मंदिर की घंटी (लघुकथा) : विनोदकुमार विमल
विनोदकुमार विमल, गांव के दक्षिण में राजाजी – डिहवार का एक सदियों पुराना मंदिर है । पारंपरिक सामुदायिक पूजा के दिन उच्च जाति के ग्रामीण पूजा की तैयारी कर रहे थे । अछूत जाति के बिल्टुवा द्वारा मंदिर की सफाई की जा रही थी । बिल्टुवा वर्षों से मंदिर के प्रांगण की देखभाल, फूल चुनने और मूर्तियों को सजाने का काम करते आ रहे थे । हालांकि, जब पुजारी आए, तो बिल्टुवा को पूजा की सामग्री को छूने की अनुमति नहीं दी गई ।
उसी दिन, गांव के शिक्षाविद विमल, जो देश के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं, अपने दोस्तों के साथ मंदिर पहुंचे । उन्होंने देखा कि पुजारी मंदिर परिसर में हर जगह थूक रहे थे, गुटखा और पान चबा रहे थे । हालांकि, मंदिर की सफाई करने वाले बिल्टुवा को पूजा के दौरान यह कहकर दूर रहने को कहा गया कि वे ‘अछूत’ हैं ।
प्रोफेसर को यह बात पसंद नहीं आई । उन्होंने सीधे पुजारी से पूछा, ” पुजारी जी ! बिल्टुवा भाई उन्हीं हाथों से पूजा क्यों नहीं कर सकते जिनसे उन्होंने मंदिर की सफाई की ? भगवान को गंदी जगह में रहना पसंद है या साफ जगह में ?”
पुजारी स्तब्ध रह गया । ग्रामीण चुप हो गए ।
प्रोफेसर ने फिर कहा, ” बिल्टुवा भाई का काम साफ है, और उनका हृदय भी साफ है । छुआछूत हमारे दिलों की गंदगी है, जिसने ईश्वर को भी विभाजित कर दिया है ।”
उस दिन प्रोफेसर ने बिल्टुवा से मंदिर की घंटी बजवाई और उनसे प्रसाद भी लिया । ग्रामीणों को समझ आ गया कि ईश्वर किसी व्यक्ति की जाति में नहीं, बल्कि उसके कर्मों में होता है । राजाजी – डिहवार मंदिर की घंटी पहले से कहीं अधिक स्पष्ट रूप से बज रही थी । ( यह लघुकथा एक सच्ची घटना पर आधारित है । )


