हे युग के यात्री ! : अंशु झा
हे युग के यात्री!
हे युग के यात्री!
समय तुम्हारी प्रतीक्षा में है।
तुम आओ, अवश्य आओ—
अँधेरी रातों में उजाला करते,
मुरझाए होंठों पर मुस्कान बिखेरते हुए,
एक स्वर्णिम सुबह की तरह तुम आ जाओ।
नए उत्साह और उमंग के साथ,
अपूर्व खुशी और दृढ़ संकल्प के साथ,
बस एक बार आ जाओ।
जहाँ भूखे पेट और टूटी झोपड़ियाँ हैं,
जहाँ मानव की वेदना और चीत्कार है,
हे युग के यात्री!
तुम सबकी पुकार और स्पर्श बन जाओ।
अब मानव को दानव नहीं,
पीड़ित और पीड़क नहीं,
दासत्व का प्रतीक नहीं—
बल्कि सुंदर, शांत
और स्वाभिमान का बिंब बनाना है।
हे युग के यात्री!
समय तुम्हारी प्रतीक्षा में है।

कवियत्री

