आज शारदीय नवरात्रि का दूसरा दिन, माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चंना
काठमांडू, आश्विन २६ – “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।”
आज शारदीय नवरात्रि का दूसरा दिन यानी माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चंना । नवदुर्गा का यह दूसरा रूप है ं। ये तप, त्याग, वैराग्य, संयम और सदाचार की देवी है ं। उनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है।
भक्त इस दिन अपने मन को मां के चरणों में लगाते हैं । ब्रह्मचारिणी का शाब्दिक अर्थ में जाए तो पाते हैं कि – ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली. इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली । मां दुर्गा का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्त फल देने वाला है । इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है । ऐ्से भक्तों का जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन कर्तव्य–पथ से विचलित नहीं होता है ।
मान्यता है कि जब मानव कठिन क्षणों में होता है और माँ ब्रह्मचारिणी की पूरे श्रद्धा और विश्वास से पूजा अर्चना करता है तो माँ उनपर प्रसन्न होकर उनके कष्टों को हर लेती हैं । सबलता प्रदान करती हैं माँ ब्रह्मचारिणी ।
माँ ब्रह्मचारिणी को सफेद और गुलाबी रंग अति प्रिय है । इसलिए इस दिन भक्तों सफेद या गुलाबी वस्त्र पहनना चाहिए । यह बहुत शुभ माना जाता है । इसी तरह माँ को कमल और गुड़हल के फूल बहुत प्रिय हैं । इसके अलावा माँ को चमेली का फूल भी अति प्रिय है ।
माँ ब्रह्मचारिणी को शक्कर, मिश्री, पंचामृत तथा दूध से बने व्यंजनों का भोग लगाया जाता है । मान्यता है कि शक्कर का भोग लगाने से लंबी आयु और सौभाग्य प्राप्त होता है ।
माँ ब्रह्मचारिणी की कथा –
माँ ब्रह्मचारिणी ने पूर्वजन्म में हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी । इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी का नाम दिया गया । कहते हैं देवी ने एक हजार वर्ष तक केवल फल–फूल खाकर बिताए । देवी के कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें पत्नी रुप में स्वीकार किया था ।


