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बजट अधिवेशन के पहले दिन विपक्ष का सरकार पर तीखा हमला

 

“अध्यादेश, सुकुमवासी और संसद: नेपाल की राजनीति में बढ़ता टकराव”

 

काठमांडू, 11 अप्रैल। नेपाल की संसद के बजट अधिवेशन के पहले ही दिन सरकार और विपक्ष के बीच तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला। विपक्षी दलों ने सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेशों और सुकुमवासी बस्तियों पर की गई कार्रवाई को लेकर संसद में जोरदार विरोध दर्ज कराया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार संसद को दरकिनार कर अध्यादेशों के जरिए शासन चलाना चाहती है और विकास के नाम पर गरीब तथा भूमिहीन नागरिकों पर दमन कर रही है।

संसद में ‘आकस्मिक समय’ के दौरान कांग्रेस, एमाले, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी, श्रम संस्कृति पार्टी और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (राप्रपा) के सांसदों ने सरकार पर लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने का आरोप लगाया।

प्रमुख प्रतिपक्षी दल के मुख्य सचेतक निश्कल राई ने कहा कि दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार संसद से डर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि संवैधानिक परिषद संबंधी अध्यादेश संविधान की मूल भावना और संविधानवाद के खिलाफ है।
राई ने कहा कि परिषद में छह सदस्य होने के बावजूद केवल तीन लोगों द्वारा निर्णय को वैध मानने की व्यवस्था प्रधानमंत्री को “अत्यधिक शक्ति” देने की कोशिश है। उनके अनुसार संविधान में संवैधानिक परिषद की परिकल्पना किसी एक व्यक्ति को शक्तिशाली बनाने के लिए नहीं की गई थी।

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उन्होंने सुकुमवासी बस्तियों पर चलाए गए डोजर अभियान को भी अमानवीय बताते हुए कहा कि सरकार ने केवल झोपड़ियां नहीं तोड़ीं, बल्कि गरीब नागरिकों का राज्य पर भरोसा भी तोड़ दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि विकास के नाम पर आखिर गरीबों को ही क्यों कुचला जा रहा है।

उधर एमाले सचिव और सांसद पद्मा अर्याल ने सरकार पर लोकतांत्रिक नैतिकता छोड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जो दल पहले अध्यादेश को लोकतंत्र पर हमला बताते थे, वही आज सत्ता में पहुंचकर उसी रास्ते पर चल रहे हैं।
अर्याल ने कटाक्ष करते हुए पूछा कि क्या “नया सोच” का मतलब संसद को किनारे कर कार्यपालिका की मनमानी थोपना है?

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प्रधानन्यायाधीश नियुक्ति के मुद्दे पर भी उन्होंने सरकार को घेरा। उनका आरोप था कि वरिष्ठता की परंपरा तोड़कर न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चोट की गई है और अब यह संदेश दिया जा रहा है कि न्यायपालिका का नेतृत्व विधि नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री की इच्छा तय करेगी।

उन्होंने छात्र संगठनों और ट्रेड यूनियनों को अध्यादेश के जरिए सीमित करने की कोशिश पर भी सवाल उठाया और इसे “नियंत्रित तानाशाही की दिशा” बताया।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख सचेतक युवराज दुलाल ने सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार सुकुमवासी समस्या को मानवीय संकट में बदल रही है और सुरक्षा बलों का भय दिखाकर लोगों को आत्महत्या तक के लिए मजबूर किया जा रहा है।

श्रम संस्कृति पार्टी के अध्यक्ष हर्कराज राई ने कहा कि हजारों सुकुमवासियों को बेघर बनाकर सरकार ने अपनी संवेदनहीनता साबित कर दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार खुद ही विधि और व्यवस्था को तोड़ रही है तथा संसद की सर्वोच्चता को कमजोर कर रही है।
उन्होंने भारत द्वारा लिपुलेक क्षेत्र में सड़क संचालन जारी रखने के बावजूद सरकार की चुप्पी पर भी सवाल उठाए।

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राप्रपा की प्रमुख सचेतक खुश्बु ओली ने सुकुमवासी परिवारों की मौत पर सरकार की चुप्पी को अमानवीय बताया। उन्होंने कहा कि गरीब और खोला किनारे रहने वाले नागरिकों की जान भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी अन्य वर्ग की।

विपक्ष का मुख्य आरोप यह रहा कि सरकार संसद को निष्क्रिय कर अध्यादेशों के सहारे शासन चलाना चाहती है। वहीं सुकुमवासी मुद्दे ने सरकार की संवेदनशीलता और विकास नीति पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

संसद के पहले ही दिन जिस तरह सत्ता और विपक्ष आमने-सामने आए हैं, उससे साफ संकेत मिल रहा है कि आने वाले दिनों में नेपाल की राजनीति और अधिक गर्माने वाली है।

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