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हिन्दू विवाह के रस्मों के महत्व

 

१. लाल वस्त्र = विवाह से पूर्व वर और वधू दोनों ही पक्षों के द्वारा कपड़ों की खरीददारी की जाती है। वस्त्रों में लाल, पीले और गुलाबी रंगों को अधिक मान्यता दी जाती है। इसके पीछे मान्यता यह है कि लाल रंग सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। वहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो लाल रंग ऊर्जा का स्त्रोत है, जो दोनों परिवारों को जो़ड़ने के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करता है।

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२ . आभूषण= नई दुल्हन को गले में भारी हार और पैरों में पायल और बिछिया पहनाई जाती है तो उसके पीछे तथ्य शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखना था। साथ ही ये भारी आभूषण एक्यूप्रेशर पॉइंट को दबाए रखने का एक महत्वपूर्ण साधन थे।

३. उबटन लगाना =उबटन में मुख्य रूप से बेसन, हल्दी और दूध या दही का प्रयोग होता था। इसका उद्देश्य वधू के सौन्दर्य को प्राकृतिक रूप से निखारना है। साथ ही हल्दी एंटीसेप्टीक का भी काम करती है।

४. मेंहदी लगाना = मेंहदी सोलह श्रृंगारों में से एक है। यह ना केवल सौंन्दर्य बढ़ाती है बल्कि इसके पीछे तथ्य यह है कि मेंहदी की तासीर ठंडी होती है और हाथों में मेंहदी लगाए जाने का उद्देश्य अपने धैर्य और शांति को बनाए रखने का प्रतीक माना जाता है।

५. मांगलिक गीत = नववधू जब घर में प्रवेश करती है तो मंगल गीतों से उसका स्वागत होता है और विवाह से पूर्व भी उसके मायके में गीत गाए जाते हैं। इन गीतों का संबंध ज्योतिष के परिपेक्ष में घर की नकारात्मक ऊर्जा को खत्म कर, मंगल गान व साजों की ध्वनि से सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाना है।

६ सात फेरे = योग की दृष्टि से शरीर में ऊर्जा और शक्ति के सात केंद्र हैं। इन्हें चक्र कहा जाता है। विवाह के वक्त यज्ञ और संस्कार के वातावरण और विशिष्ट जनों की उपस्थिति में सात कदम या सात फेरे में वर, कन्या एक दूसरे से कहते है हम दोनों अब परस्पर सखा बन गए हैं। विवाह की सप्तपदी में उन शक्ति केंद्रों और अस्तित्व की परतों या शरीर के गहनतम रूपों तक तालमेल बिठाने का विधान रचा जाता है, इसलिए सात फेरों का महत्व है।

७ मांग भरना = सिंदूर केवल सौभाग्य का ही सूचक नहीं है इसके पीछे वैज्ञानिक धारणा यह है कि माथे और मस्तिष्क के चक्रों को सक्रिय बनाए रखा जाए जिससे कि ना केवल मानसिक शांति बनी रहे बल्कि सामंजस्य की भावना भी बराबर बलवती बनी रहे। (हिमालिनी )

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