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प्रशंसनीय कदम

 

मधेस से सफाया हो चुके एमाले पार्टी पहाडी क्षेत्र मे अपना जनमत बचाने के लिए भारत तथा मधेसी विरोधी दुष्प्रचारों के हवा दे रही है परन्तु इसमे उन्हे निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकी न तो किसी विदेशी को नागरिकता दिए जाने की वात प्रस्तावित संशोधन विधेयक मे है और ना ही हिन्दी भाषा को मान्यता दिया जा रहा है
श्रीमन नारायण
नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी माओवादी केन्द्र के सुप्रीमो पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड की नेतृत्ववाली साझी सरकार ने नवम्बर के आखिरी दिनों में संविधान संशोधन प्रस्ताव संसद में दर्ज तो करायी परन्तु नेपाल की राजनीति में व्याप्त अतिवाद के कारण यह संशोधन प्रस्ताव कतिपय आशंकाओं के घेरे में है । देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी नेकपा एमाले तथा छोटी छोटी बामपन्थी पार्टियाँ जो भारत के विरोध तथा चीन से नजदीकी के लिए जानी जाती हंै खुलकर संविधान संशोधन के विरोध में ताल ठोक कर खडी दिखाई दे रही है । वहीं मधेशी पार्टियाँ भी असमन्जस का शिकार दिखती है । मधेशी दलों की यह अवस्था कहीं उन्हीं के सेहत के लिए न घातक सावित हो जाए ।
कहावत है “दूध का जला मठ्टा भी फूक फूक कर पीता है” सो प्रधानमन्त्री दाहाल अपनी दूसरी पारी में काफी संभल–संभल कर कदम उठा रहे है । खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचें के तर्ज पर सत्ता से बेदखल हुए एमाले के सुप्रीमो के.पी. शर्मा ओली वर्तमान सरकार के हर एक काम की आलोचना बढ़ चढ़ कर रहे है । सम्भवतः नेपाल की सियासी इतिहास में इस सरकार को जितना अधिक विरोध झेलना पड रहा है । उतना शायद विगत मे किसी ने नही झेला होगा परन्तु प्रधानमन्त्री दाहाल के सूझबूझ भरे कदमों के कारण एमाले की हर एक चाल टाँय टाँय फिस सावित हुई है । प्रधानमन्त्री दाहाल के लिए यह संशोधन विधेयक किसी अग्नि परीक्षा से कम नही अगर वे सफल रहे तो बेशक नेपाली राजनीति के वे सवसे लोकप्रिय नेता सावित होगे अन्यथा पार्टी की साख बचाने के लिए उन्हे फिर से पुरानी राह भारत विरोध पर चलना पड सकता है ।
प्रधानमन्त्री बनने के लिए जिस समय कवायद चल रही थी उस समय नेपाली काँग्रेस, माओवादी तथा मधेसी दलो के मध्य तीन सूत्रीय सम्झौता हुआ । प्रधानमन्त्री बनने के बाद सम्झौते के तहत प्रधानमन्त्री दाहाल ने मधेस आन्दोलन के दौरान जान गंवाने वालो को शहीद का दर्जा दिया वही आन्दोलन के क्रम में घायल हुए लोगों के उपचार में आने बाले खर्च का भुक्तान करने का ऐलान भी किया । आन्दोलनकारियों पर लगाए गए झुठे मुकदमें वापस लेने के सम्बन्ध में भी सरकार ने सकारात्मक रुख दिखलाया तथा आन्दोलन को कुचलने में शामिल दोषी अधिकारियो की जिम्मेवारी तय करने के लिए आयोग को गठन जैसे कामों ने मधेसी दलो को प्रचण्ड सरकार पर विश्वास करने का पुख्ता धरातल तैयार किया ।
संविधान संशोधन में हो रही विलम्ब से मधेसी दल चिन्तित होने लगे तथा सरकार को यथाशीघ्र संशोधन विधेयक संसद में दर्ज कराने के लिए दवाव बनाना । मधेसी दलो के द्वारा बार बार समर्थन फिर्ता लिए जाने की धम्की के मध्येनजर प्रधानमन्त्री दाहाल ने संविधान संशोधन विधेयक संसद में दर्ज कराकर गेंद मधेशी तथा विपक्षी दलो कें हवाले कर दी । संशोधन विधेयक में नेपाली संसद की उपरी सदन राष्ट्रीय सभा का गठन, नेपाल में व्याही जाने बाली भारतीय महिलाओं को नेपाल की नागरिकता की सहज प्राप्ति, प्रदेश नं. ५ से पहाडी जिलो को हटाकर उसे पूर्ण रुपेण मधेसी वाला जिला बनाना, नेपाल में बोली जाने बाली सभी भाषाओंकों नेपाली संविधानकी अनुसूची ४ के तहत मान्यता देना आदि विषयों को संविधान संशोधन विधेयक के रुप मे दर्ज कराया गया है । नेपाली संसद की दो तिहाई समर्थन से इसे पारित कराया जाना बाकी है । फिलहाल संख्याबल सरकार कें पक्ष में नही है परन्तु उमीद है कि ये विधेयक पारित हो जाएंगे ।
विधेयक के विरोध मे पहाडी क्षेत्र तथा पहाड़ी जनमानस मे भ्रम फैलाने के लिए प्रमुख विपक्षी दल एमाले तथा वामपन्थी पार्टिया इस विधेयक का खुलकर विरोध कर रही है तथा इसे भारत के इशारे पर लाया गया नेपाल विरोधी विधेयक के रुप में दुष्प्रचार कर रहे है परन्तु प्याज के परत की तरह इनकी एक एक भूmठ की कलई खुलती जा रही है । मधेस से सफाया हो चुके एमाले पार्टी पहाडी क्षेत्र मे अपना जनमत बचाने के लिए भारत तथा मधेसी विरोधी दुष्प्रचारों के हवा दे रही है परन्तु इसमे उन्हे निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकी न तो किसी विदेशी को नागरिकता दिए जाने की वात प्रस्तावित संशोधन विधेयक मे है और ना ही हिन्दी भाषा को मान्यता दिया जा रहा है । संशोधन विधेयक नेपाल के संविधान का उल्लंघन नही करता है और ना ही इसके सम्प्रभूता को खतरा है । चंूकि अभी प्रान्तीय सभा (विधानसभा) का गठन ही नही हुआ है लिहाजा संसद को संविधान में संशोधन करने का पूरा अधिकार है दरअसल एमाले को लगता है कि पंचायती राजा महेन्द्र की भारत विरोधी एवं मधेसी विरोधी नीति के सहारे वह आगामी तीनो चुनावो मे (स्थानीय प्रान्तीय एवं संसद) सफलता हासिल कर लेगी तो ऐसा सोचने के लिए वह स्वतन्त्र है और उसे ऐसा सोचने का पूरा अधिकार भी है परन्तु वह धीरे–धीरे अपने ही बजूद को कमजोर कर रही है । मधेसी दल के नेता भी अब नये–नये माँगों को आगे लाकर यदि इस मे विघ्न डालने का प्रयास करते हैं तो उन्हें भी लाभ नही होने जा रहा है । फिलहाल जो मिल रहा है उसे ले लेने में ही बुद्धिमानी है अन्यथा भविष्य में इससे भी कम में सन्तोष करना पड़ सकता है । वैसे प्रधानमन्त्री प्रचण्ड ने अपने समुदाय एवं लोगों के विरोध का परवाह किए बगैर जो यह साहसी निर्णय लिया है उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए ।

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