क्या रेस्क्यु मे सरकार असफल हो रही है ? एक मानवीय संवेदना केन्द्रित विश्लेषण : डा.विजय दत्त

डा.विजय दत्त, काठमांडू, 30 अगस्त। नेपाल जिसे भाव एवं भावनाओ का देश कहा जाता है अौर मूल्य मान्यता का स्थान सर्वोपरि रहता है । उस मुलुक के साथ मानवजन्य हो वा प्रकृतिजन्य हो विपत्तियां के कारण लगातार एक दशक अधिक से जनधनकी तबाही शिखर पर है । २०७२ साल मे भुकम्प ने दसौं हजार कि जान ली । उसके वाद बाढ, भुस्खलन सहित कि समस्याऐ से जुझ रहि ये सुन्दर देश । इसी क्रममे २०८३ साल मे रसुवा जिले के भोटेकोशी एवं त्रिशूली नदी तटीय क्षेत्रों (विशेषकर रसुवागढी, स्याफ्रुबेसी तथा आसपास के क्षेत्रों) में २६ अगस्त को आई भीषण बाढ़ और पहिरो (जल-विप्लव) ने न केवल नेपाल के उत्तरी सीमांत क्षेत्र में भारी जन-धन की भारी क्षति पहुंचाई, लाशों कि ढेर लगता जा रहा है । इस आपदा विपदा ने देश के आपदा प्रबंधन तंत्र, कूटनीतिक निर्णयों और नीतिगत परिपक्वता पर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार कि क्षमता मे निर्णय क्षमता का शक्ति प्रथम होता है । मगर, विश्लेषको कहना है कि २६ तारिख मे आई जल प्रलय के रेस्क्यु के लिए २९ तारिख मे निर्णय लेना सरकार का अदुरदर्शी एवं अपरिपक्व निर्णय है । नहि लेना लेना के बीच मे पिडित परिवार अौर पिडित ।
हिमाली क्षेत्र में अचानक आए इस जल-विप्लव ने बुनियादी ढांचे, जलविद्युत परियोजनाओं, व्यापारिक मार्गों और स्थानीय बस्तियों को तहस-नहस कर दिया। आपदा के तुरंत बाद खोज व बचाव (Search & Rescue) अभियान, अंतरराष्ट्रीय सहायता स्वीकार करने के सवाल पर सरकार के बदलते फैसले, तथा पुनर्निर्माण हेतु आवश्यक विशाल वित्तीय संसाधन को लेकर उत्पन्न बहस आज देश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में मुख्य चर्चा का विषय बनी हुई है।
१. *यथार्थ स्थिति*
२६ अगस्त के भयंकर भूस्खलन और नदी में आई बाढ़ के बाद प्रभावित क्षेत्रों में नेपाली सेना, सशस्त्र प्रहरी बल और नेपाल प्रहरी द्वारा निरंतर राहत एवं खोज अभियान चलाया जा रहा है। जितनी शक्ति है इन सुरक्षा निकाय मे सब शक्ति लगा दी ।
२. *नीतिगत यू-टर्न ?*
आपदा के तुरंत बाद सरकार के कूटनीतिक और नीतिगत फैसलों में देखने को मिली उथल-पुथल ने विशेषज्ञों को चौंका दिया:-
२६-२७ अगस्त का निर्णय: आपदा के शुरुआती चरण में सरकार की ओर से यह संदेश गया कि नेपाल आंतरिक संसाधनों और अपनी सुरक्षा एजेंसियों (नेपाली सेना एवं सशस्त्र पुलिस) के माध्यम से ही स्थिति पर नियंत्रण पा लेगा और उसे तत्काल किसी बाह्य या अंतरराष्ट्रीय प्रत्यक्ष खोज-बचाव सहायता की आवश्यकता नहीं है।
*२९ अगस्त का यू-टर्न:*
भीषण क्षति, अत्यंत दुर्गम भौगोलिक परिस्थिति, विशेषकर टनेल (सुरंगों) और मलबे में फंसे लोगों को निकालने में आ रही तकनीकी व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए २९ अगस्त को सरकार को अपना निर्णय बदलना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग/विदेशी तकनीकी मदद स्वीकार करने की बात कही गई।
*क्या यह अपरिपक्वता और अदूरदर्शी निर्णय था ?*
इस नीतिगत बदलाव का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण दो दृष्टिकोणों से किया जा सकता है:-
*अदूरदर्शिता का पक्ष:*
गोल्डन अवर (Golden Hour) का नुकसान: आपदा प्रबंधन में शुरुआती २४ से ७२ घंटे जीवन बचाने के दृष्टिकोण से *गोल्डन आवर’* माने जाते हैं। विशेष उपकरण, जैसे थर्मल इमेजिंग उपकरण, उन्नत ड्रोन और विशेषज्ञ टनेल-रेस्क्यू टीमों की अनुपस्थिति में शुरुआती २-३ दिन घरेलू संसाधनों के भरोसे बिताना नीतिगत चूक ही कही जा सकती है।
*भू-राजनीतिक झिझक:*
सीमावर्ती क्षेत्र (उत्तरी सीमा) में आई इस आपदा में चीनी सहायता या वैश्विक एजेंसियों को तुरंत अनुमति देने में संकोच करना मानवीय पहलू से परे कूटनीतिक झिझक को दर्शाता दिखलाता है। यदि २९ अगस्त को ही सहयोग की आवश्यकता मान ली गई, तो २६ अगस्त को इसे खारिज करना रणनीतिक आकलन की कमी साबित करता है।
*सरकारी परिप्रेक्ष्य एवं रक्षात्मक पक्ष:*
सरकार का दावा रहा है कि प्रारंभिक चरण में घरेलू सुरक्षा बलों को संगठित करना और संप्रभुता के तहत त्वरित रिस्पॉन्स देना प्राथमिक रणनीति थी।
स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे (सड़कें और संचार) के पूरी तरह ध्वस्त होने के कारण आपदा के वास्तविक आयाम का आकलन करने में २४ से ४८ घंटे का समय लगा।
३. *क्या समय पर जीवन बचा पाने में ‘रेस्क्यू’ असफल रहा*?
रसुवा का भूगोल अत्यंत खड़ा, संकरा और कठिन हिमाली भू-भाग है। २६ अगस्त के जल-विप्लव के बाद जो चुनौतियाँ सामने आईं, उन्होंने खोज एवं बचाव अभियान की गति को धीमा कर दिया:-
*सड़क व संचार नेटवर्क का ठप्प होना:* काठमांडू-रसुवागढी राजमार्ग के कई हिस्सों में पुल बह जाने और भारी पहिरो गिरने से जमीनी मार्ग पूरी तरह कट गया।
*मौसम की अनुकूलता न होना*: लगातार बारिश और धुंध के कारण शुरुआती घंटों में हेलीकॉप्टर की उड़ानों में भारी बाधा आई।
*विशिष्ट उपकरणों की कमी*: मलबे, भारी पत्थरों तथा जलविद्युत परियोजनाओं की जलमग्न सुरंगों में दबे लोगों को खोजने के लिए नेपाल के पास अत्याधुनिक हैवी-लिफ्टिंग व अंडरवाटर/टनल डिटेक्शन तकनीक की सीमाएँ साफ नजर आईं।
इस स्थिति ने यह उजागर किया कि नेपाल का आपदा प्रतिक्रिया तंत्र (Disaster Response Mechanism) पारंपरिक रेस्क्यू में सक्षम होने के बावजूद, हिमाली जल-उत्पात और उच्च-तकनीकी आपदाओं से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं है। समय पर अत्याधुनिक मदद न मिल पाने या न बुला पाने के कारण कई अनमोल जिंदगियों को बचाने का अवसर हाथ से निकल गया।
४. *अर्थमंत्री का वक्तव्य*
आपदा के बीच अर्थमंत्री और सरकार द्वारा क्षति का शुरुआती आकलन करते हुए पुनर्निर्माण एवं पुनर्वास के लिए ६ खर्ब रुपये (600 Billion NPR) जैसे भारी बजट की आवश्यकता की गुहार लगाना देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
*आर्थिक पक्ष का विश्लेषण:*
राजस्व का मुख्य स्रोत प्रभावित: रसुवागढी भन्सार नेपाल-चीन व्यापार का एक प्रमुख गलियारा है। इस सूखे बंदरगाह (Dry Port) और सीमावर्ती अवसंरचना के तबाह होने से नेपाल के उत्तरी व्यापार और भन्सार राजस्व संग्रहण पर बहुत बुरा असर पड़ा है।
*जलविद्युत क्षेत्र को झटका*: इस क्षेत्र में संचालित तथा निर्माणाधीन कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को अरबों का नुकसान हुआ है, जिससे नेपाल के ऊर्जा क्षेत्र और निजी निवेशकों की कमर टूट गई है।
आंतरिक बजट की सीमा: नेपाल का वार्षिक विकास बजट (पूंजीगत खर्च) स्वयं सीमित रहता है। ऐसे में ६ खर्ब की राशि नेपाल के अपने आंतरिक स्रोतों से जुटाना नामुमकिन के बराबर है।
अत: सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विकास साझेदारों और बहुपक्षीय एजेंसियों (ADB, World Bank आदि) से वित्तीय मदद की पुकार लगाना एक कड़वी आर्थिक वास्तविकता है। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि केवल वित्तीय सहायता की गुहार लगाने से काम नहीं चलेगा; जब तक आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण की पारदर्शी नीति नहीं बनती, तब तक यह चक्र दोहराता रहेगा।
५. *निष्कर्ष एवं भावी राह*
रसुवा की यह त्रासद घटना नेपाल सरकार के लिए एक गंभीर सीख है। सरकार आपदा के समय कूटनीतिक हिचकिचाहट या प्रशासनिक जिद को दरकिनार कर “*जीवन रक्षा सर्वोपरि*” के सिद्धांत पर काम होना चाहिए। सहयोग का निर्णय तत्काल और पारदर्शी होना चाहिए। इसके साथ ही, नेपाली सेना और सशस्त्र प्रहरी बल के आपदा प्रबंधन दस्ते को अत्याधुनिक टनेल-रेस्क्यू, ड्रोन मैपिंग और हैवी मलबे को हटाने वाले आधुनिक उपकरणों से लैस करना अनिवार्य हो गया है। हिमाली क्षेत्रों में हाइड्रोपावर और सड़कों का निर्माण करते समय *जल-जलवायु जोखिम*(Hydro-climatic risks) का सूक्ष्म मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
रसुवा जल-विप्लव ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि प्रकृति की अनिश्चितता के सामने नेपाल का वर्तमान आपदा प्रबंधन ढांचा अपर्याप्त है। अब समय केवल ६ खर्ब की आर्थिक गुहार लगाने का नहीं, अपितु, अपनी नीतिगत अदूरदर्शिता को सुधारकर भविष्य के लिए एक त्वरित, संवेदनशील और आधुनिक आपदा प्रतिक्रिया रणनीति बनाने का है। नेपाल सरकार कि प्रथम कर्तव्य *जनता कि जीवन रक्षा* ही होनी चाहिए इसके लिए दोनो सक्षम पडोसी चीन अौर भारत से ही सहयोग लेना चाहिए प्रथमतः ।

