त्रिवि की कार्यकारी परिषद की बैठक को लेकर अनिश्चितता कायम,रुक सकता है शिक्षकों एवं कर्मचारियों का वेतन
2 months ago
त्रिभुवन विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) की बैठक को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। नए कुलपति की नियुक्ति के 27 दिन बाद भी परिषद का गठन पूरा नहीं हो पाया है, जिसके कारण विश्वविद्यालय के कई महत्वपूर्ण नीतिगत और प्रशासनिक निर्णय अटक गए हैं।
परिषद की बैठक नहीं होने से विश्वविद्यालय में शिक्षकों और कर्मचारियों के पद निर्धारण, सेवा आयोग की सिफारिश पर नियुक्ति एवं पदोन्नति की प्रक्रिया ठप हो गई है। यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान पर भी असर पड़ सकता है। इसके अलावा डीन, कार्यकारी निदेशक, केंद्रीय विभागाध्यक्ष और विभिन्न परिसरों (कॉलेजों) के प्रमुखों की नियुक्तियां भी प्रभावित हो रही हैं।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय अधिनियम, 2049 (संशोधन 2077) के अनुसार कार्यकारी परिषद की अध्यक्षता उपकुलपति करते हैं। परिषद में शिक्षाध्यक्ष, अध्ययन संस्थानों के डीनों में से एक सदस्य, संकायों के डीनों में से एक सदस्य, विश्वविद्यालय के दो शिक्षक तथा रजिस्ट्रार सदस्य-सचिव होते हैं।
विश्वविद्यालय के एक अधिकारी के अनुसार, परिषद के पूर्ण गठन में देरी के कारण जेठ महीने में प्रस्तुत किया जाने वाला विश्वविद्यालय का वार्षिक बजट अब तक पेश नहीं हो सका है। विभागाध्यक्ष स्तर से ऊपर की सभी नियुक्तियां रुकी हुई हैं। बजट पारित नहीं हो पाया है, प्राध्यापकों और कर्मचारियों के इस्तीफों की स्वीकृति लंबित है तथा नई नियुक्तियों, पदस्थापन और विकास योजनाओं को भी मंजूरी नहीं मिल पा रही है।
वर्तमान में विश्वविद्यालय में 7,303 कर्मचारी और 8,122 शिक्षक (अस्थायी सहित) कार्यरत हैं। इस प्रकार कुल 15,425 कर्मचारी एवं शिक्षक विश्वविद्यालय से जुड़े हुए हैं।
प्रो. डॉ. भोला थापा को गत असार 19 को विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था। हालांकि नियुक्ति के बाद भी रेक्टर और रजिस्ट्रार जैसे प्रमुख पद अब तक खाली हैं, जिससे विश्वविद्यालय का प्रशासनिक कार्य गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।
परिषद की बैठक न होने से विश्वविद्यालय सभा के निर्णयों का क्रियान्वयन भी रुक गया है। वार्षिक कार्यक्रम, बजट, प्रगति प्रतिवेदन, लेखा-परीक्षण रिपोर्ट तथा अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तावों को स्वीकृति के लिए सभा में प्रस्तुत नहीं किया जा पा रहा है।
इसी प्रकार वार्षिक बजट पारित करने, शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति करने तथा विभिन्न निकायों में नेतृत्व चयन जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं भी ठप पड़ी हैं।
नेपाल के शिक्षा एवं खेलकूद मंत्री सस्मित पोखरेल ने राजनीतिक हस्तक्षेप न करने और विश्वविद्यालयों को स्वायत्त रूप से कार्य करने देने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। उन्होंने हाल ही में शिक्षा पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा था कि विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था है और कुलपति स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय लेने के लिए सक्षम हैं। इसके बावजूद रेक्टर, रजिस्ट्रार और अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति प्रक्रिया अभी तक आगे नहीं बढ़ सकी है।
फिलहाल शिक्षाध्यक्ष का कार्यभार विज्ञान संकाय के डीन प्रो. डॉ. शंकरप्रसाद खनाल तथा रजिस्ट्रार का दायित्व प्रबंधन संकाय के डीन प्रो. डॉ. महानंद चालिसे अंतरिम रूप से संभाल रहे हैं। स्थायी नियुक्तियां न होने के कारण विश्वविद्यालय के नीतिगत, वित्तीय, संबंधन (एफिलिएशन) तथा प्रशासनिक निर्णय लंबित हैं।
कार्यकारी परिषद ही विश्वविद्यालय की ओर से मिलने वाली आर्थिक सहायता स्वीकार करने, चल-अचल संपत्तियों के हस्तांतरण, विभिन्न समझौतों, करारों और ठेकों को मंजूरी देने, छात्र शुल्क निर्धारित करने तथा निजी महाविद्यालयों को संबंधन और अनुदान की सिफारिश करने जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाती है। परिषद के सक्रिय न होने से इन सभी कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
अब तक नेपाल के आठ विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति हो चुकी है, लेकिन त्रिभुवन विश्वविद्यालय में कुलपति प्रो. डॉ. भोला थापा द्वारा रेक्टर, रजिस्ट्रार और अन्य प्रमुख पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू नहीं किए जाने से विश्वविद्यालय में प्रशासनिक और शैक्षणिक अनिश्चितता बनी हुई है।
विश्वविद्यालय सभा के सदस्य तथा स्वतंत्र विद्यार्थी यूनियन के अध्यक्ष दीपकराज जोशी ने कहा कि नीति एवं कार्यक्रम तथा वार्षिक बजट समय पर प्रस्तुत न होने से विश्वविद्यालय के प्रशासनिक, शैक्षणिक और विकास संबंधी कार्यों को आगे बढ़ाने में गंभीर कठिनाइयां उत्पन्न हो रही हैं।

