“आकाशवाणी के 90 वर्ष और डॉ सविता वर्मा गज़ल की साहित्यिक साधना
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
“यह आकाशवाणी है” या “हम आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र से बोल रहे हैं”। ।
यह महज एक उद्घोषणा या सिर्फ आवाज ही नहीं है, बल्कि हमारे भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास की वह धड़कन है, जिसने अनेक पीढ़ियों को समृद्ध किया है। इसी आकाशवाणी पर पिछले 22 वर्षो से एक आवाज़ गूंजती है,डॉ सविता वर्मा गज़ल की।उनके लिए
“खुला आकाश है ये मन,करना है सफर धरती से अम्बर तक का।
आओ उड़ चलें उम्मीदों के पंख लिए,अब ना झूकना न ही रुकना ।।
आज जब आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) अपने गौरवमयी और ऐतिहासिक सफर के नब्बे वर्ष पूरे कर रहा है, तो इस महासागर में डॉ गज़ल के जीवन के भी दो अनमोल दशक एक आत्मीय लहर बनकर लहरा रहे हैं।
एक साहित्यकार के रूप में, आकाशवाणी के साथ गज़ल का यह रिश्ता केवल एक जुड़ाव नहीं, बल्कि मेरी शब्द-साधना का जीवंत गवाह है। पिछले दो दशकों से अधिक समय से आकाशवाणी नजीबाबाद तो वो आकाशवाणी केंद्र है जिसके साथ उनकी बचपन की यादें जुड़ी है और जो उनके बचपन का साथी या मैं सच कहूं तो उनका पहला प्यार भी है।
आकाशवाणी नजीबाबाद के साथ ही आकाशवाणी दिल्ली के कार्यक्रम “बाल मंडल” कार्यक्रम में उन्होंने नन्हे मुन्ने बच्चों के साथ अपनी बाल कविताएं साझा की हैं ,आकाशवाणी रोहतक केंद्र पर भी उन्हें काव्य पाठ करने का सौभाग्य मिला है ।
नजीबाबाद केंद्र का वह विशिष्ट साहित्यिक परिवेश इन तीनों केंद्रों ने उनकी लेखनी को एक व्यापक आकाश दिया है।
आकाशवाणी केंद्र के स्टूडियो में लगे माइक के सामने बैठकर उन्होंने साहित्य के विभिन्न रंगों को जिया है। कवयित्री के रूप में अपनी भावनाओं को छंदों और कविताओं में पिरोया है और एक कहानीकार के रूप में इंसानी रिश्तों और समाज के ताने-बाने को शब्दों में ढाला है।
आकाशवाणी ने उनकी हर विधा को सराहा है। गंभीर विषयों पर साहित्यिक वार्ता के माध्यम से भी श्रोताओं से संवाद करना और दूसरी ओर, ‘बाल साहित्य’ के माध्यम से बच्चों के निश्छल संसार का हिस्सा बनकर उन्हें कहानियाँ और कविताएं सुनाना, साहित्यिक हो या महिला जगत कार्यक्रम ये सभी उनके जीवन के सबसे संतोषजनक अनुभव रहे हैं।
इस लंबी साहित्यिक यात्रा में सविता के लिए वे क्षण अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण रहे, जब आकाशवाणी नजीबाबाद ने उनकी खुद की यात्रा को श्रोताओं के सामने रखा। आकाशवाणी नजीबाबाद के प्रेरक कार्यक्रम ‘उड़ान: हौसलों की’ और एफएम रैनबो के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘परवाज़ है काम तेरा’ में प्रसारित हुए उनके साक्षात्कारों ने उन्हें देश के अनगिनत युवाओं और साहित्य-प्रेमियों से सीधे जोड़ा। माइक के उस पार से मिले स्नेह ने उनके भीतर के रचनाकार को एक नई उड़ान और एक नई ‘परवाज़’ दी है
बाईस सालों में उन्होंने समय चक्र को बहुत तेजी से बदलते देखा है। स्पूल और टेप रिकॉर्डर के दौर से लेकर आज के डिजिटल और पॉडकास्ट युग तक, रेडियो की तकनीक बहुत बदली है परंतु, जो नहीं बदला वह है आकाशवाणी का साहित्य के प्रति अटूट सम्मान और अनेक श्रोताओं का निश्छल प्रेम। रेडियो एक ऐसा अद्भुत माध्यम है जहाँ चेहरा ना दिखने के पश्चात भी श्रोताओं का प्रेम हमेशा बना रहता है।
सच कहा जाए तो आकाशवाणी शब्दों और आवाज का एक ऐसा आत्मीय संसार जहाँ श्रोता और रचनाकार का एक दूसरे से अटूट संबंध बन जाते हैं।
आकाशवाणी नजीबाबाद,दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की इस साहित्यिक त्रिवेणी के माध्यम से समाज के हर वर्ग तक अपनी बात पहुँचाना उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और पूंजी है। 90 वर्षों का यह सफर भारतीय चेतना का सफर है। इस ऐतिहासिक पड़ाव पर, इस बेमिसाल और गौरवशाली मंच का हिस्सा होने पर उन्हें स्वयं पर गर्व है। आकाशवाणी की यह गूँज युगों-युगों तक यूँ ही बनी रहे ,बिना रुके बिना थके ।(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार है)

