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11 हाई-प्रोफाइल नियुक्तियों में समावेशिता (Inclusivity) की कमी, योग्यता का मुखौटा और ‘पुरुषवादी क्लब

 
प्रतीकात्मक तस्वीर।

हिमालिनी डेस्क, काठमांडू ३ जुलाई । नेपाल के संविधान की प्रस्तावना में ही **”समानुपातिक समावेशी और सहभागितामूलक सिद्धांत के आधार पर समतामूलक समाज का निर्माण करने“** का संकल्प लिया गया है। लेकिन हाल ही में प्रधानमंत्री और संवैधानिक परिषद द्वारा किए गए उपकुलपति, प्रमुख निर्वाचन आयुक्त, निर्वाचन आयुक्त और नीति प्रतिष्ठान के कार्यकारी निर्देशक सहित 11 महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों की तस्वीर देखें, तो संविधान की यह मूल भावना पूरी तरह उपेक्षित नजर आती है।

कथित ‘मेरिटोक्रेसी’ (योग्यता प्रणाली) और खुली प्रतिस्पर्धा के नारों के पीछे छिपे इस घोर असमावेशी चरित्र पर गंभीर विमर्श बेहद जरूरी है।

1. आंकड़ों के आईने में असमावेशी चरित्र: संख्या बनाम विविधता

हालिया नियुक्तियों के आंकड़े साफ करते हैं कि नेपाल के राज्य तंत्र के शीर्ष स्तर पर आज भी एक खास वर्ग और लिंग का वर्चस्व किस कदर हावी है:

शून्य महिला भागीदारी: नेपाल की कुल जनसंख्या में आधे से अधिक का हिस्सा रखने वाली महिलाओं का प्रतिनिधित्व इन 11 उच्च पदों पर **’शून्य‘** होना बेहद निराशाजनक है। संविधान के मौलिक अधिकारों (धारा 38 की उपधारा 4) के तहत महिलाओं को राज्य के सभी निकायों में समानुपातिक समावेशी सिद्धांत के आधार पर शामिल होने का हक दिया गया है, जिसकी यहाँ खुलेआम अनदेखी की गई है।
जातीय और क्षेत्रीय असंतुलन: 11 में से 9 पदों पर (80% से अधिक) केवल एक ही लिंग और खास समुदाय (ब्राह्मण-क्षेत्री पुरुष) के लोगों को चुना जाना विविधता से भरे नेपाली समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता। जनकपुर से एक मधेशी और पुलिस के एक रिटायर्ड जनजाति को केवल ‘सांकेतिक’ रूप से शामिल करके समावेशिता का नाटक करने का प्रयास किया गया है, जो कि केवल टोकनवाद (Tokenism) से बढ़कर कुछ नहीं है।

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2. ‘मेरिट’ (योग्यता) का नारा: समावेशिता को दबाने का हथियार?

वर्तमान में सरकार और उसके समर्थकों द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि “चूंकि ये नियुक्तियां खुली प्रतिस्पर्धा और योग्यता (Merit) के आधार पर हुई हैं, इसलिए इस पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए।” लेकिन यह तर्क पूरी तरह दोषपूर्ण है:

ऐतिहासिक विशेषाधिकार की निरंतरता: राज्य ने सदियों से केवल एक खास वर्ग को ही शिक्षा, सत्ता और संसाधनों तक पहुंच का अवसर दिया। आज अचानक यह कहना कि “हम खुली प्रतिस्पर्धा करा रहे हैं”, दौड़ की शुरुआती रेखा (Starting line) पर ही भेदभाव करके सबको एक साथ दौड़ाने जैसा है।
सक्षम महिलाएं और हाशिए का समाज कहाँ गया?: क्या पूरे नेपाल में इन 11 उच्च पदों के लिए एक भी योग्य महिला, दलित या अल्पसंख्यक समुदाय का विशेषज्ञ नहीं था ? निश्चित रूप से थे। लेकिन ‘मेरिट’ की परिभाषा को सत्ता द्वारा इस तरह से तय किया जाता है, जहाँ केवल राजनीतिक दलों और प्रधानमंत्री के ‘पॉकेट के लोग’ या उनके ही करीबी दायरे (Echo Chamber) के पात्र फिट बैठ सकें।

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3. ‘MRR’ (Men’s Room Reloaded) और “ओल्ड बॉयज क्लब” की संस्कृति

सोशल मीडिया पर इस प्रवृत्ति को जो MRR (Men’s Room Reloaded) या राजनीतिक भाषा में ओल्ड बॉयज क्लब” (Old Boys’ Club) का नाम दिया जा रहा है, वह पूरी तरह सटीक है।

निर्णय प्रक्रिया में पुरुषों का एकाधिकार:  जब निर्णय लेने वाले मुख्य स्थानों (प्रधानमंत्री, संवैधानिक परिषद के सदस्य, मंत्री और उनका सचिवालय) पर केवल पुरुषों का ही दबदबा होगा, तो उनकी चेतना और नजरिया कभी भी महिलाओं या हाशिए के समाज के अभाव और दर्द को महसूस नहीं कर पाएगा।
नेटवर्किंग की राजनीति: बालुवाटार (प्रधानमंत्री निवास), सिंहदरबार या नेताओं के कमरों में देर रात और सुबह होने वाले अनौपचारिक संवाद, पैरवी (Lobbying) और ‘सीटों के बंटवारे’ में महिलाओं या वंचित वर्गों की पहुंच नहीं होती। नतीजतन, जब अंतिम निर्णय होता है, तो वे हमेशा हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं।

4. लोक लज्जा की कमी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार

किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए ‘लोक लज्जा’ (Public accountability) और जनता के प्रति जवाबदेही सबसे बड़ी कसौटी होती है। लेकिन प्रधानमंत्री के सचिवालय से लेकर उच्च पदों तक लगातार एक ही तरह के असमावेशी रवैये को दोहराना यह दिखाता है कि सरकार जन-आक्रोश और जनभावना के प्रति पूरी तरह उदासीन हो चुकी है।

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निर्वाचन आयोग जैसी निष्पक्ष संस्था, जहाँ महिला मतदाताओं और महिला उम्मीदवारों का बहुत बड़ा सरोकार होता है, उसके नेतृत्व को ही महिला-विहीन कर देना लोकतंत्र का उपहास है। इसी तरह, नीति प्रतिष्ठान जैसे देश के लिए नीतियां बनाने वाले ‘थिंक-टैंक’ में ही अगर सामाजिक विविधता नहीं होगी, तो उनके द्वारा बनाई गई नीतियां समाज के हर वर्ग के लिए न्यायसंगत कैसे हो सकती हैं?

निष्कर्ष: यह नियुक्तियां कितनी उचित, कितनी समावेशी ?

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री और संवैधानिक परिषद द्वारा की गई ये नियुक्तियां भले ही कानूनी प्रक्रिया पूरी करके की गई दिखाई देती हों, लेकिन नैतिक, संवैधानिक और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से पूरी तरह अनुचित और असमावेशी हैं।

योग्यता (Merit) और समावेशिता (Inclusivity) एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। सक्षम और योग्य महिलाएं, मधेशी, जनजाति और दलित इस देश में पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं। लेकिन उन्हें मुख्य प्रक्रिया से ही बाहर रखकर ‘मेरिट’ के नाम का दुरुपयोग करना केवल सत्तासीनों द्वारा अपने वर्चस्व को बनाए रखने का एक बहाना है। यह प्रवृत्ति अंततः देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति नागरिकों में असंतोष और निराशा को ही बढ़ावा देगी। (https://www.facebook.com/share/p/1AaypfkixX/) राकेश मिश्रा के स्टेटस पर आधारित।

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