स्वराज्य : वैदिक और आधुनिक चिंतन के परिप्रेक्ष्य में : केशवप्रसाद चौलागाईं (धर्माचार्य)
केशवप्रसाद चौलागाईं (धर्माचार्य), काठमांडू, 39 सितंबर। महात्मा गांधी का मानना था कि ‘स्वराज्य’ एक वैदिक शब्द है । इसी कारण उन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद से भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अपने लेखन, प्रवचनों और जनआंदोलनों में ‘स्वराज्य’ शब्द का व्यापक रूप से उपयोग किया । परिणामस्वरूप ‘स्वराज्य’ शब्द अत्यंत लोकप्रिय और जन–जन का प्रेरक मंत्र बन गया ।
यद्यपि महात्मा गांधी ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख नारा बनाया, तथापि भारत पर विभिन्न कालखंडों में बाहरी आक्रमण होते रहने के कारण राष्ट्रीय जागरण और आत्मसम्मान की भावना जगाने के लिए गांधी से पहले भी अनेक राजाओं और चिंतकों द्वारा ‘स्वराज्य’ की अवधारणा का उपयोग किया जाता रहा था ।
“स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” का उद्घोष करने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक तथा गोपालकृष्ण गोखले जैसे अग्रज राष्ट्रचिंतकों ने भी ‘स्वराज्य’ को राष्ट्रीय चेतना का आधार बनाया । इन्हीं विचारधाराओं से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने भी स्वराज्य को स्वतंत्रता प्राप्ति का केंद्रीय नारा बनाया ।
अंततः अहिंसा के मार्ग पर चलकर भारत ने साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की और जनता द्वारा स्वयं अपने शासन का संचालन करने की परंपरा का शुभारंभ हुआ । १५ अगस्त १९४७ को भारत स्वतंत्र हुआ, किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ ही समय बाद महात्मा गांधी की हत्या हो जाने के कारण स्वराज्य के नए अध्याय पर व्यापक चिंतन और उसके व्यावहारिक स्वरूप का विकास अपेक्षित रूप से नहीं हो सका । परिणामस्वरूप समय के साथ विभिन्न व्यक्तियों और विचारधाराओं ने अपनी–अपनी समझ के अनुसार स्वराज्य की व्याख्या और उसका अभ्यास किया ।
स्वराज्य और वेद
स्वराज्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का विचार नहीं है, बल्कि उसका मूल स्रोत वेदों में निहित है । ऋग्वेद में स्वराज्य की स्पष्ट अवधारणा प्राप्त होती है । वहाँ कहा गया है–
आ यद् वामीयचक्षसा मित्र वयं च सुरयः । व्यचिष्ठे वहुपाय्ये यतेमहि स्वराज्ये।।
इस मंत्र का आशय है कि जिस स्वराज्य का पालन व्यापक जनसमुदाय और बहुमत द्वारा किया जाता है, उस स्वराज्य में हम सब जनता के कल्याण के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहें ।
ऋग्वेद का यह कथन स्पष्ट करता है कि स्वराज्य एक वैदिक शब्द और वैदिक सिद्धांत है । इसमें प्रजातंत्र, राष्ट्रीयता और समावेशिता जैसे मूल्यों को समेटते हुए ऐसी राज्यव्यवस्था की कल्पना की गई है, जिसे प्रत्येक नागरिक अपना राज्य माने और जिसमें सबके हित का संरक्षण हो ।
वैदिक साहित्य के अनुसार दैवी शासन व्यवस्था पर असुरों और राक्षसों द्वारा बार–बार आक्रमण किए जाते थे । ऐसे समय भगवान इन्द्र के नेतृत्व में दैवी शक्तियों ने स्वराज्य की स्थापना और उसकी रक्षा के लिए संघर्ष किया तथा विजय प्राप्त की । इस ऐतिहासिक–दार्शनिक प्रसंग का उल्लेख ऋग्वेद के अनेक मंत्रों में मिलता है ।
विशेष रूप से ऋग्वेद के प्रथम मंडल के ८०वें सूक्त में, जिसके ऋषि गौतम राहुगण, देवता इन्द्र और छंद पंक्ति है, कुल १६ मंत्र हैं । इन सभी मंत्रों में स्वराज्य की स्थापना, उसके संरक्षण और इन्द्र के नेतृत्व में वृत्रासुर पर विजय का वर्णन मिलता है । यही सूक्त स्वराज्य के इतिहास, उसके आध्यात्मिक आधार और वैदिक दर्शन को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है ।
इसके साथ ही इन मंत्रों का संबंध श्रीमद्भागवत महापुराण के छठे स्कंध में वर्णित वृत्रासुर–वध की कथा से भी जुड़ता हुआ दिखाई देता है । इस प्रकार वेद और भागवत–दोनों परंपराओं में स्वराज्य की अवधारणा परस्पर संबद्ध और पूरक रूप में उपस्थित होती है ।
स्वराज्यसूक्त ः वैदिक स्वाधीनता का स्वर
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का अस्सीवाँ सूक्त (ऋग्वेद १.८०) इन्द्र के पराक्रम, वृत्र–वध, जल–मुक्ति और स्वराज्य की वैदिक संकल्पना से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है । इस सूक्त के सभी सोलह मंत्रों के अंत में “अर्चन्ननु स्वराज्यम्” पद आता है । इस कारण इसे स्वराज्य की वैदिक अवधारणा को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सूक्त माना जा सकता है । सूक्त के ऋषि गोतम राहूगण और देवता इन्द्र हैं ।
यहाँ ‘स्वराज्य’ को केवल राजनीतिक सत्ता या बाहरी स्वतंत्रता के अर्थ में सीमित करना उचित नहीं होगा । वैदिक संदर्भ में यह अपने ऊपर अपना अधिकार, सामथ्र्य की प्रतिष्ठा, शत्रु और अवरोध से मुक्ति तथा जीवनदायिनी शक्तियों के निर्बाध प्रवाह से जुड़ा हुआ दिखाई देता है । विशेषतः वृत्र द्वारा रोके गए जल का मुक्त होना स्वराज्य को अवरोध–मुक्त जीवन का प्रतीक बनाता है ।
ऋग्वेद १.८० के सोलह मंत्र
मंत्र १
इत्था हि सोम इन्मदे ब्रह्मा चकार वर्धनम् ।
शविष्ठ वज्रिन्नोजसा पृथिव्या निः शशा अहिमर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।१।।
अर्थात् सोम के उत्साह और स्तुति से इन्द्र की शक्ति बढ़ती है । हे अत्यंत शक्तिशाली वज्रधारी इन्द्र ! अपने बल से पृथ्वी को रोकने वाले अहि अर्थात् वृत्र को परास्त करो और अपने स्वराज्य की प्रतिष्ठा करो । यहाँ स्वराज्य उस शक्ति का प्रतीक है जिसमें बाहरी अवरोध हटाकर जीवन और व्यवस्था को पुनः स्थापित किया जाता है ।
मंत्र २
स त्वामदद्वृषा मदः सोमः श्येनाभृतः सुतः ।
येना वृत्रं निरद्भ्यो जघन्थ वज्रिन्नोजसार्चन्ननु स्वराज्यम् ।।२।।
अर्थात् श्येन द्वारा लाया गया और विधिपूर्वक तैयार किया गया सोम इन्द्र को शक्ति प्रदान करता है । उसी शक्ति से इन्द्र ने वृत्र को मारकर जल को उसके बंधन से मुक्त किया । यहाँ वृत्र–वध केवल किसी शत्रु की पराजय नहीं, बल्कि जीवन के स्रोतों को बंधन से मुक्त करने की प्रक्रिया है ।
मंत्र ३
प्रेह्यभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यंसते ।
इन्द्र नृम्णं हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।३।।
अर्थात् हे इन्द्र! आगे बढ़ो, निर्भय होकर संघर्ष करो । तुम्हारा वज्र कभी निष्फल नहीं होता । वृत्र का वध करो और उसके द्वारा रोके गए जल को मुक्त करो । इस मंत्र में स्वराज्य के लिए साहस, संघर्ष और अवरोध–विनाश को आवश्यक माना गया है ।
मंत्र ४
निरिन्द्र भूम्या अधि वृत्रं जघन्थ निर्दिवः ।
सृजा मरुत्वतीरव जीवधन्या इमा अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।४।।
अर्थात् हे इन्द्र ! पृथ्वी और आकाश से वृत्र को दूर करो और मरुतों से युक्त इन जीवनदायिनी जलधाराओं को मुक्त करो । यहाँ जल केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि जीवन, समृद्धि और सामाजिक गतिशीलता का प्रतीक भी है । अतः स्वराज्य का अर्थ जीवन के मूल स्रोतों को अवरोध से मुक्त करना भी है ।
मंत्र ५
इन्द्रो वृत्रस्य दोधतः सानुं वज्रेण हीकिकतः ।
अभिक्रम्याव जिघ्नतेऽपः सर्माय चोदयन्नर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।५।।
अर्थात् इन्द्र ने क्रुद्ध और शक्तिशाली वृत्र के उठे हुए भाग पर वज्र से प्रहार किया और उसे पराजित कर जल को मुक्त किया । यहाँ इन्द्र सक्रिय शक्ति के रूप में उपस्थित हैं । स्वराज्य निष्क्रिय अवस्था से प्राप्त नहीं होता; उसके लिए अन्याय, भय और अवरोध के विरुद्ध निर्णायक कर्म आवश्यक है ।
मंत्र ६
अधि सानौ नि जिघ्नते वज्रेण शतपर्वणा ।
मन्दान इन्द्रो अन्धसः सखिभ्यो गातुमिच्छत्यर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।६।।
अर्थात् इन्द्र अपने बहु–शक्तिशाली वज्र से वृत्र पर प्रहार करते हैं । सोम से उत्साहित इन्द्र अपने मित्रों के लिए मार्ग और समृद्धि प्राप्त करना चाहते हैं । इस मंत्र में स्वराज्य का उद्देश्य व्यक्तिगत प्रभुत्व नहीं, बल्कि सामूहिक हित के लिए मार्ग प्रशस्त करना है ।
मंत्र ७
इन्द्र तुभ्यमिदद्रिवोऽनुत्तं वज्रिन्वीर्यम् ।
यद्ध त्यं मायिनं मृगं तमु त्वं माययावधीरर्चन्ननु स्वराज्यम्।।७।।
अर्थात् हे वज्रधारी इन्द्र! तुम्हारा पराक्रम अतुलनीय है । तुमने मायावी और छलपूर्ण वृत्र का उसी की माया से सामना करके उसका वध किया । इसका दार्शनिक संकेत यह है कि स्वराज्य की स्थापना के लिए केवल बाहरी बल पर्याप्त नहीं; विवेक और रणनीतिक बुद्धि भी आवश्यक है ।
मंत्र ८
वि ते वज्रासो अस्थिरन्नवतिं नाव्या अनु ।
महत्त इन्द्र वीर्यं बाह्वोस्ते बलं हितमर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।८।।
अर्थात् इन्द्र के वज्र अनेक दिशाओं में प्रकट होते हैं और वृत्र द्वारा रोकी गई नदियों को मुक्त करते हैं । ऋचा इन्द्र के बाहुबल और पराक्रम की प्रशंसा करती है । यहाँ स्वराज्य का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष सामने आता है–संसाधनों का मुक्त और स्वाभाविक प्रवाह ।
मंत्र ९
सहस्रं साकमर्चत परि ष्टोभत विंशतिः ।
शतैनमन्वनोनवुरिन्द्राय ब्रह्मोद्यतमर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।९।।
अर्थात् अनेक लोग एकत्र होकर इन्द्र की स्तुति करते हैं और सामूहिक रूप से उनके पराक्रम का समर्थन करते हैं । इससे स्वराज्य का एक और आयाम सामने आता है–सामूहिक सहभागिता । कोई भी व्यवस्था केवल एक व्यक्ति के बल पर स्थायी नहीं होती; समाज की सक्रिय चेतना और सहयोग आवश्यक है ।
मंत्र १०
इन्द्रो वृत्रस्य तविषीं निरहन्सहसा सहः ।
महत्तदस्य पौंस्यं वृत्रं जघन्वाँ असृजदर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।१०।।
अर्थात् इन्द्र ने अपने महान् बल से वृत्र की शक्ति को नष्ट किया । वृत्र का वध करके उन्होंने उस अवरुद्ध व्यवस्था को तोड़ा । इस मंत्र में स्वराज्य का मूल अर्थ असत्य, अवरोध और दमनकारी शक्ति पर विजय के रूप में उभरता है ।
मंत्र ११
इमे चित्तव मन्यवे वेपेते भियसा मही ।
यदिन्द्र वज्रिन्नोजसा वृत्रं मरुत्वाँ अवधीरर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।११।।
अर्थात् जब इन्द्र ने अपने वज्र और शक्ति से वृत्र का वध किया, तब पृथ्वी और अन्य महान् शक्तियाँ भी उसके पराक्रम से प्रभावित हुईं । यह दृश्य बताता है कि अधर्म और अवरोध का अंत व्यापक परिवर्तन उत्पन्न करता है । स्वराज्य केवल सत्ता–परिवर्तन नहीं, बल्कि भयमुक्त वातावरण की स्थापना है ।
मंत्र १२
न वेपसा न तन्यतेन्द्रं वृत्रो वि बीभयत् ।
अभ्येनं वज्र आयसः सहस्रभृष्टिरायतार्चन्ननु स्वराज्यम् ।।१२।।
अर्थात् वृत्र अपने भयावह रूप और शक्ति से इन्द्र को विचलित नहीं कर सका । इन्द्र ने लोहे के समान दृढ़ और प्रचंड वज्र से उस पर आक्रमण किया । यह मंत्र स्वराज्य के लिए निर्भीकता और मानसिक दृढ़ता का संदेश देता है । बाहरी शत्रु से पहले भय को जीतना आवश्यक है ।
मंत्र १३
यद्वृत्रं तव चाशनिं वज्रेण समयोधयः ।
अहिमिन्द्र जिघांसतो दिवि ते बद्बधे शवोऽर्चन्ननु स्वराज्यम् ।।१३।।
अर्थात् हे इन्द्र! जब तुमने वृत्र का अपने वज्र से सामना किया, तब तुम्हारी शक्ति आकाश में भी प्रतिष्ठित हुई । यहाँ वज्र केवल युद्ध का हथियार नहीं, बल्कि सत्य और व्यवस्था की पुनस्र्थापना करने वाली शक्ति का प्रतीक बन जाता है ।
मंत्र १४
अभिष्टने ते अद्रिवो यत्स्था जगच्च रेजते ।
त्वष्टा चित्तव मन्यव इन्द्र वेविज्यते भियार्चन्ननु स्वराज्यम् ।।१४।।
अर्थात् इन्द्र के प्रचंड घोष और पराक्रम से समस्त जगत् कंपित होता है । यहाँ तक कि त्वष्टा भी इन्द्र के क्रोध और शक्ति से भयभीत होता है । वैदिक काव्य में यह अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण इन्द्र की सर्वोच्च युद्धशक्ति को प्रकट करता है ।
मंत्र १५
नहि नु यादधीमसीन्द्रं को वीर्या परः ।
तस्मिन्नृम्णमुत क्रतुं देवा ओजांसि सं दधुरर्चन्ननु स्वराज्यम्।। १५।।
अर्थात् हम इन्द्र से बढ़कर किसी दूसरे वीर को नहीं जानते । देवताओं ने इन्द्र में सामथ्र्य, संकल्प और शक्ति को स्थापित किया है । इस मंत्र में स्वराज्य के लिए आवश्यक नेतृत्व–गुणों–वीरता, संकल्प, सामथ्र्य और उत्तरदायित्व–का संकेत मिलता है ।
मंत्र १६
यामथर्वा मनुष्पिता दध्यङ्धियमत्नत ।
तस्मिन्ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्र उक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम् ।।१६।।
अर्थात् अथर्वा, मनु और दध्यङ् जैसे प्राचीन ऋषियों ने जिस ज्ञान–चिंतन और साधना को विकसित किया, उसी परंपरा में इन्द्र से संबंधित ब्रह्म और स्तोत्र प्रतिष्ठित हुए । सूक्त का अंतिम मंत्र स्वराज्य को केवल राजनीतिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, परंपरा, साधना और चेतना से जुड़ी अवस्था के रूप में देखने का अवसर देता है ।
इन सोलह मंत्रों को समग्र रूप से देखने पर स्वराज्य की वैदिक अवधारणा के कई स्तर सामने आते हैं–
– अवरोध से मुक्ति– वृत्र द्वारा रोके गए जल का मुक्त होना ।
– निर्भयता– शत्रु के सामने पीछे न हटना ।
– सामथ्र्य– वज्र और पराक्रम के माध्यम से संकट का सामना करना ।
– सामूहिक कल्याण– मुक्त जल और मार्ग को समाज के हित में उपलब्ध कराना ।
– विवेक– मायावी शक्ति का सामना केवल बल से नहीं, बुद्धि से करना ।
– नेतृत्व– इन्द्र में वीर्य, क्रतु और ओज का समन्वय ।
– ज्ञान–परंपरा– अंतिम मंत्र में अथर्वा, मनु और दध्यङ् का स्मरण ।
इस प्रकार ऋग्वैदिक स्वराज्य में ‘स्व’ केवल व्यक्ति नहीं है । वह व्यक्ति, समाज, प्रकृति और व्यापक ऋत–व्यवस्था के मध्य संतुलन स्थापित करने वाली चेतना है ।
वृत्रासुर–वध ः वैदिक प्रतीक और दार्शनिक अर्थ
ऋग्वेद १.८० में वृत्र इन्द्र का प्रतिपक्षी है । उसका प्रमुख कार्य जल को रोकना है । इसलिए इन्द्र द्वारा वृत्र–वध का परिणाम केवल शत्रु की मृत्यु नहीं, बल्कि जल का पुनः प्रवाह है । ऋग्वेद के चौथे मंत्र में स्पष्ट रूप से इन्द्र से जीवनदायिनी जलधाराओं को मुक्त करने का आह्वान किया गया है ।
‘वृत्र’ शब्द की प्रतीकात्मक व्याख्या ‘आवरण’ अथवा ‘अवरोध’ की दिशा में की जा सकती है । इस दृष्टि से वृत्र वह शक्ति है जो जीवन के स्वाभाविक प्रवाह को रोकती है । इन्द्र का वज्र उस अवरोध को भेदने वाली चेतना और शक्ति का प्रतीक बन जाता है ।
इसलिए वृत्र–वध को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है–
– प्राकृतिक स्तर पर– वर्षा और जल के मुक्त प्रवाह के रूप में ।
– सामाजिक स्तर पर– भय, दमन और अवरोध से मुक्ति के रूप में ।
– आध्यात्मिक स्तर पर– अज्ञान, जड़ता और आंतरिक बंधनों को तोड़ने के रूप में ।
इसी बिंदु पर स्वराज्य और वृत्र–वध एक–दूसरे से जुड़ते हैं । जहाँ प्रवाह अवरुद्ध है, वहाँ स्वराज्य अधूरा है; और जहाँ जीवनदायिनी शक्तियाँ निर्बाध प्रवाहित होती हैं, वहाँ स्वराज्य का वास्तविक अर्थ साकार होता है ।
ऋग्वेद से श्रीमद्भागवत तक ः वृत्र की कथा का रूपांतरण
वृत्रासुर की कथा बाद के पुराण–साहित्य में एक नया दार्शनिक आयाम ग्रहण करती है । विशेष रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कन्ध में वृत्रासुर की कथा केवल इन्द्र और असुर के युद्ध की कथा नहीं रह जाती, बल्कि भक्ति, वैराग्य और भगवत्प्राप्ति की कथा बन जाती है ।
भागवत के षष्ठ स्कन्ध के नवम अध्याय में वृत्रासुर की उत्पत्ति का प्रसंग आता है । त्वष्टा के तप से उत्पन्न वह विराट शक्ति अपने स्वरूप से लोकों को ढक लेती है; इसी कारण उसे ‘वृत्र’ कहा जाता है । देवता उसके सामने अपने अस्त्रों से संघर्ष करते हैं और अंततः भगवान् की शरण ग्रहण करते हैं ।
यहाँ से कथा ऋग्वैदिक वृत्र–वध की स्मृति को बनाए रखते हुए उसका आध्यात्मिक विस्तार करती है ।
दधीचि, वज्र और वृत्रासुर
श्रीमद्भागवत में देवताओं के संकट के समाधान के लिए दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र का निर्माण किया जाता है । इस प्रकार ऋग्वेद के इन्द्र–वज्र का पुराणिक आख्यान में एक विशिष्ट विकास दिखाई देता है ।
वज्र अब केवल इन्द्र का युद्धास्त्र नहीं रहता; उसमें ऋषि के त्याग, तपस्या और आत्मसमर्पण की शक्ति भी समाहित हो जाती है ।
इसका गहरा दार्शनिक अर्थ है–अधर्म या अवरोध के विनाश के लिए केवल बाहरी शक्ति पर्याप्त नहीं; उसके पीछे त्याग, तप, ज्ञान और लोककल्याण की भावना भी आवश्यक है ।
भागवत का वृत्रासुर ः असुर शरीर में भक्त चेतना
श्रीमद्भागवत का सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि वृत्रासुर को केवल दैत्य या विनाशकारी शक्ति के रूप में नहीं दिखाया गया । युद्धभूमि में खड़ा वृत्रासुर भगवान् का अनन्य भक्त दिखाई देता है ।
षष्ठ स्कन्ध, अध्याय ११ में वृत्रासुर इन्द्र को युद्ध के लिए चुनौती देता है और अपने वध को भी भगवान् की प्राप्ति का साधन मानता है । वह कहता है कि यदि इन्द्र के वज्र से उसका शरीर नष्ट हो जाए तो वह महापुरुषों की चरण–रज प्राप्त कर सकेगा । वह इन्द्र से भगवान् की शक्ति से युक्त वज्र का प्रयोग करने का आग्रह भी करता है ।
वृत्रासुर की यह स्थिति वैदिक वृत्र की तुलना में एक महत्वपूर्ण दार्शनिक परिवर्तन प्रस्तुत करती है ।
ऋग्वेद में– वृत्र मुख्यतः अवरोधकारी शक्ति है ।
भागवत में– वृत्रासुर बाह्य रूप से विरोधी, किंतु आंतरिक रूप से भगवद्भक्त है ।
अर्थात् पुराणकार ने कथा को बाहरी संघर्ष से उठाकर अंतरात्मा के संघर्ष तक पहुँचा दिया है ।
वृत्रासुर की प्रार्थना ः स्वराज्य से भगवद्राज्य की ओर
भागवत में वृत्रासुर की प्रार्थना इस कथा को एक अद्भुत आध्यात्मिक ऊँचाई देती है । वह स्वर्ग, पृथ्वी के राज्य, भौतिक संपत्ति अथवा योगसिद्धियों की अपेक्षा भगवान् के चरणों की सेवा चाहता है । उसका मन भगवान् के गुणों का स्मरण करे, उसकी वाणी भगवान् का गुणगान करे और उसका शरीर भगवान् की सेवा में लगा रहे–यही उसकी कामना है ।
यहीं वैदिक ‘स्वराज्य’ और भागवत के ‘ भगवदाश्रय’ के बीच एक गहरा दार्शनिक संवाद स्थापित किया जा सकता है ।
ऋग्वेद में इन्द्र वृत्र को पराजित करके जल का प्रवाह पुनः स्थापित करता है । भागवत में वृत्रासुर स्वयं अपने अहं और देहाभिमान से ऊपर उठकर भगवान् के चरणों में समर्पित होता है ।
इस दृष्टि से–
वेद का स्वराज्य → बाहरी और आंतरिक अवरोधों से मुक्ति ।
भागवत की भक्ति → अहंकार और सांसारिक आसक्ति से मुक्ति ।
दोनों का अंतिम लक्ष्य मनुष्य को बंधन से मुक्त करना है ।
वृत्र–वध ः पराजय नहीं, मुक्ति
श्रीमद्भागवत की कथा में एक विलक्षण विरोधाभास दिखाई देता है–जिसे देवताओं का शत्रु माना गया, वही वृत्रासुर भगवान् का अनन्य भक्त सिद्ध होता है । वह मृत्यु से भयभीत नहीं है, क्योंकि उसके लिए मृत्यु देह का अंत है, आत्मिक यात्रा का अंत नहीं ।
वह इन्द्र के वज्र को अपने लिए भगवान् की कृपा का साधन मानता है । इस प्रकार वृत्र–वध की वैदिक कथा भागवत में एक नई अर्थवत्ता ग्रहण करती है ।
ऋग्वेद में इन्द्र का वज्र वृत्र के अवरोध को तोड़ता है । भागवत में वही वज्र वृत्रासुर के देह–बन्धन को समाप्त करने का माध्यम बनता है ।
यह परिवर्तन भारतीय धार्मिक चिंतन की उस विशिष्ट परंपरा को व्यक्त करता है जिसमें बाहरी युद्ध धीरे–धीरे आंतरिक मुक्ति के रूपक में परिवर्तित हो जाता है ।
स्वराज्य की व्यापक दार्शनिक परिणति
ऋग्वेद १.८० के सोलह मंत्रों को यदि एक क्रम में पढ़ा जाए तो एक विचार–यात्रा दिखाई देती है–
सोम से शक्ति → शक्ति से साहस → साहस से संघर्ष → संघर्ष से वृत्र–वध → वृत्र–वध से जल–मुक्ति → जल–मुक्ति से जीवन → जीवन से सामूहिक समृद्धि → और अंततः स्वराज्य ।
भागवत इस यात्रा को और भीतर ले जाता है–
बाहरी वृत्र → आंतरिक वृत्र → अहंकार का क्षय → भगवत्स्मरण → समर्पण → मुक्ति ।
इसलिए स्वराज्य को केवल विदेशी शासन से मुक्ति की आधुनिक राजनीतिक संज्ञा में बाँधना वैदिक अर्थ की पूर्णता को सीमित कर देता है । आधुनिक राजनीतिक स्वराज्य निश्चय ही उसका एक महत्त्वपूर्ण रूप है, परंतु वैदिक चिंतन में उसका आधार अधिक व्यापक है–मनुष्य अपने जीवन, विचार, कर्म और सामूहिक व्यवस्था का स्वामी बने तथा किसी अन्यायपूर्ण अवरोध का दास न रहे ।
यही कारण है कि ऋग्वेद का ‘स्वराज्य’ आगे चलकर भारतीय राजनीतिक और दार्शनिक चिंतन में अनेक नए अर्थ ग्रहण करने की क्षमता रखता है ।
स्वराज्य और नेपाल
भगवान इन्द्र वेद के प्रमुख देवता हैं । नेपाल में इन्द्र जात्रा तथा इन्द्रेश्वर महादेव की महत्ता के साथ पूजा–अर्चना की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है । स्वराज्य के नायक के रूप में इन्द्र की प्रतिष्ठा को देखते हुए नेपाल को स्वराज्य के दार्शनिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के रूप में देखा जा सकता है ।
विश्वभर के हिंदू धर्मावलंबियों की आस्था के केंद्र भगवान पशुपतिनाथ के मंदिर में नित्य पारायण होने वाली रुद्री (रुद्राष्टाध्यायी) में इन्द्रसूक्त का पारायण भी भगवान इन्द्र के गुणगान की परंपरा को जीवित रखता है । “ॐ यो वै रुद्रः स भगवान् यश्चेन्द्रस्तस्मै वै नमो नमः” कहते हुए शिव अथर्वशीर्ष के पारायण से भी भगवान इन्द्र का स्थान उच्च बना हुआ है ।
ललितपुर जिला, महालक्ष्मी नगरपालिका–३, अर्याल टोल स्थित इन्द्रेश्वर महादेव को केंद्र बनाकर संचालित होने वाली “स्वराज्य पूजन तथा यात्रा” भी भगवान इन्द्र और स्वराज्य की परंपरा को जीवंत बनाए हुए है ।
भाद्र शुक्ल चतुर्थी के दिन बिष्ट टोल स्थित लाल गणेश की पूजा से प्रारंभ होने वाली यह स्वराज्य पूजन यात्रा ललितादेवी, सत्येश्वर महादेव, सत्यदेवी, मुचुकुन्द नाग, गौरामहेश्वर, सप्तऋषि, हनुमान तथा नवग्रहों की पूजा–अर्चना करते हुए अर्याल टोल स्थित इन्द्रेश्वर महादेव तथा पैनाचल हनुलिङ्गेश्वर महादेव तक पहुँचती है और पुनः बोझे पोखरी में आकर इसका समापन होता है ।
इस प्रकार यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि स्थानीय सांस्कृतिक स्मृति, सामुदायिक सहभागिता और स्वराज्य की वैदिक भावना को एक साथ जोड़ने वाली परंपरा के रूप में विकसित हो रही है ।
स्वराज्य भागवत ः समाज–रूपांतरण का नवीन प्रयोग
स्वराज्य भागवत का अभ्यास भी नेपाल से प्रारंभ हुई एक नवीन परंपरा है । “सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे । तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः।।” इस मंगलाचरण के साथ समुदाय के बीच प्रारंभ किया जाने वाला स्वराज्य भागवत धीरे–धीरे समाज–रूपांतरण के एक प्रमुख साधन के रूप में विकसित हो रहा है ।
सुशासन, मेल–मिलाप, सामाजिक न्याय जैसे जनसरोकार के विषयों में संविधान और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप जागृति उत्पन्न करते हुए यह परंपरा धर्म और समाज को साथ–साथ लेकर चलने में सहायता कर रही है । बाहरी सांस्कृतिक प्रभावों से अपनी मौलिक सांस्कृतिक चेतना की रक्षा करते हुए सभी वर्गों को अपना मानने वाली स्वराज्य की भावना विकसित करने में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है ।
विभिन्न विचारों और संस्कृतियों के बीच पले–बढ़े समुदायों के बीच “मिलाप गीत” की धुन स्वराज्य भागवत की साझा महिमा को स्पष्ट करती है । महेश प्रसाई द्वारा लिखित तथा रामजी नेपाली द्वारा स्वर और संगीत से सजाया गया यह मिलाप गीत स्वराज्य की धड़कन के रूप में स्थापित हो रहा है–
चिन्मय जीवन स्वराज्य होस्
बान्धव दिलसँगै साथ होस्
सतराग अनुराग होस्
मिलाप होस्, प्रेमालाप होस्।।
धर्ती रज उष्ण प्राणी जाति
सूर्य र चन्द्र खगोल माथि
वसुधैव कुटुम्ब होस्
मिलाप होस्, प्रेमालाप होस् ।।
मन्मय आँगन आलोक होस्
चेतनज्योति सधैँ बास होस्
सृष्टि सार रस रास होस्
मिलाप होस्, प्रेमालाप होस् ।।
इन पंक्तियों में स्वराज्य को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के रूप में नहीं, बल्कि चिन्मय जीवन, बंधुत्व, अनुराग, मिलाप और विश्वबंधुत्व की चेतना के रूप में प्रस्तुत किया गया है । इस अर्थ में नेपाल स्वराज्य और मेल–मिलाप की वैदिक भूमि के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान निर्मित कर सकता है ।
सिद्ध मंत्र और स्वराज्य भागवत
स्वराज्य को जनमानस में स्थापित करने के लिए सिद्ध साधना के माध्यम से सिद्ध मंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है । श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित सिद्ध मंत्रों के संपुटित पुरश्चरण की साधना के प्रभाव से स्वराज्य भागवत को अधिक प्रभावकारी और लाभकारी बनाने की परिकल्पना की गई है–
“ॐ ततश्चाविरभूत् साक्षाच्छ्रीरमा भगवत्परा ।
रञ्जयन्ती दिशः कान्त्या विद्युत् सौदामनी यथा ।।”
इसी प्रकार श्रीमद्भागवत की यह मान्यता है–
“श्रीमद्भागवतशास्त्रं यत्र भागवतैर्यदा ।
कीत्र्यते श्रूयते चापि श्रीकृष्णस्तत्र निश्चितम् ।।”
अर्थात् जहाँ भगवान के भक्त श्रीमद्भागवत शास्त्र का कीर्तन और श्रवण करते हैं, वहाँ भगवान श्रीकृष्ण साक्षात् रूप में विराजमान रहते हैं–इस मान्यता को आत्मसात् करते हुए स्वराज्य दर्शन भगवान और भक्त के संबंध के साथ–साथ एक नई विश्वव्यवस्था की आधारभूमि के रूप में विकसित हो रहा है ।
यहाँ स्वराज्य का आशय केवल शासन–व्यवस्था से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर आत्मशासन, समाज में न्याय, समुदायों के बीच मेल–मिलाप और समस्त सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व से है ।
सांस्कृतिक कूटनीति और स्वराज्य
स्वराज्य दर्शन, स्वराज्य भागवत तथा स्वराज्य पूजन एवं यात्रा जैसे नवीन अभ्यासों के कारण नेपाल–भारत सांस्कृतिक कूटनीति के लिए भी स्वराज्य एक प्रभावी माध्यम बन सकता है । सौम्य शक्ति (क्यात एयधभच) के रूप में स्वराज्य दर्शन और उसके सांस्कृतिक अभ्यास दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक समझ को और गहरा करने में सहायक हो सकते हैं ।
विश्वविद्यालयों में प्राज्ञिक विमर्श, विद्यालयों की पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से पठन–पाठन तथा धार्मिक प्रवचनों के माध्यम से स्वराज्य की अवधारणा नेपाल और भारत के बीच एक साझा सांस्कृतिक आधार निर्मित कर सकती है ।
सभ्यता–संवाद के वैश्विक अभियान में आर्यावर्त की अवधारणा को प्राथमिकता के साथ प्रस्तुत करने से हिमालय से समुद्र तक फैली सांस्कृतिक एकता को एक नए विमर्श के रूप में सामने लाया जा सकता है । चीन की प्राथमिकता में रहे न्यिदब िऋष्खष्ष्शिबतष्यल क्ष्लष्तष्बतष्खभ की तरह स्वीकार्य बन सकने वाली आर्यावर्त की अवधारणा “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” अर्थात् “विश्व को सभ्य बनाओ” के आदर्श को वैश्विक स्तर पर साझा करने का आधार बन सकती है ।
“आर्यावर्तः पुण्यभूमिर्मध्यं विन्ध्यहिमालयोः” सूत्र को मुक्तिनाथ–कन्याकुमारी–द्वारका–बद्रीनाथ सांस्कृतिक पदयात्रा के माध्यम से सिद्ध करने की परिकल्पना नेपाली नेतृत्व और ज्ञान–परंपरा के सम्मान को और व्यापक बना सकती है ।
यह सांस्कृतिक यात्रा केवल भौगोलिक दूरी को पार करने का प्रयास नहीं, बल्कि हिमालय से समुद्र तक फैली साझा सभ्यता, आस्था, दर्शन और सांस्कृतिक स्मृतियों को जोड़ने का प्रतीक बन सकती है ।
निष्कर्ष ः
स्वराज्य और मेल–मिलाप–भावी विश्व की आधारभूमि
ऋग्वेद १.८० का स्वराज्यसूक्त भारतीय स्वतंत्रता–चेतना की प्राचीन वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है । इसके सोलहों मंत्रों में बार–बार आने वाला “अर्चन्ननु स्वराज्यम्” केवल विजय का उद्घोष नहीं, बल्कि शक्ति, साहस, ज्ञान, सामाजिक हित और अवरोध–मुक्त जीवन की आकांक्षा का संकेत है ।
वृत्रासुर–वध इस अवधारणा का केंद्रीय प्रतीक है । ऋग्वेद में इन्द्र वृत्र का वध करके जल को मुक्त करते हैं; श्रीमद्भागवत में यही कथा भक्ति और आत्मसमर्पण के उच्चतर आध्यात्मिक अर्थ तक पहुँचती है । भागवत का वृत्रासुर बाहरी रूप से इन्द्र का शत्रु होते हुए भी भीतर से भगवान् का भक्त है ।
इस प्रकार वैदिक स्वराज्य की यात्रा को प्रकृति की मुक्ति से मनुष्य की मुक्ति और अंततः आत्मा की मुक्ति तक विस्तृत रूप में देखा जा सकता है । यही भारतीय चिंतन में स्वराज्य की अवधारणा की मौलिक व्यापकता है ।
स्वराज्य का वैदिक अर्थ बाहरी सत्ता से मुक्ति के साथ–साथ आत्मशासन, आत्मसम्मान, न्याय, सामाजिक समरसता और लोककल्याण से जुड़ा हुआ है । नेपाल की इन्द्र–परंपरा, इन्द्र जात्रा, इन्द्रेश्वर महादेव की पूजा, पशुपतिनाथ में रुद्री–पारायण तथा स्वराज्य पूजन एवं यात्रा जैसी जीवंत सांस्कृतिक परंपराएँ इस वैदिक चेतना को वर्तमान से जोड़ती हैं ।
स्वराज्य भागवत इस चेतना को और व्यापक बनाते हुए धर्म को सामाजिक उत्तरदायित्व, सुशासन, न्याय और मेल–मिलाप के साथ जोड़ने का प्रयास करता है । इसके केंद्र में ऐसी सामाजिक चेतना है जिसमें धर्म विभाजन का नहीं, मिलन का माध्यम बने; संस्कृति संघर्ष का नहीं, संवाद का माध्यम बने; और स्वराज्य केवल शासन की अवधारणा न रहकर मानव–मुक्ति और विश्वबंधुत्व की चेतना बने ।
इसी व्यापक अर्थ में कहा जा सकता है–
स्वराज्य केवल स्वतंत्रता नहीं, आत्मचेतना है ।
स्वराज्य केवल शासन नहीं, आत्मशासन है ।
स्वराज्य केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है ।
और स्वराज्य केवल राष्ट्र का प्रश्न नहीं, समूची मानवता के मेल–मिलाप का संकल्प है ।
नेपाल की धरती पर विकसित हो रही स्वराज्य की यह वैदिक–सांस्कृतिक चेतना भारत के साथ उसके ऐतिहासिक संबंधों को एक नवीन दार्शनिक आधार दे सकती है और विश्व के सामने “स्वराज्य और मेल–मिलाप” को भावी विश्व–व्यवस्था के एक मानवीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकती है ।
स्वराज्य हो–चिन्मय जीवन का ।
स्वराज्य हो–मानव–मर्यादा का ।
स्वराज्य हो–सामाजिक न्याय का ।
स्वराज्य हो–विश्वबंधुत्व का ।
और मिलाप हो–मानव से मानव का, संस्कृति से संस्कृति का, राष्ट्र से राष्ट्र का ।


