के पी ओली की गिरफ़्तारी और नेपाल का राजनीतिक भविष्य : कैलाश महतो
कैलाश महतो, 30 मार्च 026। उखान, तुक्का और मुहाबरों के प्रख्यात ज्ञाता तथा नेपाल के पूर्व प्रधानमन्त्री कमरेड के पी ओली हिन्दी फ़िल्म नायक के हीरो अनिल कपूर के एक्शन स्टाइल में नव गठित बालेन सरकार के प्रशासनिक पंजों के शिकार हो चुके हैं। उनके साथ ही उनके गृहमंत्री रहे नेपाली कॉंग्रेस के नेता रमेश लेखक भी गिरफ़्तारी के हालात में हैं। दो बड़े पार्टियों के दो बड़े नेताओं की गिरफ़्तारी ने देश में उहापोह, राजनीतिक हलचल और तिब्र दलदलाहट की स्थिति पैदा कर दी है।
ओली जी की गिरफ़्तारी पश्चात् सरकारपक्षी पत्रकारों और कुछ विश्लेषकों का मानना है कि १४ सालों के जेल जीवन से मस्त राजनीति में आने बाले ओली जी का अन्तिम अवस्था भी अब जेल में ही ख़त्म होना है तो वहीं दूसरी ओर बहुतेरे स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि देश अब गंभीर राजनीतिक द्वन्द में जा चुका है और उसका खामियाजा बालेन्द्र साह, उनके प्रधानमन्त्रित्व और उनके सरकार को भुगतना तय है। तीसरी ओर आजसे ही नेकपा एमाले ने सांगठनिक निर्णय के साथ राष्ट्र व्यापी सडक विद्रोह की घोषणा कर दी है। संभावना अब यह है कि धीरे धीरे नेपाली कॉंग्रेस लगायत के अन्य दल भी सडक आन्दोलन का संयुक्त हिस्सा बन सकते हैं।
जहाँतक बालेन की दो तिहाई की शक्ति ताक़त की बात है, यह फगत एक वहम है कि बालेन, रबि या उनके पार्टी ने अपने हैसियत से तकरीबन दो तिहाई का ताक़त पाया है। वहाँ से अदृश्य विदेशी शक्ति को हटा दी जाय तो आज भी बालेन अपने वास्तविक धरातल पर दिख जायेंगे। इस सत्यता को अस्वीकार करके झोंक, पूर्वाग्रह और उन्माद में गत भाद्र २३-२४ के सारे ध्वंसात्मक घटनाओं की ज़िम्मेदारी ओली और लेखक पर डालकर उन्हें कानूनी कटघरे में खड़ा करना राजनीतिक और कानूनी अपराध और बचकाना हरकत है।
हाँ, ओली, लेखक, देउवा, आरजू, प्रचण्ड लगायत सारे राजनीतिक, आर्थिक, निज़ामति अधिकारी, विकाशीय, स्थानीय और संबैधानिक नेताओं के आर्थिक, राजनीतिक, चारित्रिक और नैतिक भ्रष्टाचारों के फेहरिश्तों को जाँच पड़ताल कर अनेक उपद्रव और भ्रष्टाचार के मुद्दों में दबोचा जाय तो वहाँ से उचित सजाओं के अनेक रास्ते खोले जा सकते हैं। मगर एक तरफी रुप में भाद्र २३-२४ के दंगे, तोड़फोड़, आगजनी, हत्या और विध्वंस के पोटरी केवल ओली, लेखक और खापुंग पर लादना किसी भी मायने में मुनासिब नहीं हो सकता।
वस्तुत: ओली किसी सरकार के प्रमुख थे। सरकार का विरोध करना लोकतान्त्रिक पद्धति है। समान्य घटनाओं को भी लोकतंत्र की आवाज़ ही माना जा सकता है। मगर जब किसी समूह द्वारा देश के राष्ट्रीय संपत्ति, धरोहर और इतिहासों पर क्षति हो तो राज्य और सरकार की राजनीतिक, राष्ट्रीय और सरकारी सुरक्षा की जिम्मेदारी बनती है कि वह उसका रक्षा करे। और रक्षा के लिए राज्य के पास अन्तिम ताकत उसकी पुलिस प्रशासन, सेना और सबंन्धित निकायें होती हैं। उसका सामारिक हथियार होते हैं। ऐसा नहीं कि देश और दुनिया में हथियारों का प्रयोग ओली और उसके सरकार ने ही किया है। राष्ट्रीय संपत्ति और ऐतिहासिक धरोहरों का रक्षा करना सरकार और नेतृत्व का राष्ट्रीय धर्म और जिम्मेदारी होती है, जो कल्ह बालेन समेत को समझना होगा, करना होगा ।
वैसे कार्की आयोग के प्रतिवेदन पर ओली ने असहमति जता दी है। मान लें कि ओली झूठ बोलते हैं – क्योंकि वो हैं भी वैसे ही। मगर इस बात को कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि भाद्र २३ और २४ का सारा अपराधिक प्लान (plan) और प्लॉटिंग (plotting), पेट्रोल बम बनाने, ग्रेनेड उपाय करने, हथियारों का व्यवस्था करने, स्कूल और कॉलेज के बच्चों को धोखे से आन्दोलन का मोहरा बनाने का सारा तैयारी ZenZ इत्तर के अधिकांश लोगों का पूर्व निर्धारित योजनाएँ बड़ी शातिरता से रची जा चुकी थी – जिसका शिकार अबोध स्कूली बच्चों को बनाया गया। भले ही कार्की आयोग ने व्यक्तिगत खूनस और बदले के भाव से आयोग प्रतिवेदन बनाये हों, मगर उसके प्रतिवेदन से अपराधिक सारे खुलासे भी होते हैं जिसमें सीधे सादे स्कूल और +2 के बच्चे सामेल नहीं हो सकते। उसकी उन्होंने कल्पना तक नहीं कर सके होंगे।
हालांकि कार्की प्रतिवेदन प्रतिशोध से भरे पड़े होने के कई प्रमाण होने के विश्लेषकों का दावा है। सबसे सपाट और खुल्ला आशंका यह है कि चुनाव से पहले बन चुके प्रतिवेदन को सुशिला कार्की ने जनता के सामने लाने से क्यों रोकी? चुनाव पश्चात् भी अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री सुशिला कार्की ने उसे सार्वजनिक न करना भी गहरा साजिस है।
प्रतिवेदन विश्लेषकों को माने तो चुनाव पूर्व अगर कार्की प्रतिवेदन सार्वजनिक हुआ होता तो रास्वपा के ढेर सारे आजके सांसदों क़ी उम्मीदवारी क्यान्सिल हो जाती और बालेन नेतृत्व क़ी सरकार बनने से पहले अगर सार्वजनिक क़ी जाती तो सरकार में मन्त्री बने प्रमुख लोग या तो सरकार में सामेल नहीं हो पाते, या वे छानबीन के दायरे में चले जाते।
चिन्ता की बात अब यह है कि भले ही किसी अदृश्य शक्ति के बल पर बालेन को प्रॉक्सी हीरो बनाया गया, मनोवैज्ञानिक ऑलगोरिदम चलाकर किसी को सुपर नायक बनाया गया, सेना को लगाकर छद्म चुनाव करबाया गया और अंधेरे कक्ष से दो तिहाई बाला नेता बनाया गया, हमनें और जनता ने यह मान लिया कि कम से कम किसी पार्टी को बेईमानी से ही सही, एक शख्स को भारी मत से शक्तिशाली सरकार तो मिला, जिससे देश और जनता को राहत, विकास, चयन और सुरक्षा मिलेंगे। मगर हिंदी सिनेमा फ़िल्म नायक का नक्कल में देश में नया द्वन्द, लड़ाई और राजनीतिक अराजकता फैलाकर शक्तिमान कहलाने के बुखार में देश और जनता को पुन: उन्हीं अनसुलझे राहों पर तो नहीं ला खड़ा किया जायेगा?
बालेन सरकार को यह जान लेना चाहिए कि जो प्रतिशोधात्मक राजनीति उसने शुरु की है, यह एक ऐसा मजबूत नजीर बनेगा कि कल्ह इसी और ऐसे ही मकरजाल के वे शिकार बनेंगे और उस समय उनके इर्द गिर्द आजके कोई जय जयकार करने बाले नहीं होंगे।
स्टट बाला राजनेता की राजनीति हमने देखा है। अहंकार के जातीय राजनीति करने बालों को मधेश ने भोगा है। और इस बात को याद रखना बेहद जरुरी है कि बालेन के साथ में अधिकांश विजेता लोग ऑर्गनिक और ओरिजिनल नहीं है। सारे के सारे निष्पट स्वार्थ समूह से जुड़े लालची, पाखंडी, लोभी, अवसरवादी और पार्टीछोड़ या पार्टी-खदेड लोग हैं। उनकी कोई न तो नीति है, न नियत। बालेन का सबसे कमजोर पक्ष यही है।
इसीलिए जोश में नहीं, होश में आना, स्टंट और अहंकारी शान नहीं, वास्तविक धरातल पर उतरकर देश और जनता का नेता बनना उचित होगा। अन्यथा विदेशी ताक़त तो साथ न जाने कब छोड़ दें, जनता भी छोड़ देती हैं।


