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नेपाल अंतिम साँस ले रहा है

 
आंदोलन से मधेश में पहाड़ी दल की बुनियाद हिल गई है, वही जनमानस में मधेशियत मजबूत हुई है। आंदोलन जितना लम्बा चलेगा पहाड़ी दल कमजोर और मधेश मजबूत होगा। नेपाल गरीब होता जा रहा है और ओली सरकार भूकंप के भीख में मिले पैसे से गुलछड़े उड़ा रही है। इनके लाडले, नातेदार विदेश घूम कर गोरी मेम से ऐश कर रहे है। निमुखा, निरीह, बेबस नेपाल अपने अंतिम सांस ले रहा है।

सिपु तिवारी:नेपाल गृहयुद्ध में फंस चूका है। सत्ताधारी और आंदोलनकारी दो चिरा में बट गए है। वार्ता, सहमती, जनदबाव सब बेअसर हो चूका है। हरेक वार्ता के दिन लोग कान खड़े किए रहते है, शायद आज सहमति हो जाए, पर नतीजा टाय( टाय( फिस्स। समाधान का कोई जरिया दिखाई नहीं देता। ये मुल्क अब अस्तित्व विहीन होने के कगार पर जा चूका है। अब कोई चमत्कार भी इसे नहीं बचा सकता।

भूकंप की त्रासदी को मधेश ने आत्मसात किया। नेपाल के दुःख दर्द में कंधे से कन्धा मिला कर दुःख बाटने का प्रयाश किया। मगर मधेश के समस्या पर पहाड़ी जन की चुपी ने निराश किया। जहा चीन ने देर से ही सही मधेश का समर्थन तो किया वही पहाड़ी समाज को भी आगे आना चाहिए था।
एमाले, मधेश बिरोध का बागडोर थामे हुए है। माधव नेपाल( खनाल मधेश और भारत के खिलाफ आग उगल रहे है। एमाले को लगता है मधेश से लड़ने का लाभ पहाड़ में मिलेगा और मधेश में इनके कैडर साथ देंगे ही, दोनों के मदद से आगामी चुनाव में बहुमत मिलेगा। प्रचंड अपने को आगामी प्रधानमंत्री मानकर वक़्त की नज़ाकत का फ़ायदा लेने के लिए मौन धारण कर लिए है।

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कांग्रेस पहाड़वाद में ऐसी मन्त्र मुग्ध हो गई है की वो ये भी भूल चुकी है की कांग्रेस की स्थापना लोकतंत्र के लिए हुई थी। सत्तालोभ और अंतरकलह में फसी कांग्रेस २०१७ साल पुष १ गते के काले दिन को भी भूल गई। उसी दिन राजा महेंद्र ने बीपी कोइराला की सरकार हटा कर लोकतंत्र की हत्या की थी। आज मधेश की जायज मांग और लोकतान्त्रिक तरीके के आंदोलन से पृथक होकर कांग्रेस ने अपने को अलोकतांत्रिक साबित कर दिया है।PicsArt_12-19-07.44.32

राष्ट्रपति विद्या भंडारी का विरोध के वावजूद जनकपुर जाना, सत्तामद में अंधे होकर दमन कराना उनकी सोच को साबित करता है। यही अंतर है मधेशी रामबरण यादव और पहाड़ी विद्या भंडारी में। रामबरण यादव ने अनिक्षा के वावजूद राजधर्म निभाया। वही विद्या भंडारी ने जनकपुर में पुलिस से ूआई सी और मोदी के संतानू कहकर मधेशियों पर गोलिया बरसाई। पहाड़ी मीडिया इसे कश्मीर में झंडा फहराने जैसा दिखाने में लगी है। जबकि ये पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र के भ्रमण की तरह ही था जिसका उद्देश्य मधेश के जले पर नमक छिड़कना था।

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भूकंप की त्रासदी को मधेश ने आत्मसात किया। नेपाल के दुःख दर्द में कंधे से कन्धा मिला कर दुःख बाटने का प्रयाश किया। मगर मधेश के समस्या पर पहाड़ी जन की चुपी ने निराश किया। जहा चीन ने देर से ही सही मधेश का समर्थन तो किया वही पहाड़ी समाज को भी आगे आना चाहिए था।

एन्टा द्वारा संयुक्त राष्ट्र के हेड क्वार्टर न्यूयॉर्क में मधेश के समर्थन में प्रदर्शन हुआ। कमल थापा के बिदेशी दौरों में भी कई जगह बिरोध और प्रदर्शन हुआ। भारत, दिल्ली के जेएनयु में प्रदर्शन( सेमिनार हुआ। भारत और अन्य देश आंदोलन को अपना समर्थन दे ही चुके है। क्या ये सब मधेश आंदोलन का प्रभाव सिद्ध नहीं करते है रु
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आंदोलन में मोर्चा, गठबंधन, अलग देश वाले और स्वतंत्र समूह अलग( अलग राग अलाप रहे है। अब तो दोनों ही एक दूसरे के खिलाफ ही नस्तर लिए खड़े है। बिरगंज में कुछ युवा की गिरफ़्तारी में मोर्चा ही इन्हें असामाजिक तत्व कहकर विज्ञप्ति निकाला, जबकि इस प्रकरण में पहाड़ी दल शांत थे। इनका अकेला प्रयाश सफलता के लिए नाकाफ़ी साबित हो रहा है। अगर इनसब में जरा भी मधेश भाव है तो सब को एक मंच पर आना चाहिए। मांगो की विविधता छोड़कर तत्काल मिलने वाले मांग पर एक होना चाहिए। फिर इसके बाद बाक़ी बचे मुद्दे के लिए संघर्ष होता।
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आंदोलन से मधेश में पहाड़ी दल की बुनियाद हिल गई है, वही जनमानस में मधेशियत मजबूत हुई है। आंदोलन जितना लम्बा चलेगा पहाड़ी दल कमजोर और मधेश मजबूत होगा। नेपाल गरीब होता जा रहा है और ओली सरकार भूकंप के भीख में मिले पैसे से गुलछड़े उड़ा रही है। इनके लाडले, नातेदार विदेश घूम कर गोरी मेम से ऐश कर रहे है। निमुखा, निरीह, बेबस नेपाल अपने अंतिम सांस ले रहा है।

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