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मानव जीवन के कई राज खोलती हैं ये छोटी सी मक्खियां

 
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मालिनी मिश्र, काठमाण्डू, ११ अगस्त । मक्खियों  में छुपे हैं मानव से जुड़े कई प्रश्नों के उत्तर ।
जिन मक्खियों से हम इतनी नफ़रत करते हैं, वो इंसान के बड़े काम आती हैं। पिछले सौ सालों में उनके बारे में जितना पता लगाया गया है, उतना ही इंसान को अपने से जुड़े सवालों के जवाब मिले हैं।
1933 में वैज्ञानिक थॉमस हंट मॉर्गन ने मक्खियों पर अपनी रिसर्च की बदौलत नोबेल पुरस्कार जीता था। उस रिसर्च से ये पता चला था कि हमारे जीन, डीएनए के ज़रिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं।
1933, मॉर्गन के रिसर्च के बाद से ही, मक्खियों पर रिसर्च करके पांच वैज्ञानिक नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं। मक्खियों पर हुए तजुर्बे से पता चला है कि हमारा विकास कैसे होता है ? हमारे बर्ताव की वजह क्या होती है? हम बूढ़े क्यों होते हैं ?
 सबसे आश्चर्य की बात तो ये है कि  इंसानों की 75 फ़ीसद बीमारियों की वजह के जीन मक्खियों में भी पाए जाते हैं।
कम ज़िंदा रहने के चलते उन पर रिसर्च करना आसान होता है। तीन चार हफ़्तों में ही मक्खियां दादी(नानी बन जाती हैं। इसलिए उनकी तीन(चार पीढ़ियों पर कुछ ही वक़्त में रिसर्च हो जाती है।
उन्हें लैब में निगरानी में रखना आसान होता है। क्योंकि उन्हें रखने, उनके खाने का ख़र्च बहुत कम आता है। औसत तापमान पर एक मक्खी रोज़ घण् से छण् तक अंडे देती है। उनका आकार सिर्फ़ तीन मिलीमीटर का होता है। इसलिए लाखों मक्खियों को छोटी सी जगह में रखा जा सकता है।
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हमारे और मक्खी के जीन की बनावट का मेल, तमाम तरह के रिसर्च में मददगार होता है। इंसानों से जुड़े तमाम सवालों के जवाब मक्खियों पर रिसर्च करके मिल जाते हैं। शराब की लत कैसे होती है, इसका पता मक्खियों को शराब पिलाकर लगाया गया। हमें नींद क्यों आती है और चाय(कॉफ़ी का नींद पर क्या असर होता है।
दुनिया भर में हज़ारों वैज्ञानिक मक्खियों पर तरह(तरह के तजुर्बे करते हैं। । इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर मक्खियों पर रिसर्च के लिए अलग से एक प्रयोगशाला बनी है। मक्खियों पर तजुर्बों से हमें ये पता चलता है कि अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में रहने के दौरान जल्दी क्यों बीमार पड़ते हैं।
डॉक्टर पीटर लॉरेंस मानते हैं कि ज़िंदगी का पहला राज़ था धरती पर जीवों के विकास का सिद्धांत, जिसे खोला ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने।
दूसरा राज़ था डीएनए। जिस पर से पर्दा उठने से पता चला कि कोई जीव कैसे हैं, उनका चेहरा कैसा है, उनका बर्ताव कैसा है। ये सब बातें डीएनए में कोड के तौर पर दर्ज होती हैं।
डॉक्टर पीटर लॉरेंस के मुताबिक़ ज़िंदगी का तीसरा राज़ मक्खियों के ज़रिए ही खुलेगा। हालांकि अभी इसमें वक़्त लग सकता है। वो ये कि हमारे जीन में इतना मेल होने के बावजूद हम मक्खी से इतने अलग क्यों होते हैं।
दो इंसानों के जीन में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं होता। फिर भी हमारा चेहरा, नाक की बनावट, हमारे बालों का अंदाज़ और हमारा बर्ताव बिल्कुल अलग होता है। ये सारे राज़ जीन के अंदर ही छुपे होते हैं। लेकिन अभी इन बातों पर से पर्दा उठना बाक़ी है। इस काम में मक्खी बड़े काम की साबित हो सकती है।
जैसे कोई आर्किटेक्ट, इमारत से पहले उसका नक़्शा बनाता है। उसकी दिशा तय करता है। इसी तरह इंसान या किसी और जीव का नक़्शा भी उसके जीन में दर्ज होता है। कोई जीव उसी नक़्शे की बुनियाद पर बनता है। वो नक़्शा कहां छुपा होता है, इसका जवाब मक्खियों से मिल सकता है।
डॉक्टर पीटर लॉरेंस कहते हैं कि अभी ज़िंदगी के कई ऐसे राज़ हैं, जिनका सच सामने आना बाक़ी है। इस काम में मक्खी मददगार साबित हो सकती है।

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