समावेशीविहीन लोकतंत्र: दिवास्वप्न और मृगतृष्णा के ३५ वर्ष : डा. विधुप्रकाश कायस्थ
डा. विधुप्रकाश कायस्थ, काठमांडू, 6 अगस्त। लोकतंत्र के ३५ वर्ष और गणतंत्र के १८ वर्ष बीत जाने के बाद भी ढाई सौ साल पहले नेपाल एकीकरण के दौरान शुरू हुए भेदभाव खत्म नहीं हो सके हैं। अल्पसंख्यक अभिजात वर्ग लगातार सत्ता पर हावी रहा, जिससे बहुसंख्यक जनता को सत्ता और व्यवस्था से बेदखल करने का सिलसिला नहीं रुका। पिछले ३५ वर्षों में अलग-अलग सिद्धांतों वाले दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथी बल बारी-बारी से सत्ता में पहुंचे, लेकिन वे सभी उन्हीं अभिजात शासकों में बदल गए। उनके व्यवहार में कोई बुनियादी अंतर नजर नहीं आया। अल्पसंख्यक एकल-जातीय वर्चस्व वाली शासन प्रणाली में बहुसंख्यक बहुजातीय लोकतंत्र का वास्तविक अभ्यास नहीं हो सका। बहुसंख्यक समुदाय को पीछे धकेलने वाली ऐसी व्यवस्था में लोकतंत्र एक दिवास्वप्न और विकास महज मृगतृष्णा साबित हुआ है।
नेपाल २८ मई २००८ को संविधान सभा की पहली बैठक से औपचारिक रूप से संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषित हुआ था। इसके साथ ही देश में २३८ साल पुराने शाहवंशीय राजतंत्र का अंत हो गया और देश के नागरिक ही सर्वोच्च शासक बन गए, ऐसा संविधान में लिखा गया। लेकिन विडंबना यह रही कि गणतंत्र में भी सत्ता में पहुंचे लोगों ने राजतंत्र के पदचिह्नों का ही अनुसरण किया। सत्ता परिवारवाद के इर्द-गिर्द घूमती रही और जनता को प्रजा ही बनाकर रखा गया।
सन १७६९ में पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल का एकीकरण पूरा करते हुए इसे “सभी जात-जातियों का साझा फूलबारी (बगीचा)” के रूप में विकसित करने की कल्पना की थी। हालांकि, एकीकरण के ढाई शताब्दी से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी नेपाल के राजनीतिक इतिहास में एक गंभीर संरचनात्मक विरोधाभास बना हुआ है: बड़े भू-राजनीतिक परिवर्तनों और अनेक व्यवस्था परिवर्तनों के बावजूद, राज्य तंत्र लगातार आम जनता से दूर, दोहनकारी और “जन-विरोधी” ही बना रहा।
संभ्रांत वर्ग की विरासत: जन-स्वामित्वविहीन शासन के २५० वर्ष
नेपाली राज्य अपने नागरिकों को शासन के केंद्र में क्यों नहीं रख सका, इसे समझने के लिए राष्ट्र-निर्माण की ऐतिहासिक कड़ियों को देखना होगा। १७६९ के एकीकरण ने भौगोलिक रूप से तो एक देश बना दिया, लेकिन नागरिक अधिकारों पर आधारित समावेशी राष्ट्र-राज्य का निर्माण नहीं कर सका।
१. केंद्रीयकृत सामंती साम्राज्यवाद: १७६९ के बाद की राजनीतिक संरचना सामंती दोहन पर आधारित थी। शासन पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए शासकों और भारदारों (दरबारियों) के परिवारों के बीच बिर्ता, जागीर और रैकर के रूप में भूमि का वितरण किया गया, जिससे आम किसान संप्रभु नागरिक न बनकर केवल कर चुकाने वाले प्रजा मात्र बनकर रह गए।
२. राणा शासन (१८४६–१९५१) के तहत संस्थागत भेदभाव: एक शताब्दी लंबे निरंकुश पारिवारिक शासन ने (विशेषकर १८५४ के मुलुकी ऐन के माध्यम से) सामाजिक भेदभाव को कानूनी रूप दिया तथा सार्वजनिक शिक्षा और प्रशासनिक भागीदारी पर प्रतिबंध लगा दिया। राज्य प्रशासन का मुख्य उद्देश्य जनसेवा नहीं, बल्कि पारिवारिक सत्ता को टिकाए रखना और राजस्व वसूलना मात्र था।
३. निरंकुश राजतंत्र और पंचायती व्यवस्था (१९६०–१९९०): पंचायती व्यवस्था ने “दलविहीन” राष्ट्रीय एकता का नारा तो दिया, लेकिन शक्ति दरबारिया नौकरशाही और काठमाडौँ-केंद्रित संभ्रांत वर्ग तक ही सीमित रही। राज्य के अंग जनकल्याण के माध्यम न बनकर शासक के प्रति वफादारी परखने का जरिया बने।
प्रत्येक युग में प्रशासनिक संस्कृति ने एक गहरी पितृसत्तात्मक सोच का पालन किया—जहाँ सिविल सेवकों ने नागरिकों को सेवा का अधिकार रखने वाले संप्रभु नागरिक के रूप में नहीं, बल्कि दया की भीख मांगने वाले “निवेदक” के रूप में देखा।
सन् २००८ के बाद का विच्छेद: संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र दूरी क्यों नहीं घटा सका?
२४० साल लंबे राजतंत्र का अंत और सन् २००८ में धर्मनिरपेक्ष, संघीय, समानुपातिक, समावेशी, लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना से अतीत के इस संरचनात्मक भेदभाव को पूरी तरह से तोड़ने की उम्मीद जगी थी। लेकिन डेढ़ दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आम नागरिक राज्य तंत्र से उतने ही कटे हुए हैं। प्रगतिशील संवैधानिक आदर्श दैनिक शासन संचालन में क्यों नहीं ढल सके, इसका वस्तुनिष्ठ विश्लेषण यहाँ प्रस्तुत है:
१. राजतंत्र की जगह “दलीय सिंडिकेट”: शक्ति का निचले स्तर तक लोकतंत्रीकरण करने के बजाय, गणतंत्र के आने के बाद सत्ता कुछ सीमित शीर्ष नेताओं के दलीय सिंडिकेट में बदल गई। न्यायपालिका, संवैधानिक आयोग और विश्वविद्यालय जैसी प्रमुख लोकतांत्रिक संस्थाएं राजनीतिक भागबंडे के आधार पर बांट दी गईं। राज्य अब किसी एक राजा द्वारा नहीं, बल्कि दलीय सिंडिकेट द्वारा चलाया जाने लगा।
२. प्रक्रियागत समावेशिता बनाम वास्तविक सशक्तिकरण: सन् २०१५ के संविधान ने दलित, जनजाति, मधेशी और महिलाओं के लिए समानुपातिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक समावेशिता की अभूतपूर्व व्यवस्था की। लेकिन इसके कार्यान्वयन पर राजनीतिज्ञों ने कब्जा जमा लिया। समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली की सूची को राजनीतिक संभ्रांतों ने अपने परिवार के सदस्यों और धनी व्यापारियों को सांसद बनाने का जरिया बना लिया। इस प्रकार समावेशिता वास्तविक सत्ता-हस्तांतरण का माध्यम न बनकर कुछ पहुंच वाले लोगों के लिए औपचारिकता तक सीमित रह गई।
३. संघवाद के तहत विकेंद्रीकृत भ्रष्टाचार: संघवाद का मुख्य उद्देश्य “गांव-गांव में सिंहदरबार” यानी जनता के घर-आंगन तक सरकार पहुंचाना था। लेकिन व्यवहार में, नागरिकों ने महसूस किया कि इससे अक्सर केवल “गांव-गांव में भ्रष्टाचार” ही पहुंचा है। स्थानीय निकायों ने पारदर्शी-रहित कर प्रणाली, प्रशासनिक झंझटों और भाई-भतीजावाद के माध्यम से नागरिकों को परेशान करते हुए स्थानीय दलीय कार्यकर्ताओं के हितों को पूरा करने वाले केंद्रों के रूप में काम किया।
४. युवा पलायन और ध्वस्त अर्थव्यवस्था: जब राज्य के अंग बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वदेश में सम्मानजनक रोजगार नहीं दे पाते, तब नागरिक और राज्य के बीच का सामाजिक अनुबंध टूट जाता है। रोजाना दो हजार से अधिक नेपाली युवा वैदेशिक रोजगार के लिए खाड़ी देशों, मलेशिया और अन्य मुल्कों की ओर पलायन कर रहे हैं। राज्य प्रशासनिक उपेक्षा के कारण देश छोड़ने पर मजबूर हुए उन्हीं युवाओं द्वारा भेजी गई विप्रेषण (रेमिटेंस) पर निर्भर होकर आयात-उन्मुख अर्थव्यवस्था चला रहा है।
नागरिक को पुनः राज्य के केंद्र में स्थापित करने का मार्ग
नेपाल का संवैधानिक ढांचा दक्षिण एशिया में सबसे प्रगतिशील ढांचों में से एक है। लेकिन संविधान उतना ही प्रभावी होता है जितनी इसे लागू करने वाली राजनीतिक संस्कृति जवाबदेह होती है। आम जनता को फिर से गणतंत्र से जोड़ने के लिए नारों से ऊपर उठकर निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
सार्वजनिक सेवा का गैर-राजनीतिकरण: सिविल सेवा, सुरक्षा निकायों और नियामक संस्थाओं को दलीय भागबंडे से मुक्त कर योग्यता और प्रशासनिक तटस्थता कायम की जानी चाहिए।
पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र: राजनीतिक दलों को कुछ व्यक्तियों के सिंडिकेट को तोड़ते हुए युवाओं, विशेषज्ञों और वास्तविक सामुदायिक नेताओं के लिए पारदर्शी रास्ते खोलने चाहिए।
नागरिक-केंद्रित ई-गवर्नेस (डिजिटल शासन): प्रौद्योगिकी के उपयोग से नौकरशाही के स्वेच्छाचारी अधिकारों में कटौती करते हुए सेवा वितरण को डिजिटल बनाया जाए, तो दैनिक रूप से होने वाले खुदरा भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है। हालांकि, ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि सर्वर डाउन होने से उत्पन्न समस्याओं का तत्काल समाधान नहीं किया गया, तो सुशासन भी एक दिवास्वप्न ही बना रहेगा।
नेपाल का राज्य तंत्र शासक वर्ग के बंटवारे से मुक्त होकर जब तक श्रमजीवी जनता के प्रति जवाबदेह सेवा-प्रदाता में परिवर्तित नहीं होता, तब तक २००८ के आदर्श केवल कागजों तक सीमित रहेंगे। राष्ट्र-निर्माण का वास्तविक काम केवल शासक या सरकार का चेहरा बदलना नहीं है—बल्कि नागरिकों को लाचार प्रजा से गणतंत्र के वास्तविक संप्रभुता-संपन्न मालिक बनाना है।


