Wed. Apr 29th, 2026
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लोकतंत्र शब्द संविधान में लिखा गया है उससे कहीं अधिक कठिन है इसको व्यवहार में उतारना।

 

एमाले को भारत के राजदूत या भारत के विरुद्ध अपनी गतिविधि को छोड़कर नेपाली भूमि पर सरकार और मधेसी द्वारा किया गया २२ और ८ बुँदे समझौते एवम् अंतरिम संविधान का मर्म समेटते हुए संविधान संसोधन करवाना चाहिये, बस इसी से देश को स्थाई समाधान मिलने की सम्भावना है।

मुकेश झा5840282f5beb2

नेपाल लोकतान्त्रिक देश घोषणा हो गया, संविधान में भी लिख दिया गया और लोगों ने मान भी लिया। पर क्या इस से वास्तव में नेपाल लोकतान्त्रिक देश हो गया ? लोकतांत्रिक अभ्यास के लिए नेपाल के शासक, सत्ताधारी, पार्टी और जनता को काफी संघर्ष करना होगा। जितनी कठिनता से लोकतंत्र शब्द संविधान में लिखा गया है उससे कहीं अधिक कठिन है इसको व्यवहार में उतारना। नेपाल का जनता विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत को बहुत ही नजदीक से देखा है और नेपाल के शासक ने राणा शासन और तानाशाही पंचायती व्यवस्था के अनुसार राजकाज संभाला है। तो निश्चित ही दोनों पक्ष के लिए एक जगह आने में समय जरूर लगेगा।
नेपाल में हाल में जो संविधान संसोधन हुआ है वह वास्तव में मधेसी के एक भी मुद्दे को सम्बोधन नही कर रहा है पर उसको मधेस और मधेसी के हित का हौवा फैलाकर प्रचंड सरकार पता नही क्या हासिल करना चाह रही है। जिस संविधान संसोधन से वास्तव में किसी का हित होता नहीं दिखाई दे रहा है उसको मुद्दा बना कर एमाले फिर से तरह तरह का नाटक मंचन करना शुरू कर दिया। जिन सांसदों ने संविधान बनाया वही संसोधन कर रहे हैं इसमें भारत का हस्तक्षेप का सवाल कहाँ से आता है ? आश्चर्य है इस तरह की सोच पता नहीं एमाले को कहाँ से आती है । सिर्फ सोच ही नही आती एमाले के भातृ संगठन के भाई लोग बचपना भी शुरू कर देते हैं। इसी बचपना का एक जीता जागता नमूना है भारतीय दूतावास का घेराव। एमाले का भातृ संगठन जैसे युवा संघ नेपाल , अनेरास्ववियु सहित अखिल पाँचवा अखिल क्रान्तिकारी संगठन, अखिल नेपाल युवक संघ लगायत संयुक्त युवा विद्यार्थीयों ने नेपाल के आन्तरिक मामला में भारतीय राजदूत द्वारा अस्वाभाविक हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए काठमांडू के लैनचौरस्थित दूतावास घेराव करते हुए विरोध प्रदर्शन किया। इस कार्य को बेवकुफी, बचपना, अज्ञानता क्या कहेंगे ? अपने देश में समस्या क्या है, उसका समाधान क्या है यह जानते हुए भी उस पर अमल न करके भारत विरुद्ध नारेवाजी और प्रदर्शन करने का क्या औचित्य ? भातृ संगठन का आरोप है कि मधेसी नेताओं से मिलने के लिए ही दूतावास द्वारा भोज का कार्यक्रम रखा गया जिसका वो विरोध करते हैं। कुछ युवा नेताओं का कहना था कि भारतीय राजदूत एक कर्मचारी हैं और उनको अपने मर्यादा में रहना चाहिये नहीं तो उनको ूगर्दन पर हाथ दे करू नेपाल से बाहर करेंगे।
नेकपा एमाले का दूसरा बचपना भरा बयान अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने दिया कि संघीयता एमाले का मुद्दा नही है। एमाले ने मज़बूरी में संघीयता को स्वीकार किया। शायद इसीलिए एमाले पूर्ण रूप से तरह तरह का बहाना बना कर संघीयता को समाप्त करने का दाँव लगा रहा है। लेकिन एमाले शायद यह भूल गया है की यह देश एमाले की बपौती संपत्ति नही और न ही संघीयता किसी ने दान में दिया है। नेपाल के सैकड़ो वीर शहीद के बलिदानी खून से जो लोकतंत्र और संघीयता आई है उसको समाप्त करने वाले की इस देश से नाम निशान मिट सकता है। एमाले यह न समझे की भारतीय राजदूत रंजीत रे या भारत बिरुद्ध नारा लगा कर वह बहुत बड़ा ूतीसमार खाूँ हो गया, लेकिन उसके इस तरह के संघीयता विरोधी वक्तव्य से और संघीयता को निष्फल बनाने वाले क्रियाकलाप से देश के सामने उसके असली चेहरा सामने आया है। इतने दिन तो सिर्फ एमाले के केन्द्रीय स्तर के नेतृत्व ही कुछ बिगड़े बिगड़े से हरकत कर रहे थे लेकिन अब वैसा ही कार्य युवा नेतृत्व द्वारा होना भी देश का भविष्य किधर जा रहा है सोचने पर मजबूर कर रहा है। एमाले को भारत के राजदूत या भारत के विरुद्ध अपनी गतिविधि को छोड़कर नेपाली भूमि पर सरकार और मधेसी द्वारा किया गया २२ और ८ बुँदे समझौते एवम् अंतरिम संविधान का मर्म समेटते हुए संविधान संसोधन करवाना चाहिये, बस इसी से देश को स्थाई समाधान मिलने की सम्भावना है। एमाले को यह बात पता नही है ऐसा भी बात नही पर इसको अनदेखा कर न जाने क्यों एमाले जान बुझ कर देश को भारत बिरोधी और आंतरिक द्वन्द में ले जाना चाह रहा है । आखिर एमाले किस से परिचालित है जो नेपाल के अधिकाँश जनता की चाह के विपरीत ही हर कार्य कर रहा है ? एमाले एक परिपक्व पार्टी है इसको कोई भी ऐसा कार्य नही करना चाहिये जो देश को दलदल में फंसाये पर संविधान घोषणा के बाद इसका हर कार्य देश को अधोगति की तरफ ही ले जा रही है और यह क्रम अब भी जारी है। अब तो ऐसा लग रहा है जैसे एमाले ने देश को बर्बाद करने का बीड़ा ही उठा लिया है।

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