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आंदोलन, अभिव्यक्ति और उत्तरदायित्व : क्या हम एक पीढ़ी को खो रहे हैं ?

 
सांकेतिक तस्वीर
— अजय कुमार झा
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह नागरिकों को अपनी विचार और मन की बातों को बेहिचक अभिव्यक्त करने का अधिकार देता है। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती और दुर्घटना भी यही है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अराजकता के बीच की रेखा कहीं धुंधली न हो जाए। जब विरोध का स्वर तर्क, संवेदना और मर्यादा को छोड़कर गाली, हिंसा और अश्लीलता का रूप लेने लगे, तब केवल सरकार को ही नहीं, बल्कि पूरा समाज को आत्ममंथन करने के लिए विवश हो जाना चाहिए। जब विश्वविद्यालय से सर्वोत्तम शिक्षा प्राप्त कर राष्ट्रीयता और सामाजिकता को कलंकित करने वाली अभिव्यक्ति देने लगे, आगजनी, तोड़फोड़, अराजकता और संसद भवन को नष्ट करने पर स्वयं को विश्व विजयी घोषित कर राजधानी के सड़को पर राष्ट्रीय विभूतियों के अपमान और राष्ट्रघातियों के सम्मान में तांडव नृत्य करने लगे, संवाद को लात मारकर विवाद को गले लगाने लगे तब लोकतांत्रिक सरकार को भी राष्ट्रीय स्वाभिमान और अस्तित्व को संरक्षित करने हेतु कुछ समय के लिए निरंकुश होना जरूरी हो जाता है। अन्यथा जनता को उक्त सरकार को सदा के लिए अयोग्य घोषित कर देना चाहिए।
हाल के वर्षों में विश्व में हुए अनेक आंदोलनों ने युवाओं की बड़ी भागीदारी देखी है। यदि किसी आंदोलन में कुछ प्रतिभागियों द्वारा अशोभनीय भाषा, हिंसक नारे, सार्वजनिक मर्यादा के विरुद्ध व्यवहार या कानून-विरुद्ध गतिविधियाँ की जाती हैं, तो उसकी आलोचना होना स्वाभाविक है। किंतु किसी भी आंदोलन या पूरी युवा पीढ़ी का मूल्यांकन कुछ वीडियो, कुछ व्यक्तियों या कुछ घटनाओं के आधार पर कर देना भी उचित नहीं होगा। किसी भी भीड़ में ऐसे तत्व हो सकते हैं जो आंदोलन की मूल भावना से भटक जाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम व्यक्तियों के आचरण की आलोचना करें, न कि पूरी पीढ़ी को एक ही रंग से रंग दें।
आज का सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल डिग्रियाँ बाँट रही है, या चरित्र भी गढ़ रही है? यदि एक युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी संवाद की भाषा भूल जाता है, असहमति को गाली में बदल देता है और लोकप्रियता के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हो जाता है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षा, समाज और सांस्कृतिक संस्थाओं की सामूहिक चुनौती है।
डिजिटल युग ने युवाओं के सामने अभूतपूर्व अवसर खोले हैं, परंतु इसके साथ एक नया संकट भी पैदा हुआ है—”वायरल होने की संस्कृति।” आज अनेक युवा यह मानने लगे हैं कि जितना अधिक उत्तेजक वक्तव्य होगा, जितनी अधिक सनसनी होगी, उतनी ही अधिक प्रसिद्धि मिलेगी। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म भी कई बार उत्तेजक सामग्री को अधिक दृश्यता देते हैं। परिणामस्वरूप संयम, शालीनता और विचारशीलता पीछे छूटती दिखाई देती है।
इसी संदर्भ में मनोरंजन उद्योग और डिजिटल मंचों की भूमिका पर भी गंभीर चर्चा आवश्यक है। यह सत्य है कि पिछले एक दशक में ओटीटी मंचों पर ऐसी अनेक सामग्री आई है, जिनमें हिंसा, अश्लीलता और पारिवारिक संबंधों के विकृत चित्रण को खुलकर दिखाया गया। दूसरी ओर, यह भी उतना ही सत्य है कि दर्शक निष्क्रिय पात्र नहीं होते। किसी समाज का चरित्र केवल फिल्मों या वेब सीरीज़ से नहीं बनता; परिवार, विद्यालय, मित्र-मंडली, सामाजिक वातावरण, आर्थिक परिस्थितियाँ और व्यक्तिगत विवेक भी समान रूप से प्रभाव डालते हैं। इसलिए संपूर्ण उत्तरदायित्व केवल किसी एक सरकार, किसी एक मंच या किसी एक संस्था पर डाल देना समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है।
सरकारों की भूमिका अवश्य महत्वपूर्ण है। किसी भी सरकार का दायित्व केवल आर्थिक विकास या चुनाव जीतना नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक वातावरण बनाना भी है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक मर्यादा दोनों सुरक्षित रहें। यदि सेंसरशिप, मीडिया नीति, शिक्षा नीति, डिजिटल साक्षरता और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रश्नों पर समय रहते संतुलित निर्णय न लिए जाएँ, तो उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ सकता है। इसी प्रकार विपक्ष और राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे युवाओं को लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए प्रेरित करें, न कि उन्हें केवल राजनीतिक संघर्ष का साधन बनाएँ।
इतिहास हमें सिखाता है कि आंदोलनों ने समाज को बदला है, परंतु इतिहास यह भी सिखाता है कि हर आंदोलन तभी सम्मानित हुआ जब वह अनुशासित, नैतिक और अहिंसक रहा। महात्मा गांधी का सत्याग्रह, जयप्रकाश नारायण का आंदोलन या विश्व के अनेक लोकतांत्रिक जनांदोलन—इन सबकी शक्ति केवल भीड़ नहीं, बल्कि नैतिक अनुशासन था। जिस क्षण आंदोलन हिंसा, घृणा और व्यक्तिगत अपमान में बदलता है, उसी क्षण उसकी नैतिक शक्ति कमजोर पड़ने लगती है।
आज आवश्यकता किसी पीढ़ी को कोसने की नहीं, बल्कि उसे दिशा देने की है। हर युवा अराजक नहीं है। लाखों विद्यार्थी ईमानदारी से अध्ययन कर रहे हैं, शोध कर रहे हैं, समाज सेवा कर रहे हैं और देश के निर्माण में योगदान दे रहे हैं। साथ ही, यह भी स्वीकार करना होगा कि कुछ युवाओं में अनुशासन, संवेदनशीलता और नागरिक उत्तरदायित्व का क्षरण दिखाई देता है। यह चिंता का विषय है और इसे छिपाया भी नहीं जाना चाहिए।
समाधान, परिवार में संवाद है, विद्यालयों में नैतिक एवं नागरिक शिक्षा है, विश्वविद्यालयों में स्वस्थ बहस की संस्कृति है, मीडिया में उत्तरदायित्व है, डिजिटल मंचों पर विवेकपूर्ण उपयोग है और राजनीति में नैतिक नेतृत्व है। यदि हम केवल दोषारोपण करेंगे, तो समस्या और गहरी होगी; यदि हम आत्ममंथन करेंगे, तो सुधार का मार्ग खुलेगा।
भारत की सभ्यता हजारों वर्षों से संवाद, सहिष्णुता और आत्मसंयम की परंपरा पर आधारित रही है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि असहमति का अधिकार है, लेकिन अपमान का अधिकार नहीं; विरोध का अधिकार है, लेकिन हिंसा का अधिकार नहीं; अभिव्यक्ति का अधिकार है, लेकिन उत्तरदायित्व से मुक्त होने का अधिकार नहीं।
आज का समय किसी एक सरकार, किसी एक दल या किसी एक पीढ़ी के विरुद्ध निर्णय सुनाने का नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी का समय है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ केवल तकनीकी रूप से नहीं, बल्कि नैतिक रूप से भी समृद्ध हों, तो हमें शिक्षा, संस्कृति, परिवार और सार्वजनिक जीवन में पुनः मर्यादा, विवेक और उत्तरदायित्व को प्रतिष्ठित करना होगा।
यही हमारी लोकतांत्रिक शक्ति है और यही हमारी सांस्कृतिक आत्मा भी।

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