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वरिष्ठता बनाम कार्यक्षमता : क्या हमारी नागरिक चेतना चयनात्मक है ?

 

(यहाँ धीरेंद्र प्रेमर्षि के फेसबुक स्टेटस का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है, जिसे हिंदी पाठकों और श्रोताओं के लिए तैयार किया गया है)

काठमांडू, 8 अप्रैल। प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर छिड़ी बहस को देखते हुए अचानक डॉ. संगीता कौशल मिश्र की याद आ गई।

आजकल संवैधानिक परिषद ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डॉ. मनोजकुमार शर्मा को प्रधान न्यायाधीश के लिए सिफारिश किया है। कहा जाता है कि यह नेपाल के न्यायिक इतिहास की पहली घटना है, जब चौथे नंबर के न्यायाधीश को आगे बढ़ाया गया है। सिफारिश में शामिल छह लोगों में कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल, कुमार रेग्मी, हरि फुँयाल, डॉ. नहकुल सुवेदी और तिलप्रसाद श्रेष्ठ को पीछे छोड़ते हुए उनका नाम आगे बढ़ाया गया।

इसी को लेकर इन दिनों ‘वरिष्ठता का उल्लंघन हुआ’, ‘असंवैधानिक हुआ’ जैसे स्वर तेज़ हो गए हैं। एक जीवित समाज में ऐसे प्रश्न उठना, बहस होना स्वाभाविक है।

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व्यक्तिगत रूप से कहूँ तो लोकतांत्रिक आंदोलन में सपना प्रधान मल्ल के योगदान को मैंने नजदीक से देखा है, इसलिए उनके प्रति मेरा उच्च सम्मान सदा बना रहेगा। लेकिन सरकार ने इस बार ‘कार्यक्षमता के आधार पर’ कहकर डॉ. शर्मा को आगे बढ़ाते हुए कम से कम एक ठोस तर्क दिया है – सर्वोत्तम कार्यक्षमता और 6 वर्ष का स्थिर कार्यकाल। जो एक प्रकार से उपयुक्त भी है।

मुझे इस बारे में ज़्यादा कुछ नहीं कहना है। लेकिन इस समय विचार जागृत और ज्ञानचक्षु खुले हुए महानुभावों के बारे में ज़रूर कुछ कहने का मन है। इसी ‘वरिष्ठता और कार्यक्षमता’ की बात करते हुए मुझे स्वास्थ्य सचिव की नियुक्ति वाला वह प्रसंग बार-बार याद आ रहा है।

उस समय सूची में कुल 3 नाम थे। डॉ. संगीता मिश्र वरिष्ठता, कार्यक्षमता, अनुभव – हर दृष्टि से निर्विवाद नंबर 1 थीं। उस पर उनके पास महिला और मधेशी का परिचय भी था। लेकिन विडंबना यह हुई कि जिस योग्यता को राज्य को सम्मान देना चाहिए था, उसे ही अघोषित रूप से ‘गज़बार’ बनाकर उन्हें हटा दिया गया।

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मैं सोच रहा हूँ – उस वक्त यह नागरिक समाज कहाँ था? मधेशी समुदाय के कुछ लोगों ने थोड़ी-बहुत आवाज़ उठाई, लेकिन देश ने चासो नहीं दिया, विश्लेषकों ने दिव्य चक्षु नहीं खोले, मुँह पर टेप लगाकर बैठे रहे।

आज प्रधान न्यायाधीश में वरिष्ठता मिची गई कहकर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले उस समय मौन थे। उस समय की बेईमानी को बेईमानी न कहने वाले आज के कदम को ही बेईमानी कहें, क्या यह उचित है? खुद पाले हुए भूतों का साया एक न एक दिन खुद को ही लपेट लेता है – यह हमें नहीं भूलना चाहिए।

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मेरा प्रश्न यही है – क्या हमारी नागरिक चेतना चयनात्मक है? एक नियुक्ति में संविधान और नैतिकता याद आती है, दूसरी में सब भूल जाते हैं? एक में महिला और समावेशिता की बात करते हैं, दूसरी में महिला और मधेशी होने के कारण सबसे योग्य पात्र को हटाते हुए मूक दर्शक बने रहते हैं?

यदि वरिष्ठता सिद्धांत है तो वह सदा के लिए लागू होना चाहिए। यदि कार्यक्षमता मापदंड है तो वह सबके लिए समान होना चाहिए। नहीं तो, हम बहस नहीं कर रहे हैं, हम तो केवल अपनी सुविधा के अनुसार पात्र के लिए चुप्पी तोड़ रहे हैं।

· मूल स्रोत: धीरेंद्र प्रेमर्षि (फेसबुक स्टेटस)

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