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शिव जी की पूजा लिंग के रुप में क्यों होती है ?

 
मालिनी मिश्र, काठमाण्डू, १६ अगस्त ।।
देवों के देव महादेव की पूजा साकार रुप के साथ ही  लिंग के रुप में  भी होती है। एक लिंग की पूजा ही समस्त जगत का आधार है । अनेक किवदन्तियां है जिसमें शिवलिंग के पूजन पर बल दिया गया है ।
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केवल शिव ही निराकार लिंग के रूप में पूजे जाते हैं। लिंग रूप में समस्त ब्रह्मांड का पूजन हो जाता है क्योंकि वे ही समस्त जगत के मूल कारण माने गए हैं।
वेदों और वेदान्त में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए आता है। यह सूक्ष्म शरीर  17 ज्तत्वों से बना होता है। मन,  बुद्धि, 5 ज्ञानेन्द्रियां, 5 कर्मेन्द्रियां और 5 वायु।
वायु पुराण के अनुसार, प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुनस् सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग का प्रतीक है।
 जब समुद्र मंथन के समय सभी देवता अमृत के आकांक्षी थे लेकिन भगवान शिव के हिस्से में भयंकर  विष आया। उन्होंने बड़ी सहजता से सारे संसार को समाप्त करने में सक्षम उस विष को अपने कण्ठ में धारण किया तथा ‘नीलकण्ठ’ कहलाए। समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ़ गया। उस दाह के शमन के लिए शिव जीपर जल चढाने  की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज भी चली आ रही है।

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