नेपाल ने भारत, चीन और अमेरिका से क्यों मांगा ‘क्लाइमेट मुआवजा’ ? क्या यह सचमुच कानूनी हक है ?
दिल्ली से उदय चंद्र सिंह, 2 सितंबर।
बाढ़ की तबाही के बाद नेपाल का बड़ा सवाल—जलवायु संकट पैदा करने वाले ज्यादा जिम्मेदार देश नुकसान की भरपाई में आगे क्यों नहीं आएं ?
नेपाल में हाल की विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ सैकड़ों-हजारों परिवारों को उजाड़ा नहीं है, बल्कि एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय सवाल भी खड़ा कर दिया है—जलवायु परिवर्तन का सबसे कम जिम्मेदार देश, उसकी कीमत सबसे ज्यादा क्यों चुकाए ?
इसी सवाल को लेकर नेपाल ने अब राहत और मदद की सामान्य अपील से आगे बढ़कर ‘क्लाइमेट जस्टिस’ और ‘लॉस एंड डैमेज’ की बात शुरू कर दी है। नेपाल ने चीन, अमेरिका और भारत को दुनिया के बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों के रूप में गिनाते हुए जलवायु से जुड़े नुकसान की भरपाई की मांग उठाई है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने साफ कहा है कि इसे केवल मानवीय मदद या दान के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
लेकिन यहां एक जरूरी सवाल है—क्या अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत नेपाल सीधे भारत, चीन या अमेरिका से बाढ़ का मुआवजा मांग सकता है ?
जवाब थोड़ा पेचीदा है।
‘लॉस एंड डैमेज’ क्या है ?
जलवायु की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में एक महत्वपूर्ण शब्द सामने आया है—Loss and Damage यानी जलवायु परिवर्तन से होने वाला नुकसान और क्षति।
इसका मतलब उन परिस्थितियों से है, जब जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी तबाही होती है जिसे केवल प्रदूषण कम करके या उसके असर से बचाव करके पूरी तरह टाला नहीं जा सकता।
मसलन—अचानक आने वाली बेहद खतरनाक बाढ़, समुद्र का बढ़ता जलस्तर, ग्लेशियरों का पिघलना, विस्थापन, आजीविका का खत्म होना या ऐसी प्राकृतिक आपदाएं जिनसे घर, सड़क, पुल और दूसरी संपत्तियां तबाह हो जाती हैं।
पेरिस समझौते के अनुच्छेद 8 में Loss and Damage को मान्यता दी गई है। इसमें देशों ने जलवायु परिवर्तन से जुड़े नुकसान और क्षति को कम करने और उससे निपटने की जरूरत स्वीकार की है।
यही वह अंतरराष्ट्रीय ढांचा है, जिसके आधार पर नेपाल अपनी बात रख रहा है।
फिर आया ‘Loss and Damage Fund’
2022 में मिस्र में हुए COP27 में दुनिया के देशों ने एक बड़ी सहमति बनाई। खास तौर पर जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित विकासशील देशों की मदद के लिए नई वित्तीय व्यवस्था और एक अलग Fund for Responding to Loss and Damage बनाने का फैसला हुआ।
इसके बाद 2023 में दुबई में हुए COP28 में इस फंड को व्यवस्थित रूप से शुरू करने का रास्ता साफ हुआ। इसका उद्देश्य ऐसे विकासशील देशों की मदद करना है जो जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल असर के प्रति खास तौर पर संवेदनशील हैं।
इस फंड से आर्थिक ही नहीं, बल्कि गैर-आर्थिक नुकसान से निपटने में भी मदद की जा सकती है। इसमें आपदा के बाद राहत, पुनर्वास, पुनर्निर्माण और जलवायु के असर से निपटने की दूसरी जरूरतें शामिल हैं।
यानी नेपाल की मांग पूरी तरह हवा में नहीं है। Loss and Damage की अवधारणा बाकायदा संयुक्त राष्ट्र के जलवायु तंत्र का हिस्सा बन चुकी है।
लेकिन क्या इसका मतलब ‘जिसने प्रदूषण किया, वही पैसा देगा’ है?
यहीं सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।
नेपाल का राजनीतिक और नैतिक तर्क मजबूत हो सकता है, लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय जलवायु व्यवस्था में ऐसा कोई सीधा नियम नहीं है कि किसी आपदा के बाद यह तय किया जाए कि चीन, अमेरिका या भारत ने इतना उत्सर्जन किया, इसलिए उन्हें नेपाल को उतने अरब डॉलर का मुआवजा देना ही होगा।
2023 में Loss and Damage Fund को मंजूरी देते समय अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों में साफ किया गया कि यह व्यवस्था liability या compensation यानी कानूनी जिम्मेदारी या मुआवजे की व्यवस्था नहीं है। इसका आधार सहयोग और वित्तीय सहायता है।
इसलिए नेपाल का ‘compensation’ वाला शब्द राजनीतिक रूप से काफी प्रभावशाली है, लेकिन इसे अदालत में जाकर किसी देश से जबरन हर्जाना वसूलने के बराबर नहीं माना जा सकता।
सीधी भाषा में कहें तो—नेपाल के पास मदद और Loss and Damage फंड के लिए अंतरराष्ट्रीय आधार है, लेकिन किसी खास देश को कानूनी रूप से दोषी ठहराकर उससे मुआवजा वसूलने का सीधा अधिकार अभी नहीं है।
फिर नेपाल ने भारत, चीन और अमेरिका का नाम क्यों लिया?
नेपाल का तर्क है कि वह खुद दुनिया के बड़े कार्बन उत्सर्जकों में नहीं है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के असर का सामना सबसे ज्यादा कर रहा है।
ग्लेशियरों के पिघलने, बर्फ और चट्टानों के खिसकने, अचानक आने वाली बाढ़ और पहाड़ी इलाकों में बदलते मौसम ने नेपाल जैसे देश की मुश्किल बढ़ा दी है।
हाल की बाढ़ में भी वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने तथा उसके बाद आई भीषण बाढ़ को प्रमुख कारणों में बताया है। हालांकि किसी एक आपदा को पूरी तरह मानव-जनित जलवायु परिवर्तन का नतीजा घोषित करने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
नेपाल का कहना है कि उसकी जिम्मेदारी वैश्विक उत्सर्जन में बहुत कम है, फिर भी उसे जलवायु संकट की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
भारत के मामले में तस्वीर थोड़ी अलग है
नेपाल ने भारत को भी दुनिया के बड़े मौजूदा उत्सर्जक देशों में गिना है। यह बात कुल उत्सर्जन के आंकड़े के हिसाब से सही है। लेकिन कुल उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन एक ही बात नहीं है।
भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अमेरिका और चीन से काफी कम है। साथ ही भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि जलवायु न्याय की बात करते समय केवल आज के उत्सर्जन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और विकासशील देशों की विकास जरूरतों को भी देखा जाना चाहिए।
इसलिए अगर नेपाल की मांग को भारत के संदर्भ में देखा जाए तो मामला केवल यह नहीं है कि भारत आज कितना कार्बन उत्सर्जित करता है। सवाल यह भी होगा कि जलवायु संकट की जिम्मेदारी तय करने के लिए कौन-सा पैमाना अपनाया जाए।
यही वजह है कि नेपाल की मांग राजनीतिक और नैतिक बहस जरूर खड़ी कर सकती है, लेकिन इसे सीधे किसी एक देश की कानूनी जिम्मेदारी साबित करने वाला मामला कहना जल्दबाजी होगी।
नेपाल के लिए यह मांग इतनी जरूरी क्यों है?
नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए ऐसी आपदाएं बहुत भारी पड़ सकती हैं।
बाढ़ ने सड़क, पुल, बिजली और जलविद्युत परियोजनाओं समेत बड़े बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया है। हालिया आकलनों में पुनर्निर्माण की लागत 4 से 5 अरब डॉलर तक पहुंचने की आशंका जताई गई है, जो नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा बोझ है।
यानी नेपाल के सामने सिर्फ आज की राहत का सवाल नहीं है।
सवाल है—
टूटे पुल कौन बनाएगा?
तबाह सड़कें कौन बनाएगा?
जलविद्युत परियोजनाओं को दोबारा खड़ा करने का पैसा कहां से आएगा?
विस्थापित लोगों को फिर से बसाने का खर्च कौन उठाएगा?
और अगर ऐसी आपदाएं बार-बार आती रहीं तो नेपाल हर बार अपनी अर्थव्यवस्था से कितना पैसा निकालेगा?
यही वह जगह है जहां Loss and Damage Fund नेपाल जैसे देशों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
नेपाल की मांग का असली मतलब क्या है?
नेपाल की इस पहल को तीन स्तरों पर समझना चाहिए।
पहला—तुरंत पैसा।
नेपाल को राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्त की जरूरत है।
दूसरा—जलवायु न्याय।
नेपाल दुनिया को यह बताना चाहता है कि कम उत्सर्जन करने वाले और जलवायु संकट के प्रति ज्यादा संवेदनशील देशों को अकेले तबाही का खर्च नहीं उठाना चाहिए।
तीसरा—भविष्य की सुरक्षा।
नेपाल सिर्फ इस बाढ़ के नुकसान की भरपाई नहीं चाहता। वह चाहता है कि हिमालयी देशों को भविष्य की आपदाओं से बचाने के लिए ग्लेशियरों की निगरानी, शुरुआती चेतावनी व्यवस्था, सुरक्षित बुनियादी ढांचे और वैज्ञानिक शोध पर भी पैसा मिले।
इस अर्थ में नेपाल की पहल सिर्फ मुआवजे की मांग नहीं, बल्कि जलवायु वित्त की पूरी व्यवस्था पर सवाल है।
क्या नेपाल को पैसा मिल सकता है?
यह संभव है, लेकिन प्रक्रिया सीधे ‘भारत-चीन-अमेरिका पैसा दें’ जैसी नहीं होगी।
नेपाल ने Fund for Responding to Loss and Damage के सामने वित्तीय सहायता की मांग रखी है। इस फंड का उद्देश्य ही जलवायु परिवर्तन से प्रभावित और संवेदनशील विकासशील देशों को नुकसान से उबरने में मदद करना है।
इसलिए नेपाल की सबसे मजबूत कानूनी और संस्थागत जमीन यही है कि वह खुद को एक जलवायु-संवेदनशील विकासशील देश बताते हुए Loss and Damage की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था से सहायता मांगे।
इसके साथ-साथ नेपाल अलग-अलग देशों से राजनीतिक और नैतिक समर्थन मांग सकता है।
आगे क्या होगा?
अब असली परीक्षा नेपाल की कूटनीति की होगी।
अगर नेपाल इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र और आगामी जलवायु सम्मेलनों में मजबूती से उठाता है, तो उसे सिर्फ यह बताना होगा कि नुकसान कितना हुआ है। उसे यह भी दिखाना होगा कि इस नुकसान का कितना हिस्सा जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है, पुनर्निर्माण में कितनी रकम चाहिए और भविष्य में ऐसे नुकसान को रोकने के लिए कितनी वित्तीय सहायता जरूरी है।
दूसरी तरफ भारत, चीन और अमेरिका जैसे देश यह सवाल उठा सकते हैं कि किसी एक आपदा के लिए सीधे किसी देश की कानूनी जिम्मेदारी कैसे तय की जाए।
यही कारण है कि आने वाले समय में बहस ‘मुआवजा कौन देगा?’ से ज्यादा ‘जलवायु नुकसान का खर्च कौन उठाएगा?’ पर केंद्रित हो सकती है।
नेपाल की मांग को सिर्फ भारत, चीन और अमेरिका पर आरोप लगाने के तौर पर देखना इस पूरे मामले को बहुत छोटा कर देगा।
असल में नेपाल एक बड़ी वैश्विक बहस को सामने ला रहा है—
जिस देश का जलवायु संकट पैदा करने में योगदान बहुत कम है, अगर उसी देश को ग्लेशियर पिघलने, बाढ़, भूस्खलन और बदलते मौसम की सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है, तो उसके पुनर्निर्माण का पूरा बोझ भी क्या उसी पर होना चाहिए?
अंतरराष्ट्रीय कानून अभी किसी खास देश को सीधे मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं करता। लेकिन Loss and Damage Fund ने पहली बार यह सिद्धांत मजबूत किया है कि जलवायु आपदा से तबाह कमजोर देशों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मदद मिलनी चाहिए।
नेपाल इसी बदलती वैश्विक सोच को अब एक कदम आगे ले जाना चाहता है।
और शायद इसीलिए उसकी सबसे बड़ी मांग सिर्फ पैसा नहीं है।
नेपाल कह रहा है—इसे मदद मत कहिए, इसे जलवायु न्याय की शुरुआत मानिए।

Senior Media and strategic communication professional
उदय चंद्र सिंह


