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प्रकृति का प्रहार, मानवता की पुकार: रसुवा की बाढ़ और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

 

विशेष संपादकीय

नेपाल की पर्वत श्रृंखलाएँ सदियों से जीवन, संस्कृति और सभ्यता की आधारशिला रही हैं। इन्हीं हिमालयों से निकलने वाली नदियाँ देश को ऊर्जा, कृषि और समृद्धि देती रही हैं। लेकिन जब यही नदियाँ विकराल रूप धारण करती हैं, तब वे विकास, सपनों और जीवन को एक ही क्षण में निगल जाती हैं। रसुवा, नुवाकोट और धादिङ में आई भीषण बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि पूरे नेपाल की संवेदना, व्यवस्था और सामूहिक उत्तरदायित्व की परीक्षा है।

बुधवार सुबह चीन की ओर हिमताल (ग्लेशियल लेक) फटने के बाद भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में जो बाढ़ आई, उसने कुछ ही सेकंड में दशकों से खड़ी बस्तियों, पुलों, सड़कों, जलविद्युत परियोजनाओं और लोगों के जीवन को बहा दिया। अनेक परिवार बिछड़ गए, कई लोग अब भी लापता हैं और हजारों नागरिक खुले आसमान के नीचे सहायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं। पहाड़ों पर शरण लिए लोगों की आँखों में आज केवल एक प्रश्न है—क्या कोई हमारी पुकार सुन रहा है?

इस त्रासदी का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि जिन लोगों ने अपनी मेहनत से घर बनाए, खेत सँवारे और भविष्य के सपने बुने थे, उनके पास अब पहनने के कपड़ों और खाने के एक निवाले तक का भरोसा नहीं बचा है। बच्चे, बुज़ुर्ग और महिलाएँ राहत शिविरों की ओर देख रहे हैं। कई जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में मजदूर फँसे हैं और उनके परिवार हर गुजरते पल के साथ उम्मीद और भय के बीच झूल रहे हैं।

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रसुवा की यह त्रासदी केवल स्थानीय संकट नहीं है। यह पूरे नेपाल की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा पर भी गहरी चोट है। सैकड़ों मेगावाट बिजली उत्पादन ठप हो गया है, पुल बह गए हैं, सड़क संपर्क टूट गया है और सीमा व्यापार प्रभावित हुआ है। यह हमें याद दिलाता है कि जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक जोखिम अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की वास्तविकता हैं।

ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीति नहीं, बल्कि मानवता की है। सरकार, सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस राहत कार्य में जुटी हैं, लेकिन आपदा का दायरा इतना व्यापक है कि केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। समाज के हर वर्ग—नागरिकों, सामाजिक संगठनों, उद्योगों, प्रवासी नेपाली समुदाय और अंतरराष्ट्रीय सहयोगी संस्थाओं—को आगे आना होगा।

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यह समय हाथ बढ़ाने का है

आज रसुवा को केवल संवेदना नहीं, बल्कि ठोस सहयोग चाहिए। हर सक्षम नागरिक अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दे सकता है—

  • राहत कोष में आर्थिक सहायता।

  • भोजन, स्वच्छ पानी, कपड़े, कंबल और आवश्यक दवाइयों की व्यवस्था।

  • प्रभावित बच्चों और महिलाओं के लिए सुरक्षित आश्रय एवं स्वास्थ्य सहायता।

  • रक्तदान, स्वयंसेवा और राहत सामग्री के संग्रह व वितरण में सहभागिता।

छोटी-सी सहायता भी किसी परिवार के लिए जीवन का सहारा बन सकती है।

हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

यह आपदा हमें एक और महत्वपूर्ण संदेश देती है। हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत, सड़क और बस्ती निर्माण की योजनाओं को जलवायु जोखिमों के अनुरूप अधिक सुरक्षित और वैज्ञानिक बनाना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है। प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सीमा-पार सूचना साझाकरण और आपदा प्रबंधन की क्षमता को भी मजबूत करना होगा, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों का प्रभाव कम किया जा सके।

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आइए, रसुवा के साथ खड़े हों

आज रसुवा रो रहा है, लेकिन यह केवल रसुवा का दुःख नहीं है; यह पूरे नेपाल का दुःख है। संकट की इस घड़ी में यदि हम एक-दूसरे का हाथ थाम लें, तो मलबे के बीच भी उम्मीद का दीप जल सकता है।

आइए, हम सब मिलकर रसुवा के लिए आगे आएँ। एक परिवार को भोजन, एक बच्चे को दवा, एक बुज़ुर्ग को आश्रय और एक पीड़ित को विश्वास देने का प्रयास करें। यही हमारी संस्कृति है, यही हमारी मानवता है, और यही इस कठिन समय में सबसे बड़ा धर्म है।

रसुवा को हमारी प्रार्थनाओं से अधिक हमारी सहभागिता की आवश्यकता है। आइए, सहायता करें—अभी, इसी समय।

श्वेता दीप्ति

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