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आंदोलन का आगाज तो हुआ, अंजाम क्या होगा ?

 

मुरली मनोहर तिवारी :आज से ६० वर्ष पहले, काशी प्रसाद श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘नेपाल की कहानी’ की भूमिका में महापंडित राहुल सांकृत्यान ने लिखा था, “यह भी स्मरण रखने की बात है, कि नेपाल के नागरिकों में सबसे अधिक संख्या हिन्दीवाले तराइ प्रदेश के हंै, जो कि नेपाल सरकार के राजस्व को सबसे अधिक देने के लिए मजबूर हैं । तराइ की हिंदी भाषी जनता नेपाल की एक जटिल समस्या हो सकती है, यदि नेपाल के वर्तमान शासकों ने भी उसके साथ वही बरताव रखा, जिसे गोर्खा शासक अपने शासन के आरम्भ में रखते आ रहे है । पाकिस्तान में जैसा पूर्वी पाकिस्तान के साथ बर्ताव करने की प्रबृति देखी जाती है । उससे भी कही अधिक हीन–मनोबृति नेपाली शासकों की तराइ के प्रति मालूम होता है । वह नहीं चाहते हैं कि तराइ की जनता कभी भी अपनी संख्या बल के अनुसार शासन में अधिकार पाये । यह निश्चित है कि स्वभाविक बहुमत रखनेवाले इतने नागरिकों को उनके उचित अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता, न उनके उपर सबसे अधिक कर भार लादा जा सकता है । नेपाल के हर हितैषी की यही कामना होगी, कि अबसे तराइ निवासियों को बिजित प्रजा नहीं बल्कि स्वतंत्र नागरिक माना जाये । शासन और प्रशासन केवल पर्वतवासियो की इजारेदारी न मानी जाये और तराइवासियो को दब्बु गुलाम समझने की प्रवृति को जल्दी से जल्दी छोड़ दिया जाय । इतिहास ने यदि हमारे लाखों भाइयो को नेपाल के भीतर रहने के लिए मजबूर किया, तो उससे सदा लाभ उठाने की कोशिश करना आज बुद्धिमानी नहीं मानी जा सकती । आखिर मोरंग से लेकर काली शारदा के किनारे तक बसे ये हिंदी भाषी तराइ निवासी उन्हीं लोगो के रक्त और मांस है, जो उनके दक्षिण में पूर्णियाँ से पीलीभीत तक के जिलो में बसते है । तराइ निवासी नेपाल में होकर किसी विदेशी शक्ति के गुलाम नहीं है । नेपाल भारत का सहोदर है, उसके भीतर रहने में उन्हें अरुचि नहीं हो सकती, यदि वह वहां का सामान नागरिक माना जाये । यदि ऐसा करने में नेपाल के आज के तथा भविष्य के शासक अपने प्रभुत्व को खतरे में समझे यह उनकी अत्यन्त अदूरदर्शिता होगी ।”
महापंडित राहुल सांकृत्यान का ये कथन आज हुबहू चरितार्थ हो रहा है । आज नेपाल जिस दोराहे पर खड़ा है इसकी चेतावनी ६० वर्ष पहले हो चुकी थी । प्रारंभिक दौर से ही नेपाल की सत्ता और सियासत पर वर्चस्व बनाए रखने वाले कुलीन पहाडि़यों ने नए संविधान में भी अपनी सर्वोच्चता बनाए रखी । नेपाल सरकार का मधेश के प्रति वचनबद्धता का पालन नहीं हुआ । क्या नेपाली राजनीति की यही पहचान है, कि समझौता करो, फिर मुकर जाओ । जब संविधान न तो समानुपातिक समावेशी हो, और न ही उस पर सहमति । गैर बराबरी और अस्थिरता पैदा करने वाला नया संविधान मंजूर नहीं हो, तो मधेश चुप कैसे रह सकता है ?
नेपाल की समस्या अंदरुनी है, लेकिन नेपाल सरकार अपनी विफलताओं का ठीकरा भारत के सिर फोड़ना चाहती है । प्रचंड यह कहते नहीं थके, नेपाल भारत का यस मैन नहीं हो सकता । भारत हमारी रसद, तेल आदि की आपूर्ति रोक रहा है । हम मोटर के वजाय साइकल पर चल लेंगे, लेकिन उनके तलवे नहीं चाटेंगे ।’ उप प्रम, सीपी मैनाली ने कहा भारत नेपाल को विभाजित करने और तराइ क्षेत्रो को हड़पने की कोशिश कर रहा है ।’ पहाड़ी नेता ये नहीं समझते है कि राजनीति सत्ता हथियाने का खेल नहीं सेवा का माध्यम है । भारतीय दूतावास की ओर से जारी बयान में इसे आधारहीन और दुर्भावनापूर्ण कहा गया ।
भारत ने जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवधिकार परिषद में मधेश में मानवाधिकार हनन का मुद्दा उठाया, जिसे लेकर नेपाल सरकार ने आलोचना की । भारत–नेपाल सीमा पर बढ़ रहे लगातार तनाव के कारण भारत में सशस्त्र सीमा बल के अधिकारियो और जवानों की छुटियाँ रद्द कर दी गई हैं । विदेश मंत्री कमल थापा से भारतीय प्रम मोदी ने मिलने से इंकार कर दिया । सुषमा स्वराज ने भी दो टूक शब्दों में कमल थापा को चेतावनी दी । आनन–फानन में थापा कुछ कबूलनामा कर वापस लौट आए ।
भारतीय संसद के राज्य सभा में समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल, जदयू के केसी त्यागी और पवन वर्मा, कांग्रेस के आनंद शर्मा ने मधेश के लिए आवाज बुलंद किए । विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में १४ बुन्दों में सरकार का पक्ष रखा । राजद के उपाध्यक्ष रघुवंश सिंह, बीजेपी के कीर्ति आजाद, उ.प्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समर्थन किया । मधेशी भारत की मध्यस्थता चाहता है तो भारत उसे अनदेखा नहीं कर सकता । श्रीलंका की तमिलों की समस्या जब भारत की समस्या हो सकती है तो उससे कही ज्यादा मधेशियों की समस्या, भारत की समस्या हो जाती है ।
एक तरफ सुनने में आ रहा है कि भारत और नेपाल के बीच कुछ सहमति हुई है । दूसरी तरफ आंदोलन और कड़ा किया जा रहा है । भारतीय बॉर्डर के पेट्रोल पम्प पर नेपाली गाडि़यों और गैलन में तेल देने पर रोक लगाया गया है । भारतीय गाडि़यों में भी कोटा सिस्टम से सीमित किया गया है । आंदोलन सरकार और तस्करों की साजिश से जूझ रहा है, उस पर तेल का अतिरिक्त संकट मधेशी किसानो को आक्रोशित ही करेगा । मोर्चा पर सहमति करने का दबाव हो रहा है । इसके पहले भी कई सहमति हुई पर लागु नहीं हुआ । अगर संबिधान संशोधन नहीं हुआ तो मधेश नहीं मानेगा । मधेश कागजी समझौते नहीं चाहता । सीमांकन के सम्बन्ध में आयोग द्वारा निर्धारण, एक और अन्तर्घात की शुरुआत होगी ।
इस आंदोलन में मधेशी जनता ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया । आंदोलन ने सारे पूर्व रिकॉर्ड तोड़ दिए । मधेश ने अहिंसक आंदोलन को पराकाष्ठा तक पंहुचा दिया । अब अग्निपरीक्षा मोर्चा और भारत की है । मोर्चा किसी दबाव में झुक या बिक जाता है, तो मोर्चा का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा । गौरतलब है कि आंदोलन में संघीय समावेशी मधेशी गठबंधन के साथ–साथ कई संगठन सड़कों पर है । कुछ भी गलत हो वह गुपचुप नहीं रह सकता । भारत भी श्रीलंका वाली गलती दोहराना नहीं चाहेगा । वैसी गलती पर अपनों के क्रोध का बड़ा खामियाजा भारत भोग चुका है ।
नेपाल ने खुद अस्थिरता के बीज को बोया है । सामाजिक समानता के लिए स्वच्छ विचार चाहिए । मधेश को लाशों की बस्ती बना दिया गया । समय मुठ्ठी के रेत की तरह फिसल रही है । अगर समय रहते नेपाल ठीक नहीं हुआ तो श्रीलंका और बांग्लादेश की पुनरावृति होगी । भारत की उपेक्षा कर अन्य विकल्प तलाशना नेपाल को विघटन की ओर ले जा सकता है । नेपाल के सत्तामद में रहने वाले स्थाई सत्ता भी समझें कि कभी सर्दी, कभी गर्मी, ये तो कुदरत के नजारे है, लेकिन प्यासे वह भी रह जाते है जो दरिया किनारे है ।

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