धार्मिक शहादत के बल पर *हिन्दुराष्ट्र से हिन्दुराष्ट्र तक* एक वस्तुनिष्ट विश्लेषण : डा.विजय दत्त
डा.विजय दत्त, काठमांडू। 3 अगस्त।
*अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।*
*उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥*
*पृष्ठभूमि*-
*सर्वज्ञत्वमिज्ञातसर्वयोनीआत्मभु:।*
सनातन का शाब्दिक अर्थ है “जो सदा से है, जो सदैव रहेगा और जिसका न कोई आदि है न अंत”। व्यापक संदर्भ में, यह केवल एक धर्म या सम्प्रदाय न होकर जीवन जीने का *एक शाश्वत दर्शन* और सार्वभौमिक नियम है, जो सत्य, अहिंसा, करुणा, कर्तव्य और प्रकृति के साथ संतुलन में रहने का मार्ग दिखाता है। यह आत्मा की अमरता और ब्रह्मांड के प्राकृतिक नियमों (ऋत) पर आधारित है, जो मनुष्य को संकीर्णताओं से ऊपर उठाकर संपूर्ण विश्व को एक परिवार (“वसुधैव कुटुम्बकम्”) मानने की उदात्त भावना से जोड़ता है।
सनातन’अनादि’ (बिना किसी आरंभ के) और ‘अनंत’ माना गया है। इसकी शुरुआत ब्रह्मांड की उत्पत्ति और प्राकृतिक नियमों (ऋत) के प्रादुर्भाव के साथ ही मानी जाती है, जब मानव चेतना ने सत्य, धर्म और अस्तित्व के मूलभूत सिद्धांतों को समझना शुरू किया। पुर्वीय दर्शन के अनुसार, प्राचीन ऋषियों और मुनियों ने गहन ध्यान व साधना के माध्यम से जिन शाश्वत अनुभूतियों और अभौतिक सत्यों को पाया, वही वेदों के माध्यम से संकलित होकर सनातन परंपरा के रूप में प्रवाहित हुए; अतः यह किसी व्यक्ति द्वारा स्थापित विचार न होकर सृष्टि की चेतना और जीवन के प्राकृतिक संतुलन के साथ स्वयं विकसित हुआ एक जीवंत मार्ग है।
१. *पौराणिक एवं धार्मिक मान्यता* (सृष्टि के आरंभ से)
वैदिक एवं पौराणिक साहित्य (जैसे विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत और ब्रह्मांड पुराण) के अनुसार, जम्बुद्वीप पृथ्वी का वह केंद्रीय भूभाग है जिसमें ‘भारतवर्ष’ भी सम्मिलित है।
कालक्रम: पौराणिक मान्यता के अनुसार जम्बुद्वीप में सनातन परम्परा का अस्तित्व सृष्टि के निर्माण (सत्ययुग) के समय से ही माना जाता है। *स्वायम्भुव मनु* और उनके पुत्र *प्रियव्रत* के काल से ही जम्बुद्वीप में वैदिक जीवन-मूल्यों, यज्ञ परंपरा और शाश्वत सनातन धर्म का आचरण होता आ रहा है। संकल्प पाठ में प्रयुक्त मंत्र “जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे…” इसी शाश्वत निरंतरता को रेखांकित करता है।
२. *ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टिकोण* (ईसा पूर्व ५००० – २५०० वर्ष या उससे पूर्व)
ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टि से जम्बुद्वीप (मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य एशिया का क्षेत्र) में सनातन संस्कृति का क्रमिक विकास देखा गया:-
*सिंधु-सरस्वती सभ्यता* (३०००-१५०० ई.पू.): पुरातात्विक साक्ष्यों में योग मुद्रा में बैठी मूर्तियाँ, शिवलिंग, पशुपति नाथ, पीपल वृक्ष की पूजा और स्वास्तिक के चिन्ह मिलते हैं, जो सनातन परंपरा के आरंभिक स्वरूप की पुष्टि करते हैं।
*वैदिक काल* (१५००-५०० ई.पू. या उससे पूर्व): ऋग्वेद की रचना और वेदों के संकलन के साथ ही जम्बुद्वीप के बृहद क्षेत्र (सप्त सिंधु प्रदेश से लेकर संपूर्ण भारतवर्ष) में व्यवस्थित सनातन दर्शन, आश्रम व्यवस्था और धर्म-सूत्रों का प्रचार-प्रसार स्थापित हुआ।
इसप्रकार,धार्मिक दृष्टि से जम्बुद्वीप में सनातन अनादि काल (मन्वंतरों और युगों की शुरुआत) से है, जबकि ऐतिहासिक रूप से यह भारतीय उपमहाद्वीप में मानव सभ्यता और वैदिक ऋषियों की उत्पत्ति के साथ ही निरंतर प्रवाहित हो रहा है।
संसार के प्रमुख दस धर्म जिसमे सबके सब सनातन धर्म से ही आया है –
१. *सनातन धर्म (हिंदू धर्म)*
अनादि / प्रागैतिहासिक काल (सभ्यता के प्रारंभ से)
विश्व का सबसे प्राचीन जीवंत धर्म, जिसकी उत्पत्ति किसी एक संस्थापक या तिथि से न होकर सिंधु-सरस्वती सभ्यता और वैदिक परंपरा (ईसा पूर्व ३००० वर्ष या उससे पूर्व) के साथ क्रमिक रूप से हुई।
२. *यहूदी धर्म* (Judaism)
लगभग १५०० – १२०० ईसा पूर्व (BCE)
पैगंबर अब्राहम (हज़रत इब्राहिम) और मूसा (Moses) द्वारा स्थापित यह प्रथम एकेश्वरवादी (एक ईश्वर को मानने वाला) अब्राहमिक धर्म है।
३. *पारसी धर्म* (Zoroastrianism)
लगभग १५०० – १००० ईसा पूर्व (BCE)
प्राचीन फ़ारस (वर्तमान ईरान) में पैगंबर ज़राथुष्ट्र (Zoroaster) द्वारा स्थापित धर्म, जो अहुरा मज़्दा को सर्वोच्च ईश्वर मानता है।
४. *जैन धर्म*
६वीं शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग ५९९ BCE)
भगवान पार्श्वनाथ (२३वें तीर्थंकर) और भगवान महावीर (२४वें तीर्थंकर) द्वारा पुनर्गठित एवं प्रचारित धर्म, जो अहिंसा और अनेकांतवाद पर बल देता है।
५. *बौद्ध धर्म*
६वीं शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग ५६३ BCE)
नेपाल के लुम्बिनी में जन्मे सिद्धार्थ गौतम (भगवान बुद्ध) द्वारा स्थापित धर्म, जो चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग की शिक्षा देता है।
६. *कन्फ्यूशियसवाद*(Confucianism)
६वीं – ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व (BCE)
चीन में दार्शनिक कन्फ्यूशियस (Confucius) द्वारा स्थापित एक नैतिक और दार्शनिक प्रणाली, जो सामाजिक व्यवस्था और पारिवारिक मूल्यों पर केंद्रित है।
७. *ताओ धर्म* (Taoism)
६वीं – ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व (BCE)
चीन में लाओत्सू (Laozi) द्वारा स्थापित दर्शन एवं धर्म, जो ‘ताओ’ (प्रकृति के सहज नियम और प्रवाह) के साथ संतुलन बनाकर जीने का मार्ग दिखाता है।
८. *ईसाई धर्म* (Christianity)
प्रथम शताब्दी ईस्वी (१st Century CE – लगभग ३० CE)
यरूशलेम (बैथलेहम) में ईसा मसीह (Jesus Christ) की शिक्षाओं और बलिदान पर आधारित अब्राहमिक धर्म, जो वर्तमान में विश्व का सबसे बड़ा धर्म है।
९. *इस्लाम धर्म*
७ वीं शताब्दी ईस्वी (६१० CE)
मक्का (सऊदी अरब) में पैगंबर मुहम्मद को प्राप्त अंतिम दिव्य संदेश (क़ुरआन) के साथ स्थापित एकेश्वरवादी अब्राहमिक धर्म।
१०. *सिख धर्म*
१५वीं शताब्दी ईस्वी (१४६९ CE)
पंजाब में प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी द्वारा स्थापित धर्म, जो एक ओंकार (एक ईश्वर), नाम जपना, किरत करना और वंड छकना के सिद्धांतों पर आधारित है।
सनातन हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन होने का अर्थ यह कि बाद में बने सभी धर्म अनिवार्य रूप से हिंदू धर्म से ही परिवर्तित या धर्मांतरित होकर बने हैं। इतिहास और समाजशास्त्र के अनुसार, मानव सभ्यता के विकासक्रम में अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों, संस्कृतियों और भाषाई समूहों में ईश्वर और जीवन को समझने के अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण विकसित हुए; जैसे मध्य पूर्व (Middle East) में यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म वहां की स्थानीय परिस्थितियों और पैगंबर परंपराओं से उपजे, तथा चीन में कन्फ्यूशियस व ताओ दर्शन वहां की अपनी विचार-प्रणाली से जन्मे। हालांकि, भारतीय उपमहाद्वीप में जन्मे धर्मों—जैसे जैन, बौद्ध और सिख धर्म—का सीधा संबंध सनातन परंपरा से है और वे इसी सांस्कृतिक व दार्शनिक पृष्ठभूमि से विकसित या परिष्कृत हुए हैं। इसलिए, वैश्विक स्तर पर नए धर्मों का उदय केवल धर्मांतरण से नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में स्वतंत्र दार्शनिक क्रांतियों, नवीन सामाजिक आवश्यकताओं और भिन्न-भिन्न पैगंबरों या विचारकों की शिक्षाओं के परिणामस्वरूप हुआ है।
इस्लाम धर्म की उत्पत्ति ७वीं शताब्दी ईस्वी में अरब प्रायद्वीप के मक्का शहर में पैगंबर मुहम्मद द्वारा ईश्वर (अल्लाह) के संदेश के रूप में हुई, जो एकेश्वरवाद, सामाजिक समानता और न्याय की अवधारणा पर आधारित था। भारतीय उपमहाद्वीप में इसका विस्तार मुख्यतः तीन चरणों के माध्यम से हुआ: सबसे पहले ७वीं-८वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों और नाविकों के माध्यम से भारत के मालाबार (केरल) तटीय क्षेत्रों में शांतिपूर्ण व्यापारिक व सांस्कृतिक संपर्कों द्वारा; तत्पश्चात ८वीं से १२वीं शताब्दी के दौरान मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी और शिहाबुद्दीन गोरी जैसे मध्य एशियाई शासकों के सैन्य अभियानों व सल्तनत एवं मुग़ल काल की राजनीतिक सत्ता की स्थापना द्वारा; तथा सबसे प्रभावशाली रूप से सूफी संतों (जैसे ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती और निजामुद्दीन औलिया) के मानवीय दृष्टिकोण, खानकाहों, बंधुत्व के संदेश और स्थानीय संस्कृति के साथ सामंजस्य के कारण, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों, विशेषकर वंचित वर्गों ने इसे क्रमिक रूप से अपनाया।
नेपालका प्राचीन,मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास के अनुसार यह सदैव हिन्दु राष्ट्र ही रहा है ।जहा वेद,उपनिषद् ,पुराण मंत्र आदि का गन्थन-मन्थन हुआ था । इस राष्ट्र को नेपाल को सभ्यता प्रथम बिन्दु भी कहाँ जाता है । परन्तु ९३.१५% जनता का जनादेश को तिरष्कार कर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया गया । हिंदू राष्ट्र से धर्मनिरपेक्ष (Secular) राज्य बनाने का निर्णय मुख्य रूप से २००६ (वि.सं. २०६३) के जनआंदोलन-२ के बाद उपजी अन्तर्राष्ट्रिय राजनीतिक दबाबमूलक परिस्थितियों थी न कि केवल १२-बुंदे समझौते जैसे किसी एक विशिष्ट दस्तावेज़ का। यद्यपि माओवादी और सात दलीय गठबंधन (SPA) के बीच हुए १२-बुंदे समझौते में स्पष्ट रूप से “धर्मनिरपेक्षता” शब्द का उल्लेख नहीं था,उसमें निरंकुश राजतंत्र की समाप्ति, लोकतंत्र की पुनर्स्थापना और सर्वांगीण अग्रगामी परिवर्तन का खाका, लेकिन जनआंदोलन की सफलता के तुरंत बाद १८ मई २००६ को पुनर्स्थापित प्रतिनिधि सभा ने ऐतिहासिक “जेठ ४ की घोषणा” के माध्यम से नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया। जिसे बाद में २००७ के अंतरिम संविधान और अंततः २०१५ (वि.सं. २०७२) में बने नेपाल के नए संविधान में धारा २६ के तहत आधिकारिक रूप से संस्थागत किया गया लेकिन सनातन धर्म-संस्कृति के संरक्षण को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है ।
नेपाल में मुस्लिम समुदाय के अधिकारों, धार्मिक-सांस्कृतिक मामलों, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के लिए संवैधानिक, सामाजिक-धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर कई प्रमुख संगठन सक्रिय हैं:
१. धार्मिक आयोग - जन जन के अनुसार, मुस्लिम आयोग (Muslim Commission):रुढीबादी तवर से मुसलमानो को द्वन्द के लिए प्रेरित करता है । नकि शैक्षिक एवं आर्थिकसामाजिक उन्नयन के लिए ।
२. प्रमुख धार्मिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक संगठन
*इस्लामिक संघ नेपाल* (Islami Sangh Nepal): यह देश का एक बड़ा और पुराना सामाजिक-धार्मिक संगठन (स्थापना १९८५) है। यह मुख्यतः धार्मिक शिक्षा, सामाजिक सेवा, राहत कार्य और जन-जागरूकता के क्षेत्र में सक्रिय है।
*अल-हिरा एजुकेशनल सोसाइटी* (Al-Hira Educational Society): यह मुख्य रूप से शैक्षिक सुधारों, मदरसों के संचालन, अनाथालयों और इस्लामिक-आधुनिक शिक्षा के समन्वय के क्षेत्र में कार्य करने वाला संस्थागत नेटवर्क है।
*नेपाल जामे मस्जिद समिति*(काठमांडू): राजधानी स्थित ऐतिहासिक जामे मस्जिद और घंटाघर क्षेत्र से जुड़ी यह संस्था धार्मिक गतिविधियों और अंतर-धार्मिक संवाद का प्रमुख केंद्र है।
अहल-ए-सुन्नत वल-जमात एवं तबलीगी जमात: नेपाल के तराई क्षेत्रों और शहरी केंद्रों में धार्मिक शिक्षा, सामाजिक सुधार और धार्मिक आयोजनों (इज्तिमा) के प्रबंधन के लिए स्थानीय स्तर पर सक्रिय नेटवर्क हैं।
३. प्रमुख राजनीतिक भ्रातृ संगठन
नेपाल मुस्लिम संघ: नेपाली कांग्रेस पार्टी से संबद्ध मुस्लिम भ्रातृ संगठन, जो राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक अधिकारों के लिए कार्य करता है।
नेपाल मुस्लिम इत्तेहाद संगठन: नेकपा एमाले (CPN-UML) से जुड़ा संगठन, जो वामपंथी पृष्ठभूमि के साथ मुस्लिम अधिकारों की वकालत करता है।
ऑल नेपाल मुस्लिम संघ: नेकपा माओवादी केंद्र से संबद्ध भ्रातृ संगठन।
इसके अलावा ‘देवबंदी’ वरेलवी ( हिन्दु देवी-देवता को पुजना बन्द करो/करवाओ ) कानूनी रूप से “अवैध” वे निकाय या मदरसे हैं जो नेपाल के शिक्षा मंत्रालय या समाज कल्याण परिषद (SWC) में बिना पंजीकरण, पाठ्यक्रम स्वीकृति और वित्तीय पारदर्शिता के संचालित हो रहे हैं। सुरक्षा चिंताओं के मुख्य कारण तराई सीमावर्ती क्षेत्रों में बिना अनुमति विदेशी (खाड़ी देशों के) फंड से चलने वाले अनाम चैरिटेबल ट्रस्ट तथा भारत-नेपाल की खुली सीमा का अनुचित लाभ उठाने वाले अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी/आपराधिक छद्म (Sleeper) नेटवर्क हैं, जिन पर नेपाल और भारत की सुरक्षा एजेंसियां निरंतर निगरानी रखती हैं।
ये सब के सब दिखाबे एक कार्य अौर गुप्त मे द्वन्द फैलाना ही है जनमानस के अनुसार ।
नेपाल और भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्रों में “अवैध संस्थाओं” या बिना पंजीकरण के चल रहे निकायों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन की रिपोर्टों में मुख्यतः निम्न संस्थाऐं है –
१. *गैर-पंजीकृत/अवैध मदरसे* (Unregistered Madrasas)
नेपाल सरकार के नियमानुसार, देश में संचालित सभी धार्मिक शिक्षण संस्थानों मदरसो का जिला शिक्षा समन्वय इकाई (DECU) या स्थानीय निकाय में आधिकारिक दर्ता (पंजीकरण) होना अनिवार्य है। ४ हजार से ज्यादा तो मधेश के जिलो मे ही है ।
अवैधता का कारण: तराई के सीमावर्ती जिलों (जैसे बाँके, कपिलवस्तु, रुपंदेही, पर्सा, रौतहट, सिरहा, झापा आदि) में सैकड़ों मदरसे बिना किसी सरकारी स्वीकृति, पाठ्यक्रम निगरानी या लेखा-परीक्षण (Audit) के संचालित हो रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियों (जैसे नेपाल पुलिस, सशस्त्र प्रहरी बल और भारतीय सुरक्षा बल/SSB) की समीक्षा रिपोर्टों में ऐसे गैर-पंजीकृत मदरसों को प्रशासनिक रूप से “गैर-कानूनी/अवैध” श्रेणी में रखा गया है ।
२. *बिना अनुमति संचालित विदेशी व स्थानीय एनजीओ* (Unregistered NGOs/Trusts)
विदेशी फंडिंग से चलने वाले ट्रस्ट: खाड़ी देशों (जैसे सऊदी अरब, कतर, यूएई) या अन्य अंतरराष्ट्रीय चैरिटी संस्थाओं के फंड से चलने वाले कई स्थानीय ट्रस्ट जो नेपाल के समाज कल्याण परिषद (Social Welfare Council – SWC) में पंजीकृत नहीं हैं या अपनी वित्तीय जानकारी (Tax Audit & SWC clearance) गुप्त रखते हैं। अबैध रकम मनमानी तरिका से नेपाल मे लायी जाती है ।
*हवाला एवं अवैध फंडिंग नेटवर्क:* नेपाल में बिना वित्तीय पारदर्शिता के विदेशी धन प्राप्त करने वाले और सीमावर्ती क्षेत्रों में ढांचागत विकास (मस्जिद-मदरसा निर्माण) में संलग्न अनाम (Anonymous) स्थानीय समितियां सुरक्षा जांच के घेरे में रहना चाहिए मगर दुर्भाग्य कराई नहि है ।
३. *अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित कट्टरपंथी/चरमपंथी संगठन*
यद्यपि नेपाल के भीतर प्रत्यक्ष रूप से पंजीकृत कोई भी संगठन ऐसा काम नहीं करता, लेकिन सुरक्षा विश्लेषकों और अंतर्राष्ट्रीय जांच एजेंसियों के अनुसार कुछ प्रतिबंधित अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी समूहों के नेटवर्क या स्लीपर सेल्स नेपाल की खुली सीमा का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं:
*लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) से जुड़े छद्म नेटवर्क:* कहाँ जाता है कि ये समूह नेपाल में किसी वैध नाम से संस्था नहीं चलाते, बल्कि आपराधिक/हवाला नेटवर्क, जाली मुद्रा (FICN) और नेपाल-भारत खुली सीमा का लाभ उठाकर अवैध गतिविधियों के लिए नेपाली भूभाग का उपयोग करने के आरोपों का सामना करते हैं।
*इंडियन मुजाहिदीन (IM) के पूर्व नेटवर्क*: अतीत में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में छिपे कुछ संदिग्धों को ट्रैक किया था, जो नेपाल की स्थानीय आबादी या छद्म व्यापारिक संस्थाओं का सहारा लेकर अपनी पहचान छुपाते थे। ये अबैध संस्थाऐ सब के सब अबैध कार्य मे लगे ऐसा आमजन का कहना है । ये संस्थाऐं –
-नेपाल के शिक्षा मंत्रालय या समाज कल्याण परिषद (SWC) में दर्ता (Registered) नहीं हैं।
-जो विदेशी धन (Foreign Aid) का पारदर्शी लेखा-जोखा सरकार को जमा नहीं करते।
-जो राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती संवेदनशीलता के नियमों का उल्लंघन करते हैं।
*हिन्दुगढ जनकपुरधाम मे हिन्दुराज्य की संबैधानिक मांग* –
जनकपुरधाम सहित का पुर्वी मधेश के जिले में बोलबम काँवरिया श्रद्धालुओं के साथ घटी अत्यन्त दुखद घटना के बाद उपजे आक्रोश के बीच गृहमंत्री की उपस्थिति और बयानों से जुड़े दावे राजनीतिक एवं सामाजिक बहस – चर्चाओं में बने हुए हैं। नेपाल में ४ हिंदू तीर्थयात्रियों की दुखद मृत्यु और दर्जनौं कि घाहिल के वाद *हिंदू राष्ट्र* की बहाली की उठती मांगों को लेकर जनआक्रोश अवश्य देखा गया है, हालांकि गृहमंत्री द्वारा *तीन महीने में नेपाल को पुनः हिंदू राष्ट्र बनाने* की मौखिक रुप से मधेश प्रदेश एवं आधिकारियो के उपस्थिति मे किया गया है । हालांकी संवैधानिक प्रतिबद्धता की पुष्टि न तो पेपर नत तो सरकारी मीडिया या आधिकारिक रिकॉर्ड्स मे है ।
नेपाल मे संबैधानिक बदलाव के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्य प्रक्रिया होती है; जो सरकार के पास है । यदि सरकार कि ईच्छाशक्ति प्रबल हो तो तीन महिना क्यो तीन दिन मे भी सम्भब है । इसके अतिरिक्त चार हजार से ज्यादा मदरसे कि खारेजी कि भी जोडदार आवाज उठी है ।
*निष्कर्ष*
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, नेपाल में आगामी समय संवैधानिक मर्यादा, प्रशासनिक सतर्कता और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन बनाने का समय है । जनकपुरधाम सहित सम्पूर्ण मधेश की घटना के बाद भले ही सरकार ने हिंदू धार्मिक निकायों के साथ वार्ता कर तीन महीने की समयसीमा में मांगों पर सर्वदलीय संवाद का आश्वासन दिया है, जिसपर सम्पुर्ण नेपालीजन को तदारुकता के साथ बल को प्रबल करते रहना चाहिए । क्योकी, इस कच्चे सरकार *मुंह मे राम बगल मे तरवार* भी रख शक्ति है । देश पुनः हिन्दुराज्य बने जिससे देश का बहुआयामिक विकास *दिन दुना रात चौगुणा* हो सके ।
*धर्मो रक्षति रक्षित !* *कर्मोधर्मो रक्षति रक्षित:!!* *धर्मोकर्मो रक्षति रक्षित:!!!*

विश्लेषक


