अध्यादेश से खाली हुए 1,594 पदों में अब तक सिर्फ 198 पर नियुक्ति, कई संस्थानों का काम प्रभावित

सरकार ने पिछले वैशाख महीने में विभिन्न बोर्ड, समितियों और संस्थानों के कुल 1,594 पदाधिकारियों को पदमुक्त कर दिया था। इसके लिए ‘सार्वजनिक पदाधिकारियों की पदमुक्ति संबंधी विशेष व्यवस्था अध्यादेश, 2083’ लाया गया था। अध्यादेश के जरिए खाली किए गए इन पदों में से अब तक केवल करीब 198 पदों पर ही नियुक्तियां हो सकी हैं।
पदाधिकारी नहीं होने के कारण कई सरकारी निकायों का कामकाज प्रभावित हो रहा है। कई आयोगों की गतिविधियां ठप पड़ गई हैं, जबकि कुछ संस्थानों में रजिस्ट्रार का पद खाली होने से वे बजट और नीति-कार्यक्रम के बिना संचालित हो रहे हैं।
सरकार पर यह आरोप भी लगा है कि राजनीतिक हस्तक्षेप खत्म करने के नाम पर अध्यादेश लाकर पुरानी राजनीतिक नियुक्तियां तो रद्द कर दी गईं, लेकिन सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) ने अपने कार्यकर्ताओं को नियुक्त किया।
इसी बीच, नियुक्ति प्रक्रिया और कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं होने के कारण अदालत ने कई नियुक्तियां भी रद्द कर दी हैं। सर्वोच्च अदालत ने 4 भाद्र को नेपाल वायु सेवा निगम के कार्यकारी अध्यक्ष महेश्वरभक्त श्रेष्ठ की नियुक्ति को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि 65 वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करना प्रथम दृष्टया कानून के विपरीत है।
नियमों के अनुसार कार्यकारी अध्यक्ष बनने के लिए अन्य योग्यताओं के साथ उम्मीदवार की आयु 65 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। न्यायाधीश सुनीलकुमार पोखरेल और बालकृष्ण ढकाल की संयुक्त पीठ ने अपने आदेश में कहा कि मंत्रिपरिषद का 30 असार 2083 का निर्णय कानूनसम्मत नहीं है, इसलिए उसे रद्द किया जाता है।
रास्वपा के वरिष्ठ नेता बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार की यह पहली नियुक्ति नहीं है जिसे अदालत ने निरस्त किया हो। इससे पहले नेपाल वायु सेवा निगम के निदेशक मंडल के सदस्य डॉ. दीपकप्रसाद बाँस्तोला की नियुक्ति भी सर्वोच्च अदालत ने रद्द कर दी थी।
अदालत ने 29 जेठ को फैसला देते हुए कहा था कि नियुक्ति योग्यता और चयन प्रक्रिया के अनुरूप नहीं हुई। संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री ने 31 वैशाख को बाँस्तोला सहित पांच लोगों को निदेशक मंडल में नियुक्त किया था।
याचिकाकर्ता उपेन्द्रबहादुर कार्की ने अदालत में रिट दायर कर कहा था कि चयन समिति की मेरिट सूची में उनका नाम पहले स्थान पर होने के बावजूद सरकार ने उन्हें नजरअंदाज कर दूसरी नियुक्ति की। अदालत ने टिप्पणी की कि मंत्री ने बिना उचित आधार के ‘पिक एंड चूज’ (मनमाने ढंग से चयन) किया।
सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से खाली किए गए पदों में से अब तक 198 पदों पर नियुक्तियां कर दी हैं, जबकि अधिकांश पद अभी भी रिक्त हैं।