ञानभूमि, तपोभूमि और मोक्षभूमि के रूप में मान्य जनकपुरधाम आध्यात्मिक गहराई से भरपूर है । यहां ऋषिमुनियों ने तप करके सिद्धि प्राप्त की, ऐसी कथाएं प्रचलित हैं । अष्टावक्र ने शंकराचार्य जैसे विद्वानों को ज्ञानशास्त्र में पराजित किया, इसकी कथा आज भी जीवित परंपरा की तरह है । “यहां अन्यत्र किया गया पाप कट जाता है, लेकिन यहां किया गया पाप अन्यत्र कहीं नहीं कटता” यह कथन इस भूमि की नैतिक गंभीरता का प्रतीक है । ऐसी आध्यात्मिक संपदाएं धार्मिक यात्रियों के लिए स्वतः आकर्षण हैं और इनमें अपार पर्यटन संभावना निहित है ।
लेकिन संभावना और वास्तविकता के बीच की दूरी अभी भी लंबी है । राज्य की उदासीनता और समाज की चेतना की कमी के कारण जनकपुरधाम की धार्मिक शक्तियों को पर्यटन के वास्तविक आधार में परिवर्तित नहीं किया जा सका है । यहां के धार्मिक मार्ग, जँती चलने वाले पारंपरिक रास्ते, तपस्थल, साधनास्थल और विदेह राज्य के ऐतिहासिक अवशेष ये सभी चिन्हित, संरक्षित और विश्वस्तर पर प्रस्तुत किए जाने योग्य खजाने हैं । लेकिन आज भी जनकपुरधाम का विकास धार्मिक गहराई तक ही सीमित है, आधुनिक पर्यटन की आवश्यकताएं नजरअंदाज हैं ।
पर्यटन केवल दर्शन की यात्रा नहीं है; यह अनुभव, प्रबंधन और अर्थव्यवस्था का संयोजन है । अयोध्या का उदाहरण स्पष्ट है, वहां राज्य ने अरबों का निवेश कर धार्मिक पर्यटन को आर्थिक रूपांतरण में बदल दिया है। जनकपुरधाम भी यदि राज्य की प्राथमिकता में आ जाए, दीर्घकालिक योजना बनाई जाए, संरचना और प्रचार का एकीकृत मॉडल अपनाया जाए, तो यह दक्षिण एशिया का प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र बन सकता है ।
विवाहोत्सव की सांस्कृतिक विविधता विश्वभर में प्रदर्शनीय है । जँती आगमन, मंडप पूजन, पारंपरिक गीत–भजन, मिथिला परंपरा की स्वागत विधि यदि इन्हें व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जाए, तो हजारों विदेशी पर्यटक आकर्षित किए जा सकते हैं । ऐसे सांस्कृतिक चित्रण ‘रामायण सर्किट’ की केंद्रीय शक्ति बन सकते हैं। लेकिन वर्तमान में यह संभावना प्रबंधन की कमी के कारण कमजोर हो गई है ।
इसमें जनकपुरवासियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है । यदि वे अपने शहर को धार्मिक और पर्यटन राजधानी के रूप में समझें और स्वच्छता, सौंदर्य, व्यवहार और समन्वय में सक्रियता दिखाएं, तो इसका सीधा प्रभाव पर्यटन पर पड़ेगा । लेकिन शहर की गतिविधियां जानकी मंदिर तक सीमित रहना, अन्य क्षेत्रों का अंधकार, व्यापारिक चहल–पहल का न्यून होना ये सब विवाहोत्सव के प्रभाव को सीमित कर देते हैं ।
यहां के विकास की योजनाएं केवल कागज तक सीमित नहीं रहनी चाहिए । ऐतिहासिक मार्गों का पुनर्जिवन, विवाहोत्सव का आधुनिक प्रबंधन, डिजिटल प्रचार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, धार्मिक–सांस्कृतिक पर्यटन पूर्वाधार—इन सभी कार्यक्रमों को व्यवहार में लागू करना आवश्यक है। विवाहोत्सव को विश्व के प्रमुख सांस्कृतिक उत्सवों में खड़ा करने के लिए दीर्घकालिक नीति अपरिहार्य है ।
रामजानकी विवाहोत्सव नेपाल की पहचान में से एक अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है। यह नेपाल को विश्व के सामने आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। इसकी शक्ति केवल धार्मिक आस्था में नहीं है; यह सांस्कृतिक कूटनीति, पर्यटन अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय संबंधों के विस्तार में भी निहित है। जनकपुरधाम अपने इतिहास के साथ विश्व में चमकने के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए राज्य, समाज और स्थानीय समुदाय की साझा प्रतिबद्धता आवश्यक है ।
अंततः प्रश्न केवल एक हैः इतिहास द्वारा दिया गया यह अनुपम अवसर हम कितनी कद्र कर सकते हैं? विवाहोत्सव की दिव्य चमक को पर्यटन की चमक में बदलने का काम अब और विलंब नहीं कर सकता। यदि आज ही दूरदर्शी निर्णय और निवेश किया जाए, तो रामजानकी विवाहोत्सव केवल जनकपुरधाम का उत्सव नहीं रहेगा; यह विश्वभर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए नेपाल की प्रमुख सांस्कृतिक पहचान बन सकता है ।
अवसर हमारे पास है। क्या हम इसे पहचानेंगे या फिर इसे परंपरागत उपेक्षा के अंधकार में खो देंगे ?

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कैलास दास
जनकपुरधाम

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