रसुवा की त्रासदी: क्या तबाही से पहले चेतावनी संभव थी? : श्वेता दीप्ति
नेपाल और चीन के बीच एक स्थायी सीमा-पार हिमालयी आपदा पूर्व चेतावनी तंत्र होना चाहिए। यदि किसी ग्लेशियर, हिमनदी, भूस्खलन या नदी प्रणाली में असामान्य गतिविधि दिखाई देती है, तो संबंधित आंकड़े तत्काल साझा किए जाएं। केवल आपदा होने के बाद राहत दल और भारी मशीनरी भेजना पर्याप्त नहीं है; असली सफलता तब होगी जब जोखिम की सूचना आपदा से पहले प्रभावित लोगों तक पहुंच जाए।
नेपाल और चीन की सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे के प्रवाह ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऐसी आपदाएं केवल प्रकृति का प्रकोप होती हैं, या आधुनिक विज्ञान और तकनीक के माध्यम से इनके खतरे को पहले पहचाना जा सकता है?
चीनी विज्ञान अकादमी के इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्बतियन प्लेटो रिसर्च के नेतृत्व में हुए एक अध्ययन ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। अध्ययन के अनुसार, इस आपदा के पीछे केवल अचानक हुई भारी बारिश जिम्मेदार नहीं थी। ग्लेशियर की लगातार गति, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बढ़ता तापमान, बर्फ के पिघलने में वृद्धि, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और चट्टान-बर्फ की सतह की कमजोर होती स्थिरता जैसे कई दीर्घकालिक कारकों ने मिलकर परिस्थितियां तैयार की थीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं ने मुख्य घटना से कुछ घंटे पहले भूकंपीय निगरानी केंद्रों में असामान्य संकेत दर्ज होने की बात कही है। कुछ संकेत छोटे स्तर पर बर्फ और हिम की गतिविधियों के साथ भी मेल खाते थे। यदि यह निष्कर्ष आगे के वैज्ञानिक विश्लेषण में पुष्ट होता है, तो एक बड़ा प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है—क्या इन संकेतों से बड़े खतरे का अनुमान लगाया जा सकता था?
यहां चीन की जिम्मेदारी का सवाल उठता है।
चीन दुनिया के सबसे उन्नत रिमोट सेंसिंग, उपग्रह निगरानी, भूकंपीय नेटवर्क और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी वाले देशों में है। तिब्बती पठार और हिमालयी क्षेत्र में उसके पास व्यापक वैज्ञानिक निगरानी तंत्र भी मौजूद है। ऐसे में सीमा के ठीक पार किसी बड़े ग्लेशियर या हिमनदीय क्षेत्र में असामान्य गतिविधि का पता चलने पर क्या नेपाल को तत्काल चेतावनी दी जा सकती थी—यह सवाल पूछना बिल्कुल स्वाभाविक है।
लेकिन इसका उत्तर जल्दबाजी में ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना भी उचित नहीं होगा।
किसी छोटे भूकंपीय या ग्लेशियर संबंधी संकेत का अर्थ यह जरूरी नहीं होता कि कुछ घंटों बाद एक विनाशकारी हिमस्खलन या मलबे की बाढ़ आने वाली है। पहाड़ों में ऐसी हजारों छोटी गतिविधियां होती रहती हैं, जिनमें से अधिकांश किसी बड़ी आपदा में परिवर्तित नहीं होतीं। स्वयं चीनी शोधकर्ताओं ने भी कहा है कि उपलब्ध प्रमाण अभी किसी एक निश्चित और तत्काल कारण की पहचान के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
इसलिए यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि चीन के पास निश्चित रूप से बाढ़ की पूर्व सूचना थी और उसने नेपाल को नहीं बताया।
लेकिन इतना सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या उपलब्ध संकेतों को जोड़कर जोखिम की चेतावनी तैयार की जा सकती थी?
यही इस पूरी त्रासदी का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
आज की आपदा प्रबंधन व्यवस्था में पूर्व चेतावनी का अर्थ केवल यह नहीं है कि मौसम विभाग बारिश का अनुमान लगाए। आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली को मौसम विज्ञान, उपग्रह चित्रों, ग्लेशियर की गति, भूकंपीय गतिविधि, नदी के जलस्तर, भू-स्खलन और भूगर्भीय बदलावों के आंकड़ों को एक साथ पढ़ना होता है।
रसुवा जैसी घटनाओं में यही बहुस्तरीय निगरानी जीवन और मृत्यु के बीच अंतर पैदा कर सकती है।
इस घटना का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है—आपदा की सीमा नहीं होती, लेकिन प्रशासनिक सीमाएं होती हैं।
हिमालय नेपाल, चीन, भारत, भूटान और पाकिस्तान तक फैला हुआ है। एक देश में होने वाला ग्लेशियर का टूटना दूसरे देश में बाढ़, मलबे का प्रवाह या नदी के जलस्तर में अचानक वृद्धि का कारण बन सकता है। इसलिए हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए केवल राष्ट्रीय स्तर की तैयारी पर्याप्त नहीं है।
नेपाल और चीन के बीच एक स्थायी सीमा-पार हिमालयी आपदा पूर्व चेतावनी तंत्र होना चाहिए। यदि किसी ग्लेशियर, हिमनदी, भूस्खलन या नदी प्रणाली में असामान्य गतिविधि दिखाई देती है, तो संबंधित आंकड़े तत्काल साझा किए जाएं। केवल आपदा होने के बाद राहत दल और भारी मशीनरी भेजना पर्याप्त नहीं है; असली सफलता तब होगी जब जोखिम की सूचना आपदा से पहले प्रभावित लोगों तक पहुंच जाए।
यह भी ध्यान रखना होगा कि जलवायु परिवर्तन हिमालय की पुरानी जोखिम-व्यवस्था को तेजी से बदल रहा है। तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियरों का व्यवहार बदल रहा है, पर्माफ्रॉस्ट पिघल रहा है और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में चट्टानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है। ऐसे में आने वाले वर्षों में ग्लेशियर-जनित बाढ़ और मलबे के प्रवाह का खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए रसुवा की त्रासदी को केवल एक प्राकृतिक आपदा मानकर भूल जाना भविष्य के लिए खतरनाक होगा।
नेपाल को भी आत्ममंथन करना होगा। क्या हमारे पास ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों की चौबीसों घंटे निगरानी की पर्याप्त क्षमता है? क्या स्थानीय प्रशासन तक तत्काल चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था है? क्या सीमा पार से प्राप्त वैज्ञानिक आंकड़ों को वास्तविक समय में विश्लेषित करने की क्षमता है? क्या जोखिम वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए स्पष्ट और नियमित निकासी योजना है?
और चीन से भी एक स्पष्ट सवाल पूछा जाना चाहिए—यदि उसके वैज्ञानिक और तकनीकी तंत्र ने सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में असामान्य संकेत देखे थे, तो क्या भविष्य में ऐसी जानकारी नेपाल के साथ तत्काल साझा करने की कोई औपचारिक व्यवस्था बनाई जा सकती है?
यह सवाल आरोप का नहीं, सहयोग का होना चाहिए।
क्योंकि रसुवा की त्रासदी हमें यह सिखाती है कि आधुनिक युग में केवल राहत और बचाव पर्याप्त नहीं हैं। आपदा के बाद पहुंचने वाली तकनीक से अधिक मूल्यवान वह तकनीक है जो आपदा आने से पहले खतरे की घंटी बजा दे।
चीन के पास तकनीक है, नेपाल के पास हिमालय का प्रत्यक्ष अनुभव है और दोनों देशों के वैज्ञानिकों के पास आंकड़े हैं। आवश्यकता केवल इन तीनों को एक साझा प्रणाली में जोड़ने की है।
भविष्य की किसी आपदा में यह जरूरी नहीं कि पहाड़ को रोका जा सके। ग्लेशियर को बांधा नहीं जा सकता। प्रकृति की शक्ति को समाप्त नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि खतरे का संकेत कुछ घंटे पहले मिल जाए और वह चेतावनी समय पर गांवों, बस्तियों, परियोजनाओं और प्रशासन तक पहुंच जाए, तो हजारों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।
रसुवा में जो हुआ, उसका सबसे बड़ा सबक यही है—
प्रकृति को रोकना शायद हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन प्रकृति के संकेतों को पढ़ना और समय रहते इंसानों को बचाना निश्चित रूप से हमारे हाथ में होना चाहिए।


