महिला के प्रजनन अधिकार का नया अध्याय : महिलाओं के शरीर पर महिलाओं का अधिकार :श्वेता दीप्ति
काठमान्डू
नेपाल में महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी पहल सामने आई है। सरकार ने सुरक्षित मातृत्व तथा प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार अधिनियम, २०७५ में संशोधन का विधेयक प्रतिनिधि सभा में प्रस्तुत किया है, जिसका उद्देश्य विशेष परिस्थितियों में गर्भपात के अधिकार का विस्तार करना है। यह विधेयक केवल कानून में संशोधन भर नहीं है, बल्कि महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता, सुरक्षित मातृत्व, प्रजनन न्याय और मानवाधिकारों से जुड़े व्यापक विमर्श का हिस्सा भी है।
यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब नेपाल का संविधान प्रजनन स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार करता है और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएँ गर्भपात को अपराध की श्रेणी से बाहर करने तथा महिलाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने पर बल देती रही हैं।
नेपाल ने वर्ष २०५९ (2002) में गर्भपात को पहली बार सशर्त कानूनी मान्यता दी थी। इसके बाद नेपाल के संविधान, २०७२ ने महिलाओं के सुरक्षित मातृत्व और प्रजनन स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार घोषित किया। संविधान की धारा 38 स्पष्ट रूप से कहती है कि प्रत्येक महिला को सुरक्षित मातृत्व और प्रजनन स्वास्थ्य का अधिकार प्राप्त है।
इसी संवैधानिक व्यवस्था को लागू करने के लिए सुरक्षित मातृत्व तथा प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार अधिनियम, २०७५ बनाया गया। वर्तमान कानून के अनुसार निर्धारित परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति है, किंतु अधिकांश विशेष मामलों में गर्भावस्था की अधिकतम सीमा 28 सप्ताह निर्धारित है। इसके बाद गर्भपात कराने पर दंडात्मक प्रावधान लागू हो सकते हैं।
अब सरकार इस सीमा को विशेष परिस्थितियों में समाप्त करने का प्रस्ताव लेकर आई है।
संशोधन विधेयक के अनुसार चार विशेष परिस्थितियों में गर्भावस्था की अवधि चाहे जितनी भी हो, गर्भपात की अनुमति दी जा सकेगी। इन सभी मामलों में गर्भवती महिला की स्पष्ट सहमति अनिवार्य होगी।
1. महिला के जीवन या स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा
यदि अधिकृत चिकित्सक की राय में गर्भ जारी रखने से महिला के जीवन को खतरा हो, उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता हो अथवा गंभीर विकलांगता वाले शिशु के जन्म की आशंका हो, तो किसी भी अवधि में गर्भपात किया जा सकेगा।
2. बलात्कार या निकट संबंधी द्वारा यौन हिंसा से गर्भधारण
यदि गर्भ बलात्कार या हाड़नाता (निकट संबंधी द्वारा यौन हिंसा) के कारण ठहरा हो, तो महिला की सहमति से किसी भी समय गर्भपात कराया जा सकेगा।
3. भ्रूण में गंभीर चिकित्सकीय या आनुवंशिक विकृति
यदि उपचाररत स्वास्थ्यकर्मी की राय में भ्रूण गर्भ में ही नष्ट हो सकता है, जन्म के बाद जीवित रहने की संभावना नहीं है या उसमें गंभीर आनुवंशिक अथवा चिकित्सकीय विकृति है, तो गर्भावस्था की अवधि की कोई सीमा नहीं होगी।
4. 18 वर्ष से कम आयु की बालिका
यदि 18 वर्ष से कम आयु की बालिका बलात्कार या रक्त-संबंधी यौन हिंसा के कारण गर्भवती हुई है, तो उसे भी गर्भावस्था की किसी भी अवस्था में गर्भपात कराने का अधिकार होगा।
कानूनी विशेषज्ञों और महिला अधिकार संगठनों का कहना है कि वर्तमान 28 सप्ताह की सीमा कई व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न करती है।
अक्सर यौन हिंसा की शिकार किशोरियाँ भय, सामाजिक दबाव या जानकारी के अभाव में लंबे समय तक अपनी गर्भावस्था छिपाती रहती हैं। जब मामला सामने आता है, तब तक गर्भावस्था 28 सप्ताह से आगे बढ़ चुकी होती है। ऐसी स्थिति में उन्हें या तो अनचाहा मातृत्व स्वीकार करना पड़ता है या असुरक्षित गर्भपात का सहारा लेना पड़ता है।
इसी प्रकार कई बार भ्रूण में गंभीर विकृतियों का पता गर्भावस्था के अंतिम चरण में चलता है। तब वर्तमान कानून चिकित्सकों और महिलाओं दोनों के सामने कठिनाई पैदा करता है।
प्रस्तावित संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह महिला की सहमति को केंद्र में रखता है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किए गए उस सिद्धांत के अनुरूप है कि प्रत्येक महिला को अपने शरीर और प्रजनन संबंधी निर्णयों पर अधिकार होना चाहिए।
महिला, कानून और विकास मंच (FWLD) जैसे संगठनों ने लंबे समय से यह मांग उठाई है कि गर्भपात को स्वास्थ्य सेवा के रूप में देखा जाए, अपराध के रूप में नहीं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की दृष्टि
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) सुरक्षित गर्भपात को सार्वजनिक स्वास्थ्य का विषय मानता है। उसकी प्रमुख सिफारिशें हैं—
महिलाओं को सुरक्षित, कानूनी और सम्मानजनक गर्भपात सेवाओं तक बिना अनावश्यक कानूनी बाधाओं के पहुँच मिले।
गर्भावस्था की अवधि के अनुसार दवा या शल्य चिकित्सा की उपयुक्त विधि अपनाई जाए।
प्रारंभिक गर्भावस्था में चिकित्सकीय परामर्श के साथ सुरक्षित दवा द्वारा गर्भपात की सुविधा उपलब्ध हो।
प्रशिक्षित नर्सों, मिडवाइफ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को भी प्रारंभिक गर्भपात सेवाएँ देने का अधिकार मिले, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों तक सेवा पहुँच सके।
प्रस्तावित विधेयक इन सिद्धांतों के अनुरूप व्यवस्था विकसित करने का प्रयास करता है।
गर्भपात का निर-अपराधीकरण : अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता
नेपाल अनेक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों का पक्षकार है। महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अभिसमय (CEDAW) और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की यूनिवर्सल पीरियोडिक रिव्यू (UPR) में नेपाल को गर्भपात से संबंधित दंडात्मक प्रावधानों की समीक्षा करने और महिलाओं को अपराधी न मानने की सिफारिशें मिल चुकी हैं।
2026 की यूपीआर समीक्षा में अनेक देशों ने नेपाल से आग्रह किया कि गर्भपात को पूरी तरह अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाए तथा सुरक्षित प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच सुनिश्चित की जाए। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन इन्हीं संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
कानून होने के बावजूद असुरक्षित गर्भपात क्यों?
यह प्रश्न सबसे गंभीर है।
नेपाल में सरकार सूचीबद्ध अस्पतालों में सुरक्षित गर्भपात सेवा निःशुल्क उपलब्ध कराती है। मातृत्व सुरक्षा कार्यक्रम पर प्रतिवर्ष अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद असुरक्षित गर्भपात पूरी तरह नहीं रुका है।
स्वास्थ्य सेवा विभाग के अनुसार कुल गर्भपातों में लगभग 52 प्रतिशत अभी भी असुरक्षित तरीके से होते हैं। एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2021 में लगभग 3.33 लाख महिलाओं ने गर्भपात कराया, जिनमें बड़ी संख्या ने स्वास्थ्य संस्थानों के बाहर या असुरक्षित माध्यमों से गर्भपात कराया।
इस स्थिति के पीछे कई कारण बताए जाते हैं—
ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाओं की सीमित उपलब्धता।
सामाजिक कलंक और गोपनीयता का भय।
किशोरियों में जानकारी और परामर्श का अभाव।
स्वास्थ्य संस्थानों की दूरी और प्रशिक्षित सेवाओं की कमी।
देशभर के सभी जिलों में सेवा पहुँचाने का प्रयास होने के बावजूद केवल सीमित स्वास्थ्य संस्थानों में सुरक्षित गर्भपात की सुविधा उपलब्ध है।
अधिकार और संवेदनशीलता के बीच संतुलन
गर्भपात का प्रश्न केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक, सामाजिक, चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक भी है। एक ओर महिला का जीवन, स्वास्थ्य और सम्मान है; दूसरी ओर भ्रूण, परिवार, समाज और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से जुड़े प्रश्न भी मौजूद हैं। इसलिए अधिकांश देशों की तरह नेपाल भी गर्भपात को पूरी तरह बिना शर्त अनुमति देने के बजाय विशेष परिस्थितियों में अधिकार का विस्तार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
प्रस्तावित संशोधन में प्रत्येक मामले में चिकित्सकीय राय और महिला की सहमति को आवश्यक बनाया गया है, जिससे निर्णय स्वास्थ्य और कानून दोनों के दायरे में लिया जा सके।
आगे की चुनौतियाँ
यदि यह विधेयक कानून बनता है, तो उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए केवल कानूनी संशोधन पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यक होगा कि—
ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों तक सुरक्षित गर्भपात सेवाएँ पहुँचें।
प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाई जाए।
किशोरियों और महिलाओं के लिए यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भी प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
नेपाल का यह प्रस्तावित संशोधन महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीति पहल के रूप में देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य विशेष परिस्थितियों में महिलाओं के जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा की रक्षा करना तथा असुरक्षित गर्भपात से होने वाले जोखिमों को कम करना है। साथ ही यह नेपाल की संवैधानिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के अनुरूप कानून को अद्यतन करने का प्रयास भी है।
हालाँकि इस विषय पर समाज में विभिन्न नैतिक, धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण मौजूद हैं, इसलिए विधेयक पर संसदीय चर्चा और सार्वजनिक विमर्श के बाद ही इसका अंतिम स्वरूप तय होगा। इतना स्पष्ट है कि यह बहस महिलाओं के स्वास्थ्य, अधिकार और सुरक्षित मातृत्व को केंद्र में लाने वाली एक महत्वपूर्ण पहल बन चुकी है।


