प्रधानमन्त्री जी !आपकी महिमा का वर्णन, हजार मुख वाले शेषनाग भी नहीं कर सकते : गंगेश मिश्र
गंगेश मिश्र, कपिलबस्तु , 18 नोभेम्बर ।
” निर्दल ” के साथ चला था जो, अब पहरेदार हमारा है।
” बहुदल ” जीता भले आज, पर प्रजातन्त्र तो हारा ।
क्षमा करें प्रधानमन्त्री जी !आपकी महिमा का वर्णन, हजार मुख वाले शेषनाग भी नहीं कर सकते। मैं तो एक अदना सा तुच्छ मानव मात्र हूँ। फिर भी अपने क्षमतानुसार, आपकी महिमा प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता हूँ। सर ! देश की सारी समस्याएं आपकी सु मधुर वाणी के उर्वर भूमि से उपजी हैं। आपने मधेश के निवासियों की तुलना आम से की बहुत अच्छा लगा, आपको तो चिकित्सक
ने करैले का जूस, पीने को कहा होगा। शायद जुबान इसी लिए कड़वी हो गई होगी, इसमें आप का क्या दोष।
अभी-अभी पता चला कि बहुदल- निर्दल में से जब एक को चुनना हुआ, तो आप निर्दल के साथ हो लिए; इसमें भी आपका दोष नहीं है। आपने सोचा होगा कौन धँसने जाय दल के दलदल में।
पर देखिए ईश्वर की महिमा, आज आप उसी दलदल की शोभा बढ़ा रहे हैं।चिल्लाने वाले चिल्ला रहे हैं, आप कान में ” ईयर- फोन ” लगा कर ” एफ एम ” पर समाचार सुन रहे हैं। दो- चार लोगों के चिल्लाने से सुनाई भी तो नहीं देता।
कहीं मैंने पढ़ा था कि जब आप जेल में थे, तो वहाँ के कैदियों को
अंग्रेजी पढ़ाते थे। मैं तो हाई स्कूल में मुश्किल से पढ़ पाता था, बड़ा ज़ालिम विषय है। पल्ले ही नहीं पड़ता पर आपने यह मैदान भी मार लिया , चतुराई में आप का सानी नहीं है, पार्टी में दो शेरों के बीच में ऐसा झपट्टा मारा कि उनका निवाला छीन लिया। दोनों शेर हक्के-बक्के रह गये। आप तीसरे थे, पहले पर आ गये। निशाना तो आप का शानदार है -(599/600 )
बन्दूक भैया सुशील जी के कंधे पर, धाँय (गोली चली) गोली प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर और भैया सुशील धरती पर। वाह क्या बात है।
आप में दयालुता कूट- कूट कर भरी है, इन मडिया वालों को क्या पड़ी है। कहते हैं, आपने डेढ़ महीने में चार लाख का नाश्ता किया। सबके सब पागल हैं, आपको तला भुना, तेल, मसाला खाना ही नहीं है। फिर आप कैसे इतना खा सकते हो।
ऐसी बहुत सारी बातें थीं , पर अब नींद आ रही है अब शेष कल। अंत में इतना ही कहना है।
वाह ! वाह! क्या बात है, दूध की रखवाली बिल्ली के हाथ है।
•••••••••••••••••••••गंगेश मिश्र


